अभिनेता मंच पर या कैमरे के सामने अपने को उघाड़ते तो हैं लेकिन वहां उनके ऊपर चरित्र का काया चढ़ी रहती है और वे भले अपने ही अन्दर के सच को या सच्चे अनुभव के आधार पर जन्मते भाव को दर्शाते हैं, दर्शक उनके अनावृत मन को देख नहीं पाता| वहां दर्शक चरित्र को देख रहा होता है और उसी के गुण-दोषों, क्रियाकलापों और भावों से उसका नाता बंधता है|

शेखर सुमन के शो शेखर टूनाईट की एक कड़ी में अभिनेता नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी आये तो वे एक ऐसा अद्भुत करतब दिखा गए जो फ़िल्मी दुनिया के सितारों के बस की बात नहीं है, न ऐसे लोगों के बस की बात है जिन्होंने अभिनय की बाकायदा ट्रेनिंग नहीं ली है| सितारों से न तो शेखर सुमन ऐसा आग्रह करते और न ही वे ऐसे तत्काल एक्ट के लिये राजी ही होते| शायद एफ.टी.आई.आई से अभिनय सीखे अभिनेता भी इसे करना न स्वीकारें | यह एनएसडी के प्रशिक्षण का ही कमाल है |

लगभग 3 मिनट और 20 सेकेंड्स के छोटे से समयांश में नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी ने शेखर सुमन के इस कार्यक्रम के अभी तक प्रसारित सारी कड़ियों की तुलना में एक नायब कलाकारी प्रस्तुत कर दी जो नवोदित और अनुभवी दोनों किस्म के अभिनेताओं के लिए अभिनय की कक्षा में एक मास्टर एक्टर के अध्यापन जैसा है|

मुश्किल से 10 सेकेण्ड में ही नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी में ही परिवेश को भूल कर अपने ही चरित्र की गहराई में उतर गए| संघर्ष करते करते, विभिन्न भूमिकाएं निभाते हुए, अपनी कला के सापेक्ष कभी उचित सराहना और कभी उपेक्षा पाते हुए, कभी इस भाव से गुजरते हुए कि ज़माने में किसी के पास आँख ही नहीं है उसके कला प्रदर्शन की गहराई को पहचान पाने की, एक कलाकार का मन सैंकड़ों , हजारों हिस्सों में विखंडित हो जाता है और उसके अन्दर बहुत से कलाकार बसने लगते हैं| विखंडित होने की इसे प्रक्रिया से जन्मी शिकायत को नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी ने कैमरे के सामने प्रस्तुत कर दिया| कैमरा संभाल रहे व्यक्ति को इस एक्ट की महिमा का अंदाजा नहीं था और उसने कैमरा स्थिर न रखने की भूल की या कार्यक्रम के संपादक ने अलग अलग कोण से कैद किये शॉट्स को ज्यादा महत्व दिया|

फ़िल्म टैक्सी ड्राईवर में रॉबर्ट डी नीरो ने दर्पण के सामने एक प्रभावशाली  एकालाप (Monologue) किया था लेकिन वहां वे एक चरित्र को निभा रहे थे और एक कुंठित चरित्र की अहं तुष्टि को प्रस्तुत कर रहे थे|

नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी यहाँ उससे उलट अपने अहं का विखंडन कर रहे थे| उसे तोड़ तोड़ कर बारीक बना रहे थे जिससे वह बह जाए और उनके अन्दर एक जिज्ञासू, उत्सुक और ताजगी भरा अभिनेता बचा रहे जो संतोष को इस तरह न पा ले कि उसके अन्दर जड़ता आ जाए, बासीपन आ जाए|

अपनी अन्दरनी तड़प की झलक दिखाते हुए भी नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी ने लय नहीं बिगड़ने दी और अपना ही अभिनय पूरी लयबद्धता से निभाया और अंत के दस सेकेण्ड में पुनः परिवेश में वापिस आ गए|

शेखर सुमन अपने कार्यक्रम में आये मेहमानों से कन्फेशन करने के लिए एक खुले कक्ष में जाने का अनुरोध करते हैं और वहां मेहमान कोई भी ऐसी कहानी सुना देते हैं जो सुनने में अच्छी लगे| अभी तक केवल अविनाश तिवारी ने ही असल जीवन से जुड़ा ऐसा किस्सा सुनाया जो वाकई उन्हें कचोटता होगा और जीवन भर कसक देता रहेगा| बाकी अभिनेता गण तो टॉफ़ी चुराने जैसे हलके मुद्दे सुना गए जिनमें पश्चाताप जैसे भाव का समय बीतने के साथ कोई स्थान वैसे भी नहीं रहता|

बुढाना, उत्तर प्रदेश के किसान परिवार से अभिनय जगत में पहुंचे नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी ने एक बड़ी लकीर खींच दी है और अब यही देखना रोचक होगा कि शेखर सुमन का कोई और मेहमान इस लकीर से बड़ी लकीर कभी खींच पाता है या नहीं|

अभिनेता के लिए खुद से बातें करना अत्यंत आवश्यक है भी ताकि उसके अन्दर का अभिनेता बेहतरी की अनवरत तलाश में लगा रहे|

…[राकेश]


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