अपनी पीड़ा ही पीड़ा है यह सोच कभी भी ठीक नहीं इस दुनिया में है कौन बचा पीड़ा जिसके नजदीक नहीं सुख याद नहीं रहता सच है युग भी उसमें पल बन जाता पर दुख की फितरत ही ऐसी आता... Continue Reading →
सांप तुम सभ्य तो हुए नहीं, नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया। एक बात पूछूँ-- (उत्तर दोगे?) तब कैसे सीखा डसना... विष कहाँ पाया?
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