यूँ तो महेश भट्ट ने इंसानी जीवन में जटिल रिश्तों की मौजूदगी पर हमेशा बेहतरीन फिल्में बनायी हैं जिनमें अर्थ, सारांश, जनम, नाम, काश, डैडी, तमन्ना और जख्म आदि महत्वपूर्ण हैं। इनमें भी अर्थ, जनम और जख्म को उनके अपने ही जीवन से प्रेरित बताया जाता है। बाद में जब उन्होने फिल्म निर्देशन का कार्य छोड़ दिया तो उन्होने अपने और परवीन बाबी के संबन्धों पर आधारित एक फिल्म “वो लम्हे” का निर्माण किया।

संवेदनशीलता के स्तर पर जनम उनकी अन्य फिल्मों से बेहतर प्रतीत होती है। इस फिल्म को उन्होने 1985 में दिल्ली दूरदर्शन के लिये बनाया था।

एक उम्र होती है जब लड़के अपने पिता के विरोध में खड़े प्रतीत होते हैं और ऐसा लगने लगता है मानो दो विरोधी दलों के प्रतिनिधि एक ही घर में रह रहे हैं। लड़का अपना खुद का अस्तित्व तलाश रहा होता है और वह यह सब खुद अपने बलबूते करना चाहता है। वह चाहता है कि वह दुनिया से निगाहें मिलाकर स्वतंत्र रुप से खड़ा हो जाये जबकि पिता को लगता है कि अभी उसका बेटा इतना बड़ा नहीं हुआ है कि उसे सलाह की और मार्ग निर्देशन की जरुरत न पड़े सो वह हर कदम पर अपने पुत्र को सलाह देना चाहता है और यही सब पुत्र को गुस्सा दिलाता रहता है। यह सब तो एकदम सामान्य परिवार के सामान्य से पिता पुत्र के रिश्ते में होता रहता है पर तब पिता पुत्र के रिश्ते कैसे खॆल दिखायेंगें जब कोई परिवार सामान्य तानेबाने में बुना हुआ न होकर जटिलताओं भरे रिश्तों का बोझ ढ़ो रहा हो?

समाज ने परिवार की एक परिभाषा गढ़ रखी है और जो भी परिवार इस परिभाषा के अन्तर्गत अपना निवार्ह नहीं करता उसे समाज अच्छी निगाह से तो देखता ही नहीं बल्कि उसे मान्यता भी नहीं देता। समाज स्त्री पुरुष के मध्य विवाह और उसके उपरांत संतान उत्पत्ति किसी भी परिवार का शुरुआती आधार मानता है। ऐसा नहीं है कि लोग विवाह के बाहर सम्बन्ध स्थापित नहीं करते पर समाज विवाहेत्तर सम्बन्धों को मान्यता नहीं देता। ऐसी सन्तानों की स्थिति का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है जिनका जन्म ऐसे ही किसी विवाहेत्तर सम्बन्धों के परिणामस्वरुप हुआ हो।

समाज से मान्यता तो दुरुह है ही और ऐसे बच्चे शुरु से ही एक कुंठा के शिकार बनकर बड़े होते हैं। अगर स्थितियाँ ऐसी हों कि पुरुष ने स्त्री से विवाह न किया हो पर सम्बन्ध हमेशा कायम रखे और वह महिला और उससे उत्पन्न अपने पुत्र के साथ भी एक अलग परिवार बसाये हुये है जिसे वह दुनिया के सामने स्वीकार नहीं कर सकता। महिला तनाव में जीने के लिये विवश है। वह अपने प्रेमी के साथ विवाह नहीं कर पायी पर उसे छोड़कर अपना जीवन फिर से शुरु भी नहीं कर पायी और उस पर आश्रित होकर रह गयी। शायद इस सम्बन्ध से उत्पन्न पुत्र के कारण। ऐसी महिला हमेशा एक भय से घिरी रहती है कि जाने कब उसका प्रेमी उसे छोड़ देगा और हमेशा के लिये अपने पहले परिवार के पास स्थायी रुप से लौट जायेगा। ऐसे रिश्ते में एक स्थिति ऐसी आती है जहाँ ये कहना मुनासिब हो जाता है कि न उगलते बने न निगलते बने। बस ऐसी ही ऊहापोह में समय बीतता जाता है और इन्सान हालात से समझोता कर लेता है और इन सब कठिन स्थितियों को जीवन का अनिवार्य अंग मानकर जीने लगता है।

जनम फिल्म में भी एक ऐसा ही परिवार है जहाँ स्टंट फिल्म बनाने वाले एक निर्माता निर्देशक का एक महिला से विवाहेत्तर सम्बन्ध है और इस सम्बन्ध से उसे एक पुत्र भी है। वह अपने दोनो परिवारों से सामंजस्य बनाकर रखना चाहता है। हिन्दी फिल्म उद्योग में ऐसे सम्बन्धों के कई उदाहरण मिल जायेंगें। निर्देशक में इतना साहस नहीं है कि वह सारे समाज के सामने अपने इस दूसरे परिवार को मान्यता दे सके पर वह अपनी प्रेमिका और उससे हुये अपने पुत्र की जिन्दगी में पूरा दखल रखता है। उसका पुत्र अब एक नवयुवक है और उसने अपनी माँ को बचपन से घुट घुट कर जीते और एक तरह से धीरे धीरे रोज मरते हुये देखा है। उसकी माँ एकदम मूडी हो गयी है और उसे कभी भी अवसाद और क्रोध के दौरे पड़ने लगते हैं। युवक को अपनी माँ पर भी गुस्सा आता है कि क्यों उसने अपनी जिन्दगी एक ऐसे आदमी की वजह से खराब की जिसमें उसे सार्वजनिक रुप से अपनाने की हिम्मत नहीं थी। अपने पिता से उसका अलगाव तो आसानी से समझ मे आने वाली बात है। वह एक निरुद्देश्य जिन्दगी जी रहा है जहाँ उसके सामने कोई लक्ष्य नहीं है और वह अपनी उलझी हुयी जिन्दगी को बस किसी तरह आवारागर्दी करके जी रहा है। उसके वजूद में भीतर कहीं एक कुंठा समा गयी है और वह उसे अपने पिता की देन मानता है। वह न केवल अपने पिता पर क्रोधित रहता है बल्कि उसके अन्दर गहरे में गुस्सा समा गया है। वह खामोश हो गया है। वह कुछ करना चाहता है और अपने अस्तित्व का एहसास दुनिया और खास तौर पर अपने पिता को करवाना चाहता है परन्तु वह स्पष्ट नहीं है कि उसे करना क्या है? उसके जीवन की उलझने उसके इरादों से कहीं ज्यादा मजबूत दिखायी देती हैं और वह इन उलझनों के तिलिस्म को तोड़ पाने में अपने को असफल पाता है। निराशायें उसके अन्दर और ज्यादा क्रोध को जनम देती हैं और एक जीवन जो फूलों की तरह खिलकर चारों तरफ खुशबू और सौन्दर्य बिखेर सकता था कुंठाओं की वजह से कांटो जैसा हो जाता है।

प्रेम व्यक्ति को बदल देता है। प्रेम आदमी की मनोस्थिति को बदल कर रख देता है और युवक की जिन्दगी में प्रेम का आना उसे उद्देश्य विहीन जीवन जीते युवक से एक सपने देख्नने वाला युवक बना देता है और अब उसे अपनी जिन्दगी मे कुछ मायने दिखायी देने लगते हैं। अब वह एक अन्तर्द्वन्द का सामना करने लगता है जहाँ उसके सपने उसे आगे की और देखने की प्रेरणा देते हैं तो उसके अब तक के जीवन की जटिलतायें उसे निराशा में धकेलना चाहती हैं।

जिन्दगी कब तुमको देखा है कब तुमको जाना है

तारों के संग फूलों के रंग में तुमको पाना है

ये मैने ठाना है अपने घर लाना है

बेच डाला मेरे माली ने मुझे है गैरों के हाथ

खुश्क पत्ते की तरह मैं हो लिया लहरों के साथ

रातों के संग कांटो के रंग में तुमको पाना है

तू मेरे साथ हो मै तेरे साथ हूँ

तो जमीं साथ है आस्मां साथ है

ये भीगा भीगा जिस्म ये भीगी आरजू

जिन्दगी मिल गयी

जिन्दगी है सौदागर देती है कुछ लेने के बाद

दी बहार मुझको मगर गिरवी चमन रखने के बाद

साये के संग लहू के रंग में तुमको पाना है

इसी ऊहापोह से गुजरते हुये उसे अपनी दिशा दिखायी देने लगती है। चूँकि उसके माता पिता का सम्बन्ध फिल्मों से रहा है और उसे भी अहसास होता है कि उसके अन्दर की ज्वाला सृजनात्मक कार्य करके ही शान्त होगी और वह एक फिल्म बनाने की ठान लेता है जिसमे वह अपने पिता की मदद बिल्कुल नहीं चाहता। बहुत मुश्किलों से गुजरकर वह अपनी पहली फिल्म बना लेता है। ये देखकर कि वह अपनी जिन्दगी को अर्थ दे रहा है मानो प्रकॄति ने उसकी जिन्दगी को बिल्कुल बदल देने की स्वीकृति दे दी हो और उसकी फिल्म और उसे सबसे अच्छी फिल्म और सबसे बेहतर निर्देशक के पुरस्कार भी मिल जाते हैं। और पुरस्कार भी उसे अपने पिता के हाथों मिलते हैं जो सबके सामने उसे अपना पुत्र भी स्वीकार करता है।

युवक का मानो अब पुनर्जन्म हुआ है।

कुमार गौरव ने इस फिल्म में युवा नायक की भूमिका निभायी थी और ये उनका निस्सन्देह आज तक का सबसे अच्छा अभिनय प्रदर्शन कहा जा सकता है। उन्हे एक बहुआयामी चरित्र मिला था और उन्होने इसका फायदा उठाया। काश वे कुछ और ऐसी संवेदनशील फिल्में कर पाते तो उनके अभिनय जीवन क रुख कुछ और ही होता।

अनिता कँवर ने कुमार गौरव की माँ की भूमिका में भरपूर जान डाल दी थी। उनकी आवाज कुछ फँसी हुयी सी लगती है और इस चरित्र के विभिन्न भावों को उभारने के लिये उनकी आवाज ने बहुत साथ दिया। उनका चरित्र कभी भी हिस्टिरिया में आ जाता है और उन्होने अपने चरित्र के हर रंग को बखूबी निभाया।

अनुपम खेर ने कुमार गौरव के पिता की भूमिका निभायी थी और 80 के मध्य के दशक का समय उनके अभिनय जीवन के सबसे सृजक काल था जब वे फिल्म दर फिल्म अपनी बेहतरीन अभिनय क्षमता का अहसास दुनिया को करा रहे थे। जनम भी उनकी उल्लेखनीय फिल्मों मे से एक है।

शरनाज़ पटेल की शायद ये पहली फिल्म थी और उन्होने कुमार गौरव की प्रेमिका की भूमिका निभायी थी। वे भावनाओं के उतार चढ़ाव से भरी इस फिल्म में जिसमें अधिकतर उदासी और कुंठा भरी भावनायें ही छायी रहती हैं एक ताजा तरीन अहसास लेकर आती हैं। उनकी उपस्थिति सुखद लगती है।

सूरज सनीम के संवाद और गीत और अजीत वर्मन के संगीत ने फिल्म में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

जनम, महेश भट्टकी सबसे संवेदनशील फिल्म प्रतीत होती है।

…[राकेश]

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