iamkalaamहोटल ढ़ाबे के गंदे बर्तन साफ करता छोटू
ट्रक, बस के ऑयल में सना हुआ छोटू
कचरे के ढ़ेर में से खाना ढ़ूँढ़ता छोटू
मैडम के बच्चों को नन्हे हाथों से खिलाता छोटू
मालिक की डाँट खाता छोटू
बाबा के कँधे पर बैठ मेला जाना चाहता है छोटू
माँ की लोरी सुनना चाहता है छोटू
टीचर की प्यार भरी डाँट खाना चाहता है छोटू
छोटू को एक नाम चाहिये
छोटू के सपने को एक पहचान चाहिये
क्या आप देंगे?

सरकारें समाज के उत्थान के लिये भारतीय समाज से बाल मजदूरी जबरदस्ती हटाने के प्रयास करने का दिखावा कर लें और बल प्रयोग से इसमें सफल होती भी दिखायी दे जायें पर अगर मजदूरी से हटाये गये इन बच्चों के लिये शिक्षा का प्रबंध हमारी सरकारें नहीं कर सकतीं तो उनके ऐसे प्रयास ढ़ोंग रचाने से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं। समाज को तेजी से आधुनिक आर्थिक तरक्की के मार्ग पर ले जाने की हठधर्मिता में अगर समाज और सरकारें बेहद गरीब तबके के बच्चों के पालन-पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिये सहायता न देने की और उनकी ओर से आँखें बंद रखने की योजना पर अमल करने लग जायें तो ऐसे तबके के बच्चे जीवित रहने के लिये छोटे-मोटे काम न करें तो क्या करें? अगर बेहद गरीब तबके की किसी बेरोजगार असमर्थ नारी को वेश्यावृत्ति और भिक्षावृत्ति से अपने को बचाना है और उसके सामने अपने बच्चों को काम-धंधे पर लगाने के अलावा कोई दूसरा समानजनक रास्ता नहीं है। आखिर बाल-मजदूरी को बुरा क्यों माना जाता है? क्या इससे जुड़े सारे पहलुओं पर गौर किया जाता है? इससे जुड़ी बुराइयों में कुछ बहुत महत्वपूर्ण हैं।

बाल मजदूरों का हर तरह से शोषण किया जाता है। उन्हे ऐसे कामों में लगाया जाता है जिसके न तो वे योग्य हो सकते हैं और न ही ऐसे कार्य करने के स्थलों की परिस्थितियाँ किसी भी तरह से उनके कोमल बचपन के अनुकूल हो सकती हैं। खराब परिस्थितियों में काम करने से उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। उनका प्राकृतिक मानसिक विकास तो अवरुद्ध और प्रभावित होता ही है। जब बाल-मजदूर अपने हम उम्र बच्चों को स्कूल जाते या अपने माता-पिता के संरक्षण में एक सहुलियत भरी ज़िंदगी जीते देखते हैं और अपने को रोटी-कपड़े और रिहायश के लिये जद्दोजहद करते देखते हैं तब यह अपेक्षा करना कि उनके मन में समाज के प्रति वितृष्णा उत्पन्न न होती होगी, एक मूर्खता ही होगी।

सबसे बड़ी हानि जो एक बाल-मजदूर की होती है वह है उसका शिक्षा से वंचित रह जाना। शिक्षा ही वह मार्ग है जो उनके संघर्षपूर्ण बचपन के बावजूद उनके मस्तिष्क का विकास कर सकता है और उन्हे उन्नति की ओर धकेल सकता है। आखिरकार फिल्मों और टीवी धारावाहिकों आदि में काम करने वाले बाल कलाकार भी बाल मजदूर ही हैं, बस उनके काम के उन्हे पैसे अच्छे मिल जाते हैं और उस पैसे से वे घर पर ही शिक्षा आदि का प्रबंध कर सकते हैं।

बचपन और किशोरावस्था में बेहद गरीबी वाला संघर्षपूर्ण जीवन जीने वाले लोग बड़े होकर बहुत बड़ी- बड़ी शख्सियतों के मालिक बने हैं पर ज्यादातर मामलों में बड़ी उपलब्धियाँ वे इस कारण हासिल कर पाये क्योंकि उन्हे शिक्षा की कद्र थी और उनके अंदर सीखने की और शिक्षा ग्रहण करने की ललक थी और हजारों तरह की बाधाओं को पार करके भी उन्होने स्वाध्याय से अपने ज्ञान में बढ़ोत्तरी की और निरंतर शिक्षा प्राप्त करने में लगे रहे।

पश्चिम इस मामले में भारत जैसे जटिल देश से बेहतर है कि वहाँ खुद ही सब कुछ हासिल करने वाले लोगों को बड़े सम्मान से देखा जाता है। स्कूल और कॉलेज में शिक्षा पाते समय धनाढ़य पिता की संतान होने को कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं माना जाता जबकि भारत में एकदम उल्टा है और यहाँ प्रतिभा नहीं बल्कि परिवार की धन-सम्पत्ति के आधार पर किसी छात्र या युवक को सामाजिक स्वीकृति दी जाती है। पश्चिम में उपलब्धि पाने वालों के बारे में फक्र से बताया जाता है कि उनके माता या पिता या दोनों ही छोटी आमदनी वाले कार्य करते थे पर इन व्यक्तियों ने अपनी खुद की मेहनत, बुद्धिमानी और प्रतिभा के बल पर उल्लेखनीय सफलता पायी।

भारत में सामाजिक व्यवस्था ऐसी बन गयी है कि सफलता पाने के बाद लोग शर्माते हैं यह बताने में कि उनके माता-पिता कोई बहुत आमदनी वाली नौकरियाँ नहीं करते थे या वे छोटे स्तर के किसान थे या साधारण मजदूर थे। अपना ही भूतकाल उन्हे कचोटता है। भारतीय समाज अगर नहीं सुधरता तो ऐसी बुराइयों के कारण गल कर नष्ट हो जायेगा और इसे नष्ट करने के लिये किसी आतंकवादी या विदेशी हमले की जरुरत नहीं है इसमें व्याप्त बुराइयाँ स्वयं ही यह कार्य कर लेंगी।

आधुनिक भारत में गिने चुने उदाहरण ही ऐसे मिलते हैं जहाँ उपलब्धियाँ हासिल करने वालों ने अपने संघर्षपूर्ण बचपन को जगजाहिर करके लोगों को प्रेरणा देने का काम किया है। ऐसे लोगों में भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक डा. मशेलकर प्रमुख हैं।

भारत में ऐसे ख्याति प्राप्त सितारे भी हैं जिन्हे अपने प्रोफेसर स्तर के माता-पिता के संरक्षण में व्यतीत किया हुआ बचपन भी संघर्षपूर्ण लगता है। उन्हे अगर शैलेश मटियानी जैसे बड़े साहित्यकार के बचपन और युवावस्था के संघर्ष की जानकारी दी जाये तो शायद विचलित होकर वे बीमार ही हो जायें। बेहद गरीब पृष्ठभूमि से आये शैलेश मटियानी बचपन में ही अनाथ हो गये थे और बाल-मजदूर के रुप में उन्होने अपना बचपन गुजारा, पर उनमें भी पढ़ने-लिखने के प्रति ललक थी और बेहद कष्टों भरा बचपन भी उन्हे तोड़ नहीं पाया। बड़े होने पर भी जब उनकी रचनायें प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपने लगी थीं, उन्हे जीविका कमाने के लिये बम्बई में एक ढ़ाबे पार काम करना पड़ता था। उस संघर्षमयी काल के दौरान भी लगभग सड़क पर रहने जैसा जीवन जीते हुये भी उन्होने “बोरीवली से बोरीबंदर तक” जैसे कालजयी उपन्यास की रचना कर दी थी। उनमें साहित्यकार बनने का जुनून था और इसी हठ ने उन्हे आधुनिक भारत का एक बेहद महत्वपूर्ण लेखक बनाया। अगर उनका साहित्य वक्त पर अंग्रेजी में उपलब्ध हो जाता तो दुनिया के प्रतिष्ठित साहित्यकारों में उनकी गिनती साठ के दशक में ही होने लगती।

कहानी हरेक की होती है और ढ़ाबों, गैराजों और दुकानों आदि पर काम करते दिखाये देने वाले, और कूड़ा बीनते दिखायी देने वाले बच्चों की भी कहानियाँ होती हैं। शैलेश मटियानी का रचना संसार तो ऐसे चरित्रों से भरा पड़ा है। बस होता यह है कि जीवन की आपाधापी से घिरे लोगों के लिये हाशिये पर रहने वाले बच्चों के जीवन का कोई अस्तित्व ही नहीं होता। ये बच्चे ऐसे ही काम करते चले जाते हैं और इनके आसपास से हजारों-लाखों लोग इनसे बेखबर होकर गुजर जाते हैं।

i Am KALAAM ऐसा निश्चित करती है कि हाशिये वाला जीवन जी रहे एक चरित्र को दर्शक नकार न पायेंगे। जैसे हरेक बाल-मजदूर को लोग जिस भी नाम से चाहे पुकार लेते हैं। कोई उन्हे ’ओ लड़क’ कहकर, कोई ’ए लड़के’ कहकर, कोई ’अबे सुन’ कहकर पुकारता है। इस चरित्र को लोग ’छोटू’ कहकर पुकारने लगते हैं।

छोटू की भूमिका में अपने पहले ही दृष्य से Harsh Mayar अपने स्वाभाविक अभिनय की छटा बिखेरने लगते हैं। उनकी मुस्कान संक्रामक है और न तो उनकी भूमिका और न ही उनका अभिनय, दोनों में से कुछ भी ऐसा नहीं है जो दर्शक का दिल लुभाये बिना रह जाये।

एक गरीब बाल-मजदूर के जीवन पर बनी नीरस सी डॉक्यूमेंटरी नहीं है i Am KALAAM, बल्कि यह एक रोचक फिल्म है जो शुरु से आखिर तक न केवल दर्शक को भावनाओं की यात्रा पर ले जाती है, उसे शिक्षित करती है और साथ ही उसका भरपूर मनोरंजन भी करती है। शिक्षा की महत्ता के प्रचार और प्रसार के लिये जो काम सरकारें अरबों रुपये खर्च करके भी नहीं कर पायी हैं उस काम के लिये यह फिल्म सहज ही भूमि तैयार कर देती है।

मेधावी छोटू, पढ़ने-लिखने व नई नई चीजें सीखने के लिये हरदम लालायित रहता है और उसकी यही ललक उसे अपने जैसा जीवन जी रहे अन्य बच्चों से अलग बनाती है। उसके घर की आर्थिक हालात उसे बचपन में ही ढ़ाबे पर काम करने के लिये विवश करती है ताकि वह अपनी माँ और उसकी गोद में रहने वाली अपनी छोटी बहन के लिये कुछ पैसे भेज सके। उसके पिता का कोई जिक्र फिल्म नहीं करती। शायद हाल ही में, उसकी छोटी बहन के जन्म से कुछ पहले या बाद में उसकी मृत्यु हो गयी हो।

संघर्षपूर्ण जीवन जीते हुये आदमी दो तरह से अपने काम कर सकता है या तो वह सदा कुंठित रहकर झींक-झींक कर काम करे या कुश रहकर पूरे मनोयोग से अपने काम निबटाये। छोटू सदैव आशा से भरा रहता है और पूरी तन्मन्यता से अपने काम निबटाता है।

संयोग उसे उस इलाके के पूर्व राजा के पुत्र – कुंवर रणविजय सिंह, जो कि अकेलेपन से जन्मी बोरियत से जूझ रहे हैं, का मित्र बना देते हैं। दोनों हम उम्र हैं। फिल्म के शुरु में जैसे ही छोटू ढ़ाबे के पास आता है उसी समय स्कूल बस में चढ़ने के लिये छाते के पीछे छिपा हुआ रणविजय भी वहाँ आता है और उसके बाद दोनों के जीवन समांतर रुप से चलते हैं। एक तरफ रन विजय का जीवन है जहाँ हर तरह की सुख-सुविधायें और सहूलियते हैं, और दूसरी ओर छोटू का अभावों से भरा जीवन है पर गरीबी छोटू को मानसिक रुप से कभी भी तोड़ नहीं पाती और वह हमेशा आत्मविश्वास से भरा हुआ रहता है।

ऊर्जा से लबरेज़ बचपन को एक दिशा की जरुरत होती है, तभी उनके सपने पूरे हो सकते हैं और छोटू को अपने सपनों को मोड़ देने के लिये दिशा मिलती है भारत के राष्ट्रपति डा. कलाम को टीवी पर भाषण देते देखकर। पहली ही दृष्टि में छोटू, डा. कलाम में अपने प्रेरणास्त्रोत को खोज लेता है और नये जन्मे इस आकर्षण को विधिवत रुप से अपने साथ बनाये रखने के लिये वह अपना नाम ही कलाम रख लेता है।

ऊँच-नीच के धरातल पर खड़े भारतीय समाज में राजसी परिवार में जन्मे रणविजय से कलाम की दोस्ती कुछ तो रंग दिखायेगी ही और कलाम को कुँवर से दोस्ती रखने का खामियाजा भुगतना पड़ता है। पर कलाम की प्रतिभा और उसकी दोस्ती रणविजय को भी निर्भीक बना चुकी है और वह अपनी मित्रता निभाता है।

कलाम की जीवनी लगती फिल्म को रोचक बनाने में अन्य चरित्रों का भी भरपूर योगदान है जिनमें ढ़ाबे का मालिक भाटी (गुलशन ग्रोवर), ढ़ाबे पर काम करने वाला युवक लप्टन (Pitobash), और फ्रेंच महिला लूसी (Beatrice Ordeix) प्रमुख हैं। लूसी के मूक प्रेमी और कलाम के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया रखने वाले भाटी के रुप में गुलशन ग्रोवर प्रभावित करते हैं।

अमिताभ बच्चन से बेहद प्रभावित चरित्र- लप्टन, की भूमिका के हावभाव और मनोभावों को Pitobash बखूबी उभारते हैं। कलाम की प्रतिभा के कारण उससे चिढ़ने वाले चरित्र को उन्होने अच्छे ढ़ंग से निभाया है।

फिल्म के नायक की भूमिका में Harsh Mayar ने अपनी पहली ही फिल्म में उल्लेखनीय अभिनय कर दिखाया है। उनके अभिनय में स्वभाविकता और विश्वसनीयता की भरपूर मात्रा दिखायी देती है।

संजय चौहान की कथा, पटकथा और संवाद आकर्षक लगते हैं।

फिल्म, राजस्थान के रुप-रंग, परिवेश और संगीत आदि की परम्परा को उभारती है।

Nila Madhab Panda ने अच्छी और संवेदनशील फिल्म बनायी है जो दर्शक के दिल से सम्बंध जोड़ती है और उसकी भावनाओं को उभारकर उसे सभी बच्चों के जीवन में शिक्षा के महत्व के बारे में सोच विचार करने के लिये प्रेरित करती है। फिल्म देखकर दर्शक किसी जगह काम कर रहे बाल-मजदूर के प्रति वैसा तो नहीं ही रह पायेगा जैसी कि वह पहले रहता था।

फिल्म ने कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पुरस्कार जीते।

बेहद संतोष की बात है कि Smile Foundation जैसी गैर-सरकारी समाजसेवी संस्था ऐसी फिल्म के निर्माण के लिये आगे आयी।

…[राकेश]

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