NH10“मैडम जी, शहर में जहां बड़े बड़े मॉल खत्म हो जाते हैं न बस डेमोक्रेसी भी वहीं समाप्त हो जाती है”| एक पुलिस इन्स्पेक्टर फिल्म की नायिका मीरा (Anushka Sharma) से कहता है और उसे समझाता है कि पुलिस वाले भी इसी समाज से आते हैं और उन्हें भी सामाजिक परम्पराओं और बंदिशों का पालन करना पड़ता है|

वह मनु का उदाहरण देकर समाज पर जातिप्रथा के वर्चस्व को सही ठहराने की कोशिश करते हुए अम्बेडकर का सन्दर्भ देते हुए कहता है वही जिन्होने हमारा संविधान बनाया पर उसी संविधान में दर्ज बातों की रक्षा के लिए पहनी हुयी वर्दी और उस नाते ली गयी कर्तव्य की शपथ उसके लिए मायने नहीं रखती और वह पुलिस बल में भारतीय समाज के अपने उप वर्ग का नुमाइंदा मात्र है जो वर्दी पहन कर भी अपने उप-वर्ग के हितों की रक्षा करेगा फिर चाहे उसे क़ानून तोडना पड़े या संविधान को बेइज्जत करना पड़े|

 

NDTV एक कार्यक्रम चलाया करता है जिसमें चैनल के ही लोग किसी सार्वजनिक स्थल पर ऐसा नाटक रचते हैं जिससे आस पास मौजूद लोग नाराज होकर उनका विरोध करें और इस तरह वे बुराई के खिलाफ खड़े होने के लिए लोगों में चेतना जगाने का प्रयास करते हैं|

दामिनी कांड ने युवा भारतीयों में आंदोलन करने और एकता दिखाने की अदभुत क्षमता का विकास किया|

ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली में तो लोग बड़े से बड़े मंत्री के खिलाफ बोंल सकते हैं और लिख सकते हैं पर राज्यों के शहरों और कस्बों में एक थानेदार के खिलाफ बोंल और नहीं लिख सकते| बड़े शहरों में आंदोलन की एक ऊर्जा आदमी के अंदर भरी रहती है और वह मौका मिलते ही आंदोलनकर्मी बनने के लिए तत्पर रहता है|

पर यही आंदोलन करने का साहस दूर दराज और छोटी जगहों पर व्यक्ति को मुसीबत में डाल सकता है|

जैसा दामिनी कांड में आरोपितों के वकील का कहना था उसी तरह NH 10 भी सारांश रूप में वही बात कह रही है| दोनों एक ही सन्देश दे रहे हैं कि आपकी सुरक्षी की जिम्मेदारी आपकी खुद की है और रात में एक समय सीमा के बाद, या किसी भी समय अंजान जगह अंजान लोगों से भिडना, आपके साथ कुछ भी गलत करवा सकता है क्योंकि समाज में बहुत कुछ गलत बसा हुआ है, और आप रसूख वाले हुए तो हो सकता है क़ानून आपके साथ गलत होने के बाद आपकी थोड़ी बहुत सहायता कर दे पर वह आपके साथ गलत को घटित होने से नहीं रोक सकता| क़ानून व्यवस्था के कर्ताधर्ता भी उसी समाज से आते हैं जहां सड़ी गली मान्यताएं पत्थर की लकीर बन कर लोगों से मत्था टिकवा कर उनका पालन करवा रही हैं| फिल्म स्पष्ट रूप से दिखाती है और सन्देश देती है कि जहां का भूगोल न पता हो जिन लोगों का इतिहास न पता हो उनसे पंगा लेना जीवन में बहुत भारी पड़ सकता है, क्योंकि हर जगह उदार व्यस्थाएं कायम नहीं है और मूलतः शक्ति कट्टर लोगों के हाथ में है अब वे कट्टर केवल गाँव-देहात में ही बसते हों ऐसा नहीं है बल्कि कोर्पोरेट में भी अपनी तरह के कट्टर लोग बसे हुए हैं जो किसी के भी आवाज उठाने पर उसे कुचल देते हैं|

कुल मिलाकर हर तरफ जंगल राज है और जीवन तभी तक शान्ति से सकुशल है जब तक कि किसी भी क्षेत्र के कट्टरपंथ से आदमी का टकराव नहीं होता|हरेक को परिस्थिति को देख, जांच और समझ कर अपने विवेक से निर्णय लेना है कि उसे कहाँ, कब और क्या करना है?

गुडगाँव के आख़िरी मॉल की हदों से बाहर ही डेमोक्रेसी समाप्त नहीं हो जाती बल्कि देश की राजधानी दिल्ली या इसकी परिधि के पास ही दिन दहाड़े राजनीतिक विरोधी सफ़दर हाशमी को सड़क पर पीट पीट कर मार दिया जाता है, प्रियदर्शिनी मट्टू को एक पुलिस अफसर का बेटा हफ़्तों तक कॉलेज में परेशान करता है और विरोध करने पर उसका बलात्कार करके उसकी ह्त्या कर देता है, एक नितीश कटारा को एक बाहुबली का बेटा इसलिए मार डालता है कि उसकी बहन नितीश से प्रेम करती है, बाहुबलियों के बेटे सबके सामने एक बार में मॉडल जेसिका लाल के सिर में गोली मार देते हैं, एक नेता अपनी पत्नी को मार कर उसकी लाश के टुकड़े टुकड़े करके तंदुर में जला डालता है| दिल्ली की सीमा पर छोटे बच्चों को अगवा करके एक घर में बरसों से मारा जाता रहा और क़ानून के रखवालों को भनक नहीं लगी| राजधानी में इसी देश के दूसरे राज्य से आए छात्र को लोग दिन दहाड़े मार डालते हैं, क्योंकि वह देखने में उन जैसा नहीं था|

तो यह पाशविकता तो देश की राजधानी की सच्चाई है, तो बाकी देश में क्या हालात हो सकते हैं इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है? और हॉनर किलिंग तो देश की क़ानून व्यवस्था को मुँह चिढ़ा कर देश भर में यहाँ वहाँ घटित की ही जा रही है| यह फिल्म इसी सच्चाई को दिखा कर दर्शकों को डराती भी है|

फिल्म बनने में समय लगता है, और इसकी कथा—पटकथा आदि लिखने का काम तो फिल्म बनाने से काफी पहले सम्पन्न हो जाता है सो हो सकता है देश भर को झिंझोड़ने वाले दिल्ली के दामिनी कांड से पहले ही इस फिल्म की कथा लिख ली गई हो पर शूटिंग तो इसकी इस कांड के बाद ही शुरू हुयी होगी और निर्देशक ने उस कांड के आधार पर इस फिल्म में बदलाव न भी किये हों पर उस कांड की छाया इस फिल्म पर बेहद स्पष्ट रूप में पड़ती दिखाई देती है|

एक युवा युगल दिल्ली में रात में परिस्थितयोंवश ऐसे लोगों के चंगुल में फंस जाता है जिनसे हुयी झड़प लड़के के लिए गंभीर पिटाई का सबब और लड़की के लिए दरिंदगी से किये गये अत्याचार का कारण बन जाती है| लड़की संघर्ष करने के बावजूद उन अपराधिक मानसिकता के लोगों की पाश्विकता का शिकार हो जाती है और बाद में अस्पताल में कई दिन मौत से संघर्ष करके अंत में जिंदगी का साथ छोड़ जाती है पर उसका संघर्ष देश में एक अभूतपूर्व जागरण और संघर्ष का जज्बा उत्पन्न कर देता है और लोग सड़कों पर निकल आते हैं|

फिल्म में मीरा के पति अर्जुन (Neil Bhoopalam) पर दामिनी कांड में लोगों दवारा संघर्ष करने के लिए सड़कों पर निकल आने का प्रभाव नहीं था इसे सहजता से स्वीकार नहीं किया जा सकता| अर्जुन उन्ही लोगों जैसा दिखाइ देता है जो NDTV के जन-जागरण कार्यक्रम से प्रेरित होकर और दामिनी जैसे आंदोलन से प्रेरित होकर ढाबे पर अंजान लोगों दवारा एक युगल पर हिंसा करते देख उनके मामले में कूद पड़ता है जबकि स्थानीय सारे लोग खड़े खड़े तमाशा देख रहे होते हैं क्योंकि वे उसी समाज का हिस्सा हैं जो उन्हें सड़ी गली मान्यताएं मानने के लिए विवश कर रहा है|

बल्कि मीरा भी अपने पास सहायता के लिए आई एक लड़की की मदद करने का प्रयास न करते हुए उससे बचने की कोशिश करती है|

जहां जंगल राज हो वहाँ ऐसे बच कर तमाशाबीन बनना अच्छा है या आग में कूद पड़ना? इस पर अलग अलग लोगों के अलग अलग मत होंगे| पर सौ प्रतिशत लोग इस बात से सहमत होंगे कि देश में क़ानून व्यवस्था बेहद लचर अवस्था में है जिसके कारण पुलिस भी नागरिकों का साथ नहीं देती या दे नहीं पाती| क़ानून का राज होता तो ढाबे पर किसी के भी फोन कर देने पर पुलिस तुरंत आती और युवा दम्पति को मारने के लिए ले जा रहे हिंसक लोगों को पकड़ कर क़ानून के हवाले करती और युवा दम्पति को राहत देती|

यही बात दामिनी कांड के लिए भी सच है, क़ानून व्यस्था सही होते तो क्या यौन कुंठित लोग साहस करते रात नौ बजे के आसपास देश की राजधानी में एक मुख्य रास्ते पर बस में उस लड़की के साथ दरिंदगी करने का? या क्या बाद में लोग यह बात कहते कि उसे रात नौ बजे घर से बाहर रहना ही नहीं चाहिए था| अगर कोई युवती रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, या एयरपोर्ट से रात नौ बजे के बाद घर आ रही हो या इन जगहों पर जा रही हो किसी दूसरे शहर जाने के लिए तो क्या उसके साथ ऐसी दरिंदगी होना मान्य है एक समाज को? देश को क़ानून व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करने की महती आवश्यकता है जिससे यह लोगों के लिए मैत्रीपूर्ण और अपराधियों के लिए भय उत्पन्न करने वाली बने|

अर्जुन पर हीरोइज्म भी हावी है, और लगातार मिलती व्यावसायिक सफलता के कारण सजी संवरी धनाढ्य जीवन शैली और कथित आधुनिकता से उत्पन्न समझ का गुरुर भी और शहर में भी एक अलग किस्म की अल्ट्रा आधुनिक जीवन शैली के कारण उपजा यह नासमझ विश्वास भी कि हर जगह उसकी शक्ति ऐसी ही है जैसी दिल्ली या गुडगाँव में है, जहां उसकी मैत्री पुलिस कमीश्नर से होने के नाते उसके बहुत से काम चुटकियों में हो जाते हैं और किसी मुसीबत में फंसने पर मित्र के कारण पुलिस उसकी मदद दौड़ कर करती है| पर यही विश्वास उसे मुसीबत में डाल देता है और जब तक वास्तविकता को अपनी आँखों से से देख कर उसका हीरोइज्म काफूर होता है और  नई मुसीबत के सामने उसे अपने शक्तिहीन होने का एहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और वह मुसीबत के जाल में फंस चुका होता है| यह भी कहा जा सकता है कि त्वरित रूप से निर्णय लेने की उसकी क्षमता मीरा की तुलना में कमजोर है तभी वह मीरा के बार बार कहने के बावजूद कि जंगल में अनायास सामने आ गया दाढ़ी वाला युवक मानसिक रूप से बच्चा ही है और उसे नजरअंदाज करके वे दोनों भाग सकते हैं, वह घबडाहट में और अपने पास मौजूद पिस्तौल की गर्मी के कारण दूसरी गलती करता है और उसकी यह गलती उन दोनों को एक ऐसी राह पर डाल देती है जहां से वापसी संभव नहीं दिखाई देती| पर इस बार मुसीबत को उसने खुद बुलाया है| मीरा के बार बार रोकने के बावजूद वह पिस्तौल हाथ में लेकर हिंसक समूह के पीछे पीछे जंगल में यह कह कर जाता है,” दीज आर ब्लडी गाँव वाले, बस उन्हें थोड़ा डरा- धमका कर तहजीब सिखा कर आता हूँ”|

बहरहाल दामिनी कांड में यह एक बात तो सभी के दिल में रह ही गई कि काश दामिनी बच जाती या उस रात किसी तरह दामिनी अपने पर आक्रमण करने वाले उन हिंसक, यौन-कुंठित और पाशविक पुरुषों से लोहा लेकर उन्हें परास्त कर पाती|

दामिनी न कर पाई पर NH 10 की मीरा दुर्गम परिस्थितियों से लोहा लेती हुयी पाशविक लोगों से उन्ही की हिंसक भाषा में बात करते हुए जीत हासिल करती है| एक समय जब उसे अपने घायल पति को रेलवे लाइन की पुलिया के नीचे छोड़ना पड़ता है ताकि उन दोनों के पीछे शिकारी कुत्तों की तरह हिंसक लोगों से बचकर वह पुलिस को वहाँ लाकर पति को बचा सके तब उसे नहीं पता है कि क्या वह ऐसा कर पायेगी और क्या उसका पति जीवित रह पायेगा? पर अपने आप बचने और पति को बचाने के लिए प्रयास करने के सिवा उसके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है|

एक बार देखने के लिए और पहली बार देखते हुए यह फिल्म एक ऐसी थ्रिलर लगती है जिसमें दर्शक साँस रोके बैठा रहता है| फिल्म की सबसे बड़ी सफलता इसे ही कहा जायेगा कि अन्य किरदारों के साथ किन्तु परन्तु लगेंगे और अर्जुन के साथ लोग हो सकते हैं और नहीं भी हो सकते हैं, पर बिरला ही खाप के लोगों के साथ होगा और हर कोई मुश्किल से ही पुलिस के चरित्रों के साथ खड़ा दिखाई देगा पर दर्शक मीरा के साथ सामंजस्य बैठा लेता है, मीरा की मुसीबत उसकी अपनी मुसीबत बन जाती है| जब सब कुछ लुट रहा है या लुट चुका है और अपनी जान के लाले पड़े हों और हर आदमी अकेले होने का फायदा उठाता दिखाई दे तब क्या करे?

मीरा के साथ जो घटित होता है उन परिस्थितियों में वह क्या करे?

या तो हार मानकर समर्पण कर दे और दरिंदगी का शिकार हो जाए या इन दरिंदों के खिलाफ यथासंभव मुकाबला करे| मीरा दूसरा, दुस्साहस से भरा, रास्ता चुनती है|

फिल्म बेहद वास्तविक लगती है पर बीच-बीच में और अंत में फ़िल्मी भी हो जाती है| पहली बार दर्शक का ध्यान भंग तब होता है और उसे एहसास होता है कि वह परदे पर चल रही एक फिल्म मात्र देख रहा है जब मीरा घायल अर्जुन को रेलवे की पुलिया के नीचे छोड़ कर मदद के लिए भागती है और पार्श्व में एक बाधा उत्पन्न करने वाला गीत बजने लगता है| ऐसे कुछ अवसर और आते हैं| क़ानून व्यवस्था के पंगु होने से देश में अपने अपने क्षेत्र (भौगोलिक, सामाजिक, एवं आर्थिक क्षेत्र) के बाहुबलियों दवारा जंगल राज कायम करने के दौर में ऐसी फिल्म के अंत को किस तरह का होना चाहिए? पुलिस और क़ानून की कोई भूमिका ऐसी फिल्म के अंत में होनी चाहिए कि नहीं, ये कुछ सवाल उठते हैं| क्योंकि अगर एकदम काल्पनिक कथा वाली और सामाजिक वास्तविकता से परे वाली फिल्म मानेंगें इसे फिर तो शुरू से संबंध जोड़ना मुश्किल हो जायेगा और अगर वास्तविकता से जोड़ें तो जो मार्ग निर्देशक नाना पाटेकर ने अपने निर्देशन में बनी इकलौती फिल्म – प्रहार के अंत में अपनाया वही श्रेष्ठ विकल्प लगता है|

फिल्म के अंत में एक द्वंद रह जाता है कि इसे विशुद्ध थ्रिलर मानें जिसमें संयोग से देश और समाज को प्रभावित करने वाली एक सामाजिक बुराई और अपराध का समावेश हो गया है या इसे उस समस्या पर बहस उठाने वाली फिल्म भी मानी जाए?

यह एक हिंसक फिल्म है और हिंदी सिनेमा में बनी बहुत सी हिंसक फिल्मों में बहुत ज्यादा हिंसा वाली फिल्मों में से एक है| हालांकि हिंसा को हर बार सीधे दिखाने के बजाय हिंसा का असर किरदारों पर दिखाकर दर्शक को हिंसा का एहसास कराया गया है|

विश्व विख्यात फिल्म निर्देशक  Roman Polanski की प्रसिद्ध फिल्म  Chinatown (1974) के डी.एन.ए से पनपी होने के बावजूद

Manorama Six Feet Under (2007) एक स्वतंत्र भारतीय फिल्म थी और उसी तरफ से निर्देशक नवदीप सिंह की नई फिल्म NH 10, कई विदेशी फिल्मों (Deliverance, Eden Lake, Texas Chainsaw Massacre आदि) की नक़ल नहीं बल्कि उन फिल्मों के वंश की फिल्म है और पूर्णरूपेण भारतीय परिवेश में रची पगी फिल्म है और यह एक भारतीय फिल्म ही है|

 

ऐसी कसी हुयी थ्रिलर फिल्म में गीत फिल्म की गति और फिल्म के दर्शक पर पड़ रहे असर दोनों को गलत ढंग से प्रभावित करते हैं| उस लिहाज से फिल्म से ऐसे गीतों को बाहर रखा जा सकता था जो किन्ही दृश्यों में पार्श्व में चल रहे हैं| गाँव में जो संगीत और नृत्य का कार्यक्रम हो रहा है वह तो कथानक का हिस्सा है पर बाकी गीत फिल्म को बाधित ही करते हैं|

अभिनय और संवादों में उपयोग की गई बोली के हिसाब से फिल्म सॉलिड है| कोर्पोरेट जगत में सफलता की सीढियां चढ़ते युवा दम्पति के रूप में अनुष्का शर्मा और नील भूपालम का तालमेल बहुत अच्छा और अभिनय सधा हुआ है| नील चेहरे मोहरे से अभिनेता राज कुमार यादव से काफी मेल रखते हैं पर उनसे ज्यादा सहज और निखरे लगते हैं| अनुष्का शर्मा ने फिल्म के निर्माताओं में से एक हैं और उन्होंने इस भूमिका में अपनी अभिनय क्षमता का भरपूर प्रदर्शन किया है| नील के साथ कुछ अतरंगता दिखाते दृश्यों में वे अपने सहज अभिनय से हिंदी फिल्मों की अभिनेत्रियों के लिए मानक गढ़ने का काम करती हैं| मुसीबत में पड़ने के बाद एक तरह से फिल्म के नायक और नायिका दोनों भूमिकाओं को निभाने की जिम्मेदारी उनके ऊपर ही रहती है और वे बखूबी इस जिम्मेदारी का निर्वहन करती हैं और अपने से पहले ऐसी हिंसक भूमिकाओं को निभाने वाली अपनी पूर्ववर्ती अभिनेत्रियों को पीछे छोड़ देती हैं|

लगभग हर अभिनेता ने अपनी भूमिका में जान डाल दी है और फिल्म में उपस्थित जगहों का स्थानीय प्रभाव बनाने में महती भूमिका निभाई है|

…[राकेश]

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