Tamasha-001बचपन, बचपन से मोहब्बत और बचपन की मोहब्बतें तीनों का इंसान के जीवन में बहुत बड़ा शायद सबसे बड़ा स्थान है| बचपन की मोहब्बतों में आवश्यक नहीं कि यह किसी इंसान से ही मोहब्बत का मामला हो, यह किसी विधा से, किसी स्थान से, किसी बात से, मनुष्य जीवन में प्रकृति में उपस्थित किसी भी बात से हो सकता है और इस मोहब्बत का जज्बा ताउम्र कायम रहे तो मनुष्य कभी बूढ़ा नहीं होता, वह वही रहता है जो वह बचपन में था|

फिर युवावस्था का प्रेम, जिसके अंकुर दरअसल किशोरावस्था में ही फूटने लगते हैं, भी है जो मनुष्य को बहुत कुछ ऐसा सिखाता है जो प्रेम की अनुपस्थिति में मनुष्य कभी सीख नहीं पाता| प्रेम ही वह पहलू है जब प्रेमी, कुछ समय के लिए ही सही, व्यक्ति के लिए स्वयं से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, प्रेमी की उपस्थिति के कारण और उसके प्रेम के कारण और प्रेमी के कारण अपने भीतर जन्में प्रेम के कारण व्यक्ति अपने अस्तित्व को एक अलग उजाले में पहली बार देख पाता है|

अगर आप महान हिंदी लेखक दिवंगत श्री मनोहर श्याम जोशी की धर्मपत्नी भगवती जी की भांति प्रेम-कहानियों के भयंकर प्रशंसक हैं और जिनकी इस पाठकीय-इच्छा की खातिर जोशी जी ने ‘कसप’ सरीखा कालजयी प्रेम-उपन्यास रच डाला, और फिल्म तो काफी बाद में वेद के माध्यम से इस बात को बताती है पर अगर फिल्म के पहले बीस-पच्चीस मिनट में ही आपको अपने बचपन के प्रति रस उमड़ आए, बचपन के प्रति एक नॉस्टेल्जिया आपको घेर ले, तो फिल्म आपसे संबंध स्थापित कर लेगी और अंततः फिल्म के दोनों तत्व – बचपन और प्रेम, आपको अपने सम्मोहन में बांध लेंगें और फिल्म के साथ आपकी यात्रा लुभावनी और अतरंगी हो जायेगी| अगर दोनों ही बातें आपके साथ घटित नहीं होतीं तो संदेह है कि फिल्म के दिल और आपके दिल के बीच कोई संगम हो सकेगा|

बचपन को थोड़ा बाद के लिए छोड़ कर पहले प्रेम के पहलू को देख लें|

फ्रांस में स्थित और इटली से नजदीक कोर्सिका में घूमने आई हुयी एक परेशान भारतीय युवती, जो कि इसलिए परेशान है क्योंकि उस का बैग चोरी हो गया है या खो गया है और जिसमें उस का पासपोर्ट, सारे पैसे और अन्य जरूरी कागजात थे, से एक भारतीय युवक मिलता है|

युवक दवारा थोड़ी सहायता करने से हल्की सी सहज हुयी युवती जब युवक से अपना परिचय देने की शुरुआत ही कर रही है तभी युवक उसे रोक देता है और कहता है कि अगर हम दोनों ने आपस में परिचय कर लिया तो हो सकता है भारत में हम दोनों के मध्य कुछ ऐसा समान परिचय निकल आए और हम प्रगाढ़ता के ओर बढ़ जाएँ पर तब वह वही सब कुछ नहीं कर पायेगा जिसे करने वह भारत से कोर्सिका आया है, जहां उसे कोई नहीं जानता कि वह कौन है, और यहाँ वह कुछ भी बिना किसी हिचक के, बिना किसी ऐसे दबाव के कर सकता है कि लोग देखेंगें तो क्या लहेंगें, और इसी असामान्य भाषण के पश्चात बेहद नाटकीय फ़िल्मी अंदाज में वह अपने को ‘डॉन’ कहता है, जिसके पीछे बारह मुल्कों की पुलिस पड़ी हुयी है और वह कोर्सिका में तेजा का सोना लेने आया है| युवती भी ‘मोना डार्लिंग’ बन जाती है, और यह युगल कोर्सिका में एक दूसरे की असली पहचान एक दूसरे से ही छिपाकर कुछ दिन स्वछन्द, खिलंदड़ा, जिजीविषा से भरा, गीत-संगीत- और नृत्य से भरा आनंददायक समय व्यतीत करते हैं| कोर्सिका दोनों को कैथार्सिस करने का मौक़ा देता है|

दोनों के मध्य एक करार होता है कि दोनों एक दूसरे से अपने अपने बारे में सिर्फ झूठ ही बोलेंगें और कोर्सिका से जाने के बाद कभी आपस में नहीं मिलेंगें|

पर कहने और अमल करने में अंतर होता है| कहा दिमाग से जाता है और अमल दिल करवाता है| दिमाग ने जो वादे किये उनसे उनके दिल, कम से कम युवती का दिल अछूता ही रहा| कोर्सिका में उसके साथ असामान्य ही घटा| न तो वह पहले कभी ‘डॉन’ जैसे युवक से मिली थी और न ही जीवन में ऐसा समय व्यतीत किया था जिस बेलौस अंदाज में उसने ‘डॉन’ के साथ कोर्सिका में व्यतीत किया| युवती ही नहीं हर दर्शक को ‘डॉन’ बने युवक के देव आनंद रूपी हास्य-और रोमांस वाले अंदाज अपने साथ बहा ले जाते हैं|

अचानक लोगों को

प्यार हो जाता है

किसी भी घड़ी

या रास्ते से गुजरते हुए

मगर लोग मानने के लिए तैयार नहीं होते

कि हम एक ही रास्ते से गुजर रहे हैं| (दिनकर कुमार)

युवक के सामने तो लक्ष्य निश्चित था कि वह वहाँ एक अंजाने की तरह समय व्यतीत करने आया था, पर युवती बचपन से फ्रेंच Asterix comics की दीवानी रही है और उसी मोह के नाते एक बार कोर्सिका आना चाहती थी और उसे इच्छा की पूर्ति के लिए वहाँ आई है| युवक का अपने भावों के प्रति, अपने इच्छाओं के ऊपर एक नियंत्रण दिखाई देता है| युवती, युवक के जाने बिना ही अपने को ढ़ीला छोड़ देती है और दोनों के मध्य हुए करार का पालन ऊपरी तौर पर करते रहने के बावजूद अंदर से अपने को बहाव के साथ बहने देती है| युवती को विश्वास है कि युवक अपने प्रतिज्ञाओं पर, जो भले ही उसने हँसी-मजाक के अंदाज में कही हों, दृढ़ रहेगा|

यात्राओं को समाप्त होना होता है और यात्रे घर वापिस आ जाते हैं| युवती भी भारत आने के लिए चल पड़ती है पर जीवन में फिर कभी ‘डॉन’ से न मिल पाने की कसक इतनी तेवर आवेग वाली है कि भारत चलने से कुछ क्षण पहले ही वह अपनी ओर से किया वादा तोड़ देती है|

बाअदब, बामुलाहिजा, होशियार! जब जीवन में प्रेम का आगमन होता है तो मनुष्य का अस्तित्व, उसकी समझ, उस का जीवन जीने के प्रति दृष्टिकोण, भावों और भावनाओं को महसूस करने की क्षमता सभी कुछ बदलता है| और सबसे ज्यादा बदलता है अपने प्रेमी के सिवा अपने संपर्क में आने वाले अन्य व्यक्तियों के साथ उसका होना, या बर्ताव करना|

कवि नीरज ने देव आनंद के चरित्र के लिए प्रेमपुजारी में लिखा था, – याद तू आए, मन हो जाए, भीड़ के बीच अकेला,

लेखक और निर्देशक इम्तियाज अली ने प्रेम रस का अन्वेषण और विश्लेषण भली भांति किया है| प्रेम रस के रसिया दर्शक एक पार्टी में अकेली खड़ी युवती की ओर हसरत भरे अंदाज में बढ़े चले आ रहे युवक को हाथ के इशारे से रोकती हुयी और फिर अपने किये पर हँसती और बाद में अपने घर के एकांत में अंदर उमड़ रहे प्रेम के अतिरेक में नृत्य करती युवती को देखें!

युवती दवारा स्वयं को प्रेम में पड़ जाने के अहसास को जीते हुए दिखाते हुए पार्श्व में चलते गीत – हीर तो बड़ी सैड है, का प्रदर्शन फिल्म बड़े जीवंत और भव्य अंदाज में करती है और बताती है कि अब जो खूबसूरती का अर्थ सैक्स अपील में सिमट कर रह गया है वह कितनी भोंडी परिभाषा खूबसूरती को नये युग ने दे दी है| इस गीत पर थिरकते वृद्ध के सामने के दातं टूटे होने के बावजूद उसके चेहरे के आनंद में एक आकर्षक खूबसूरती है, जो बाहरी रूप की नहीं अंदुरनी आनंद की है|

प्रेम में जब कोई व्यक्ति हो जाए तो जो उस के साथ होता जाता है बस वही सब कुछ युवती के साथ होता है| कुछ बरस बीत जाते हैं, अन्यों के साथ रोजाना मिलने के बावजूद युवती हरदम उस युवक के साथ ही रहती है जिसे उसने कोर्सिका में ‘डॉन’ के रूप में जाना था| ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होए... प्रेम के रस में सरोबार होकर युवती परिस्थितियाँ स्वयं गढ़ती है और दिल्ली आ जाती है जहां युवक रहता है|

युवक एवं युवती ने तो कोर्सिका में एक दूसरे से वादा किया था कि वे बाद में कभी एक दूसरे से नहीं मिलेंगें पर युवती तो ऐसी स्थितियां निर्मित करती है जिससे युवक उससे मिलना टाल ही न सके|

भारत में सामान्यतः लड़कियों के लिए तय आयु सीमा पार कर चुकी और शोध कार्य में जुटी एक युवती ने ऐसे ही समय काटते क्षणों में हल्की फुल्की बातचीत में एक बार अपने साथियों से कहा था, काश वह टीवी पर तारा सीरियल और फिल्मों में लम्हे उस वक्त देख लेती जब उसे इनसे मिली सीख की सख्त जरुरत थी तो उसके जीवन की दिशा कुछ और ही होती और जीवन इस तरह नीरस सा और मशीनी न होता|

फिल्म की नायिका पहल करना जानती है और वह – तुम ही पहल करो न, की झिझक से परे आ चुकी आधुनिका है| वह युवक के प्रति अपने प्रेम का इजहार करती है|

युवक अब वेद (वर्द्धन साहनी) और युवती तारा (माहेश्वरी) के अपने असली नामों के साथ एक दूसरे से मुखातिब हैं| नाम तो उनके असली सामने आते हैं पर क्या रूप भी असली हैं| खासकर वेद का?

तारा थोड़ा देर से और दर्शक इस भाग के शुरू से ही वेद के नये रूप को देख आश्चर्य में रहते हैं| दर्शक को लगता है वह अभी भी अभिनय कर रहा है| उसके दवारा मशीनी अंदाज में अपनी सारी दिनचर्या को निबटाते देखना ऊबाऊ है और लगता ही नहीँ कि यही वेद कोर्सिका वाला डॉन है|

तारा इस अंतर को थोड़ा देर से जान, पहचान और समझ पाती है और जब तक ऐसा होता है उससे मिलना वेद की आदतों में सहार हो जाता है| औसत व्यक्ति के जीवन की परिपाटी के अनुसार वेद, तारा से विवाह करने की ओर कदम उठाकर उसे अंगूठी पहनाकर शादी का प्रस्ताव उसके सम्मुख रखना चाहता है| औसत व्यक्ति के जीवन में संबंध की यही परिणति है, पर वेद में डॉन ढूँढ रही तारा के समक्ष यह पल जागृति वाला बन जाता है, वसह सहसा नींद से जागती है और वेद से ही पूछती है कि डॉन कहाँ है?

अक्सर क्या यह हमेशा होने वाली बात है कि किसी संबंध में व्यक्ति अपने साथी की कोई छवि अपने मन में निर्मित कर लेता है और उस छवि के सहारे उस व्यक्ति के प्रति अपने अंदर प्रेम को पालता-पोसता रहता है| कथित प्रेमविवाहों में तो हमेशा ही कुछ अरसे बाद मोहभंग की स्थिति आती है और किसी एक का या दोनों को ही लगता है कि उनका प्रेमी वही तो नहीं जो तब था जब प्रेम के झूले हिंडोले ले रहे थे| अब विवाह बाद तो यह कोई और ही शख्स बन गया है|

ऐसा नहीं कि अब उनसे मोहब्बत नहीं रही

बस जज्बात में पहले सी शिद्दत न रही

और शिद्दत के बिना तो कुछ भे जीवित नहीं बचता| शिद्दत बिना जीवन एक रस्म है, जीने का तरीका नहीं| और जज्बात में शिद्दत प्रेम भी एक रस्म भर है, एक जीवंत संबंध नहीं|

रूटीन जीवन जीते अपने व्यवसाय में धीमी किन्तु सधी गति से सफलता की सीढ़ी चढ़ रहे आधुनिक वेद के लिए तारा की बातें ऐसी धारदार साबित होती हैं जिनकी चोट वह कुछ समय पश्चात महसूस करने लगता है|

उसका अंतर्मन डॉन की भांति स्पष्ट न होकर जटिल है| अब उसकी लड़ाई अपने स्वयं से है और इसमें वह बिखरने लगता है|

कहने को वह तारा को या तारा के प्रति अपने मित्रों से कहता है –

तेरे बगैर किसी चीज की कमी तो नहीं

पर अंदर से शेर की दूसरी पंक्ति उसके लिए ज्यादा सत्य है

हाँ, तेरे बगैर दिल उदास रहता है|

प्रेम का कांटा उसके अंदर धंस चुका है, प्रेम में सफलता और असफलता दोनों ही व्यक्ति के अंदर खलबलाहट मचा देती है|

वेद की जटिल प्रकृति के पीछे कुछ कारण है| तारा उससे कहती भी है कि स्मार्टनेस में उसने वेद के अंदर उपस्थित किसी कॉम्प्लेक्स को छू दिया|

वेद के कॉम्प्लेक्स के पीछे शायद उसका बचपन हो!

बचपन से ही कम से कम लगभग हरेक भारतीय एक बात सुनता हुआ बड़ा होता है कि – बचपना छोड़ो| और बच्चों से यह कहने वालों को यह अहसास तक नहीं होता कि बहुधा वे बच्चों को उनके बचपन ही छोड़ देने को कह रहे हैं और ऐसा करना हरेक बच्चे के लिए अपने स्वाभाविक विकास की संभावनाओं के पर कुतरने जैसा ही होता है| आर्थिक रूप से समाज के हर वर्ग के बच्चों पर उनके माता-पिता अपनी इच्छाएं आरोपित करते हैं और चाहते हैं कि उनके बच्चे वे बन जाएँ जो वे अपनी अनुभवी उम्र और आँखों से देख पा रहे हैं कि ऐसा बनकर उनके जीवन सुख-साधनों से सम्पन्न रहेंगें और आराम से बिना अकिसी आर्थिक संघर्ष के वे अपने जीवन व्यतीत कर सकेंगें| वे अपने अनुसार अपने बच्चों के भले के लिए ही बच्चों के लिए सपने जन्माते हैं, उस राह पर चलाने के लिए बेहद मेहनत करते हैं, खूब खर्च करते हैं, और गरीब और निमं-मध्यवर्गीय लोग तो अक्सर ही अपनी आर्थिक सीमाओं से बहुत दूर या ऊपर जाकर अक्सर अपने बच्चों के सुखद भविष्य के लिए धन खर्च करते हैं, बहुत से इस लकीर पर चलकर सुख-साधनों से सम्पन्न जीवन पा भी जाते हैं और आगे वे अपने बच्चों के साथ इसी लकीर का पालन करना शुरू कर देते हैं| लेकिन बहुत से बच्चे ऐसे भी हैं जो अपने माता-पिता दवारा गढे गये लक्ष्य की पूर्ति हेतु मार्ग पर चलने के कारण अपनी स्वाभाविक विकास की संभावनाओं को निरंतर कुचलते रहने के कारण अपने भीतर दो हिस्सों में बंट जाते हैं और एक वह हिस्सा है जो अपने लिए प्रकृति दवारा निर्धारित मार्ग पर चलकर खिल सकता था पर अब सुप्तावस्था में ही पड़ा रहता है, और एक दूसरा हिस्सा है जो मुखर है, और जिसके बाहरी विकास की खातिर इंसान को बचपन से ही अपने लिए उपलब्ध ऊर्जा का सबसे बड़ा हिस्सा खर्चना अपद्ता है और बहुत से इस अंदुरनी संघर्ष में बुझ जाते हैं, बहुत से जीवन भर थके हुए से काम करते हैं और एक दिन रिटायर होकर अपने घर कुर्सी पर बैठ सोचा करते हैं – क्या खोया क्या पाया, बहुत से इस संघर्ष के दौरान ही हरिवंश राय बच्चन की पंक्ति गुनगुनाया करते हैं –

 

जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला

कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ,

जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

जिसमें जो गुण स्वाभाविक रूप से है और आगे पनप कर उसके व्यक्तित्व को पूर्णतया खिला सकता है और उसे आत्मिक संतोष दे सकता है, उसे बचपन से दबाकर, दूसरों को देखकर गोद लिए गुण विकसित करने में अपने पूरे व्यक्तित्व को और इसकी उर्जा को लगा देना ऐसा ही है कि जो व्यक्ति वटवृक्ष बन सकता था वह बोन्साई ही बन कर रह गया| फिर व्यक्ति मशीन जैसा बन जाता है और कुछ सालों या दशकों तक एक मशीन की भांति रूटीन जीवन व्यतीत करके काम से अवकाश प्राप्ति ग्रहण करता है और शायद अपने मरने का इंतज़ार करता है| अपने स्वाभाविक गुणों के साथ जीकर जो जीवन एक उत्सव बन सकता था वह एक मजबूरी बन कर रह जाता है|

फिल्म- तमाशा, का वेद (रणबीर कपूर) एक ऐसा ही युवा है जिसे बचपन से पिता के निर्देशों पर अपनी स्वंय की इच्छाओं के बलि चढ़ानी पड़ी है| वह गणित पसंद नहीं करता पर पिता उसे जबरदस्ती गणित पढ़वाते हैं ताकि वह इंजीनियरिंग कर सके| वेद कहानियों को सुनने, उनकी कल्पना करने का रसिया है| पर इस एक बात से उसके लिए कैसे भविष्य की कल्पना उसके पिता कर सकते हैं? वे उसे बताते हैं कि जीवन जीने में सिर्फ अपनी इच्छा और पसंद से ही काम नहीं चलता अगर वेद के दादाजी ने भी बंटवारे के बड़ा पाकिस्तान से भारत आने पर अपनी पसंद की ही बात की होते तो वे परिवार को पाल नहीं सकते थे और तब उनका वंश समाप्त हो जाता| उन्होंने अपने ऊपर परिवार की जिम्मेदारियों को देखते हुए एक फैक्ट्री में काम किया और परिवार का पालन पोषण किया|

अपने पिता दवारा बनाई गयी राह पर चल वेद मशीनी हो जाता है पर गाहे-बेगाहे वेद की कहानियों के प्रति रूचि और कल्पना करने की क्षमता हिलोरें मारती रहती है| और यह रूचि तारा से दूरी के बाद अपने अस्तित्व की सार्थकता को खोजते वेद के भीतर फिर से सिर उठाने लगती है|

उसका अंदुरनी संघर्ष प्रेम का तप पाकर ही शांति को प्राप्त हो सकता है| वेद को भी प्रेम को जानने और पहचानने के दौर से गुजरना है|

प्रेम एक अंतहीन रहस्य है

क्योंकि इसे समझाने के लिए

उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है

प्रेम को स्वीकारने के बाद ही वेद के अंदर का द्वैत समाप्त होता है और अंदर बाहर वह एक बन जाता है|

फिल्म में केवल वेद और तारा मध्य ही रोचक दृश्य नहीं है बल्कि अन्य किरदारों के साथ भी अच्छे दृश्य रचे गये हैं| तारा के घर पर बवाल काट कर ऑटो में लौट रहे वेद द्वारा कुढ़कर ऑटोवाले का मजाक बनाते हुए उससे संवाद स्थापित करना और बाद में दोनों का वार्तालाप और उसके बाद ढ़ाबे का दृश्य जहां ऑटो वाले के गाने की प्रतिभा के प्रदर्शन से वेद के अंदर कहानी कहने की अपनी अंदुरनी प्रतिभा को फिर से बाहर निकालने की प्रेरणा मिलती है, ये सब बेहद रोचक दृश्य हैं|

तारा दवारा वेद की हालत देख न सकने की हालत में उसके सामने रेस्त्रां में लगभग गिडगिडाने वाला पूरा भाग दीपिका पादुकोणे को बेहद समर्थ अभिनेत्री के रूप में प्रदर्शित करता है| दीपिका ने इस फिल्म में मिले तारा की भूमिका का पूरा लाभ उठाया है और ‘फाइंडिंग फैनी’ और ‘पीकू’ के बाद अपनी बेहतरीन होती अभिनय प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया है| इम्तियाज अली की ‘लव आज-कल’ ही वह फिल्म थी जिसके भावनाओं से भरे दृश्यों में दीपिका की अभिनय प्रतिभा उभर कर सामने आई थी| इससे बेहतर ‘तारा’ की भूमिका का निर्वाह करने वाली अभिनेत्री आज के दौर में फिल्म को शायद ही मिलती|

रणबीर कपूर न केवल अपनी फिल्मों के चयन बल्कि निरंतर निखार पाती अपनी अभिनय क्षमता से लगभग हमेशा ही चौंकाते हैं| डॉन और वेद के दो बिल्कुल अलहदा चरित्रों और फिर दोनों को एक साथ साधने वाले, और इस दौरान भ्रमित और कुंठित युवक की भूमिका, जो अपने सच और अपने वास्तविक अस्तित्व की तलाश में है, की जिम्मेदारी उन्होने बखूबी निभाई है| देव आनंद की मिमिक्री करते हुए लोग असल में उस अभिनेता की मिमिक्री करते हैं जो देव आनंद की मिमिक्री करके अपना अभिनय जीवन चलाता रहा है| रणबीर ने इस सिलसिले को तोड़ने का प्रयास किया है वे, बिल्कुल परफेक्ट तो सिद्ध नहीं होते और पूर्णतया सफल भी नहीं होते पर औरों से अलग इस बात का जिम्मा वे उठा ले गये हैं| वैसे सच यही है कि देव आनंद की नक़ल करते हुए परदे पर वैसा खूबसूरत और वैसा प्रभाशाली दिखना लगभग असंभव बात है, चाहे कोई कितना ही बढ़िया अभिनेता क्यों न हो, देव की नक़ल करते हुए हास्य की ओर जाना ही पड़ेगा, उनकी गंभीर नक़ल कोई अभिनेता न कर पायेगा| ऐसा देव के अन्य दो साथियों राज कपूर और दिलीप कुमार के लिए भी सच है| अभिनेताओं और निर्देशकों की भलाई इसी में है कि वे ऐसे प्रयास न ही करें|

फिल्म के लिए अच्छा संगीत रचा गया है और संगीत का इस्तेमाल भी बेहतरीन हुआ है|

इम्तियाज अली ने यूं तो कई सफल फ़िल्में बनाई हैं और मूलतः वे प्रेम कहानी हे कहते हैं पर प्रेम कहानी की मासूमियत जैसी वे अपनी पहली फिल्म – सोचा न था, में बरकरार रख पाए वैसा बाद की फिल्मों में नहीं हो पाया और उनमें फ़िल्मी लटके झटके प्रवेश कर गये| अब ‘तमाशा’ में उन्होंने फिर से एक प्रेमकथा को एक अलग अंदाज में दिखाने का कार्य सफलतापूर्वक किया है|

तमाशा’ देखकर दर्शक के सम्मुख इसकी कथा के हिस्सों के एकरेखीय अंदाज में न लाना और फ्लैश बैक में भी दृश्यों अक आगे-पीछे लाये जाने की योजना के मद्देनज़र यह तो महसूस होता ही है कि अगर निर्देशक फिल्म को कोर्सिका के उस दृश्य से ही शुरू करते जहां तारा, रेस्त्रां वाले से फोन करने के लिए प्रार्थना कर रही है तो फिल्म में एक अलग ही ऊर्जा दर्शक के साथ संबंध बनाती| अभी शुरू के पन्द्रह मिनट दर्शक से एक मजबूत संबंध नहीं बना पाते बल्कि उसे उबाते ज्यादा है और जब आगाज अच्छा न हो तो दर्शक फिल्म से इतर बातें सोचने लगते हैं| वेद के बचपन के दृश्य फिल्माए गये हैं यह हिंदी सिनेमा के लिए सुखद स्थिति है लेकिन फिल्म में उनकी प्लेसमेंट बेहतर हो सकती थी|

दूसरी बात जो खटकती है वह है तारा और वेद के मध्य दूरी आ जाने के पश्चात बहुत सारे दृश्य अकेले वेद पर केंद्रित किये गये हैं, जबकि फिल्म की जन उन्ही दृश्यों में ज्यादा बसती है जहां वेद या तो तारा के साथ है या अन्य किसी रोचक किरदार के साथ|

पर कुल मिलाकर ‘तमाशा’ एक अच्छी, भिन्न (हिंदी की तत्कालीन रोमांटिक कॉमेडी फिल्मो से) एवं रोचक फिल्म है, और प्रेमकथाओं के रसिकों के लिए एक अच्छी सामग्री!

…[राकेश]

 

 

 

 

 

 

 

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