Ahalyaहर बुरा भाव मनुष्य के भीतर ही बसता है, किसी भी किस्म का लालच हो वह उसके भीतर के संसार को निर्मित करता है| साधू अपने अंदर के इस कलुषित संसार का शोधन करता रहता है, उस शुद्धतम अवस्था को प्राप्त करने के लिए जहां से वह अध्यात्म की उर्ध्वाकार गति प्रारम्भ कर सकता है| बाकी सभी सांसारिक कृत्यों में रम कर जीवन व्यतीत करने वाले मनुष्य अपने अंदर की लालसाओं, भावनाओं, और तृष्णाओं पर परदे डाले रखते हैं|

क्रोध बाहर नहीं अंदर ही बसता है, बस कुछ ऐसा दिख जाए जो इसका भोजन हो और यह जाग्रत हो जाता है, यही हर किस्म के भाव के साथ है, चाहे वह प्रेम जैसा अच्छा भाव हो या घृणा जैसा बुरा भाव| इस सांसारिक संसार में मनुष्य के आदिकाल से और इसके अंत तक इन्ही भावों के कारण अपराध होते रहेंगें जो एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के खिलाफ करता रहेगा| पकडे जाने का भय न हो तो मनुष्य भांति भांति के कृत्यों में सलंग्न रहता रहे| बहुत से, बहुत सारे काम, जिन्हें समाज बुरा कहता है, इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें पोल खुलने का भय रहता है पर इसका मतलब यह नहीं कि अपने अंदर के संसार में वे इन कृत्यों को नहीं करते वे अपने दिमाग में ये सारे काम करते रहते हैं|

स्वभाव बदलना सांसारिक मनुष्य के लिए संभव नहीं है| वह केवल अच्छा दिखने के लिए जो समाज को चाहिए वह मेकअप की तरह ओढकर अपने को प्रस्तुत कर सकता है|

अभी हाल में दो सौ- तीन सौ रूपये एक दिन में कमाने वाले एक गरीब रिक्शेवाले को डेढ़ लाख के आसपास रुपयों से भरा बैग मिला और उसने वह बैग पुलिस को दे दिया| यह इतनी बड़ी रकम नहीं थी कि इसके इस्तेमाल से उस पर कोई आंच आ जाती पर ईमानदारी उसका स्वभाव थी और उसने बेईमानी को अपने ऊपर हावी न होने देकर ईमानदारी को अपनाया| अपने देश में बहुमत ऐसे ही लोगों का होगा जो इस पैसे को रख लेते|

सालों से ईमानदारी का डंका पीटने वाले लोग भी इसे रख लेते क्योंकि किसी ने उन्हें इस बैग को पाते हुए देखा नहीं होता और जो देखा नहीं गया या देखा नहीं जा सकेगा वहाँ सत्कर्म की भावना संसार में बेहद कम लोगों के अंदर होती है, भारत जैसे विकाशसील देश में तो यह भावना देखना दुर्लभ है|

आनंद बख्शी के एक बेहतरीन गीत की पंक्तियाँ हैं

हम को जो ताने देते हैं हम खोये हैं इन रंगरलियों में

हमने उनको भी छुप छुप के आते देखा इन गलियों में

हिंदू मिथकों और पौराणिक कथाओं में गौतम ऋषि, उनकी अतिसुन्दर कही जाने वाली पत्नी अहिल्या और देवराज इंद्र की कहानियों के कई संस्करण मिलते हैं| सभी में एक बात समान है कि इंद्र का दिल अहिल्या की सुंदरता देख उस पर मोहित हो गया था और तडके भोर में जब गौतम ऋषि नदी में स्नान के लिए गये थे और इंद्र को पता था कि वे अब पूजा अर्चना आदि के बाद ही लौटेंगें और वह गौतम ऋषि का रूप धारण करके उनके शयन कक्ष में सोती अहिल्या के पास बिस्तर पर लेट गया और अहिल्या को शारीरिक संपर्क के लिए लुभाने लगा| उनींदी अहिल्या को दिखने में अपने पति ही दिखाई दिए पर कुछ देर बाद उसे कुछ संदेह हुआ पर तब तक देर हो चुकी थी, इंद्र उस पर हावी होने लगा था और दोनों के दुर्भाग्य से गौतम ऋषि वहाँ पहुँच गये और क्रोध में उन्होंने इंद्र को शाप दिया और अहिल्या का परित्याग कर दिया| कहा जाता है कि गौतम ऋषि ने अहिल्या को शिला बन जाने का शाप दिया और जब विश्वामित्र के साथ वनागमन कर रहे राम ने उनका स्पर्श किया तो वे शिला से स्त्री बन गयीं| इस मिथक की सार्थक लगने वाली अपनी व्याख्याएं हो सकती हैं पर मूल बात यह है कि लगभग हरेक के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या अहिल्या की कोई गलती थी इस सारे कांड में? क्रोध शांत होने पर गौतम ऋषि को संतुलित दिमाग से सोचकर क्या अहिल्या का पक्ष देखने का विचार नहीं गुजरा?

बहरहाल निर्देशक सुजॉय घोष (विद्या बालन वाली फिल्म – कहानी, के निर्देशक) ने गौतम, अहिल्या और इंद्र की उस कथा को अपने ढंग से नया रूप दिया है|

इस नये रूप में गौतम, अहिल्या के मनमोहक व्यक्तित्व और शारीरिक सौंदर्य को एक चारे के रूप में इस्तेमाल करते हैं इंद्र रूपी युवकों को लुभाकर उनकी वासना के लिए उन्हें दंडित करने के लिए| अहिल्या भी उनके इस अभियान का एक सहर्ष हिस्सा है और शिकार को फंसाने के लिए वह अपना हिस्सा बखूबी निभाती है|

मिथक के इस नये रूप में इंद्र अब इन्स्पेक्टर इंद्र सेन (Tota Roy Chowdhury) हैं जो अर्जुन नामक युवक की गुमशुदगी के केस के सिलसिले में पूछ्ताछ करने क्याती प्राप्त कलाकार गौतम साधू (Soumitra Chatterjee) के घर पहुंचता है, जहां एक युवती अहल्या (Radhika Apte) दरवाजा खोलती है| अहल्या की खूबसूरती से अभिभूत इंद्र के मन में अहल्या को देख कर लालसाएं जागी हैं यह निर्देशक के निर्देशन में कैमरा दिखा देता है, और न केवल दिखा देता है बल्कि इंद्र के आगे आगे चलती अहल्या को देखकर हर पुरुष दर्शक के अंदर क्या चल रहा है इसकी खोज खबर भी उसे दे देता है| इंद्र ही आगे चलती अहल्या को नहीं देखता बल्कि उसके माध्यम से हर पुरुष दर्शक भी उसे देख रहा है|

वृद्ध गौतम को देख कर इंद्र अहल्या को गौतम की बेटी समझता है पर गौतम सुधार कर बताता है कि अहल्या असल में उसकी पत्नी है और वही उसकी प्रेरणा है एक से बढ़कर एक कलाकृतियां गढ़ने के पीछे|

सेना, पुलिस, और जासूस या कहिये क्षत्रिय के रूप में परिभाषित मनुष्य में उसके सामने आए मामले में छिपे हुए जानने की उत्कट इच्छा होती है, क्षत्रिय के भीतर प्रकृति में अपने साहस के बलबूते अंजान को जान लेने की इच्छा भी होती है, वैसे तो हर इंसान में होती है पर इस अंजान को जानने के खतरे से डर कर अन्य वर्ग के इंसान पीछे हट जाते हैं| दूसरा भाव जो मनुष्य को और ज्यादा पाने, और अन्यों से अलग पाने क भाव होता है और यह लालच उसे बहुत कुछ करने के लिए विवश करता है|

हम न मरिहें मरिहें संसारा

यह एक सामान्य सी बात है कि किसी ऐसी विपत्ति के बारे में सोचते हुए भी जिसमें सभी लोगों के मरने की आशंका हो, ज्यादातर मनुष्य यही सोचते हैं कि वे तो बच ही जायेंगें| ऐसे ही किसी भी लालच के वशीभूत कम करते हुए मनुष्य यही सोचते हैं कि अन्य लोगों का नुकसान हुआ होगा पर उनका कोई नुकसान लालच के साथ जाने में नहीं होगा बल्कि किसी अपराध को करते हुए भी यही भाव रहता है कि अन्य लोग पकडे गये होंगे वे तो बच ही जायेंगें, यही भावना दुनिया में अपराध का कारोबार कायम रखे हुए है| यही भावना है जिसके कारण लोग समाज की निगाह में अवैध समझे जाने वाले संबंध बनाते हैं, सुखद वैवाहिक जीवन के चलते रहने के बावजूद विवाहेत्तर संबंध बनते चले जाते हैं और वैवाहिक बंधन टूटते चले जाते हैं|

हिंदी फिल्मों के सुपर स्टार शाहरुख खान ने एक बार यह पूछे जाने पर कि उनके साथ एक से बढ़कर एक आकर्षक अभिनेत्रियों ने काम किया है पर कभी उनके किसी के भी प्रति आकर्षित होकर अफेयर चलाने के बारे में अफवाह तक भी नहीं उड़ी, शाहरुख ने कहा था,” आई वेल्यूड माई पीस ऑफ माइंड मोर देन सच अ’ टेम्पोरेरी टेम्पटेशन”|

बहुत लोग ऐसे टेम्पटेशन को नजरंदाज नहीं कर पाते और उसका शिकार बन जाते हैं| और इस बात की बहुत बड़ी भूमिका ऐसे प्रलोभनों क वशीभूत होते हुए होती है कि किसी को पता नहीं लगेगा अतः उन्हें कोई भी कीमत अदा नहीं करनी है|

इंद्र के मन में अहल्या के प्रति आकर्षण पनप चुका है और अहल्या की हरकतें उसके अंदर इस आकर्षण को तीव्रता प्रदान करती हैं|

अब अहल्या के दृश्य से अनुपस्थित होने का समय है ताकि इंद्र उसकी अनुपस्थिति को महसूस कर सके|

अर्जुन के बारे में पूछताछ का जवाब देते हुए गौतम साधू उसे एक पत्थर दिखाते हैं और कहते हैं कि यह जादुई पत्थर है और उसे इंद्र और अहल्या की कथा याद दिलाते हुए कहते हैं कि इंद्र के पास ऐसा ही जादुई पत्थर था जिसके कारण उसके पास शक्ति थी कैसा भी रूप धारण करने की| वे कहते हैं कि इस पत्थर में भी ऐसी जादुई शक्ति है इसे हाथ में लेकर अगर कोई व्यक्ति किसी और का रूप धारण करने की इच्छा रखता है तो वह उस व्यक्ति के रूप में परिवर्तित हो जायेगा|

एक आधुनिक पुलिस अधिकारी होने के नाते इंद्र के लिए यह बात बकवास है, सभी के लिए होगी| पर गौतम के यह कहने पर कि अर्जुन, जिसके बारे में खोज खबर लेने इंद्र वहाँ आया है, ने इस पत्थर की जादुई शक्ति के बारे में जान लिया था और संयोग से जब गौतम अपनी पत्नी अहल्या का मोबाइल देने ऊपर के कमरे में गया और वापिस आया तो अर्जुन गायब था और यह पत्थर फर्श पर पड़ा था और हो न हो अर्जुन ने इस पत्थर की सहायता से किसी और व्यक्ति का रूप धारण कर लिया क्योंकि वह ऐसा करना चाहता था, इंद्र के सामने एक उत्सुकता जाग जाती है| इस पत्थर का रहस्य जानने के बारे में|

दूसरा प्रलोभन, जिसके बारे में उसके मन में पहले से ही स्थान बन चुका है, इंद्र के सामने आता है जब गौतम उसके सामने प्रस्ताव रखता है कि इस पत्थर को हाथ में लेकर वह कल्पना करे कि वह गौतम साधू है और ऐसा करने के बाद वह अहल्या का मोबाइल ऊपर जाकर उसके कमरे में उसे दे दे, उसे अपने आप पता चल जायेगा पत्थर जादुई है या नहीं|

पत्थर के बारे में जानना और अहल्या से एकांत में दुबारा मिल पाना, दो ऐसे प्रलोभन हैं इंद्र के सामने, जिनकी अनदेखी वह नहीं कर पाता|

और ऊपर जाकर उसके सामने सबसे बड़ा प्रलोभन अहल्या रखती है जिसके आगे अपने खुद के लालच के वशीभूत होकर वह अपने को विवश पाता है और गौतम दवारा निर्धारित परिणति को प्राप्त होता है|

अगर इंद्र के अंदर अहल्या को पाने का लालच न होता तो पुलिस अधिकारी का दिमाग रखने के नाते वह गौतम को कहता कि वही इंद्र या किसी और का रूप धारण करके दिखाए| और इतनी समझ तो एक आम इंसान में भी होगी जो पुलिस अधिकारी न भी हो कि गौतम साधू ने उसे मोबाइल देने के लोइए ऊपर अपनी पत्नी के कमरे में भेजा है उसके साथ समय व्यतीत करने नहीं और कुछ देर बाद वह खुद भी तो ऊपर आ सकता था| पर इंद्र की वासना ने उसके सोचने समझने की शक्ति को सम्मोहित करके उसे एक आसान शिकार बना दिया|

14 मिनट की छोटी सी अवधि वाली फिल्म एक अच्छे थ्रिलर के रूप में दर्शक का ध्यान पकडे रखती है| अच्छी होने के बावजूद यह एक बात फिर से सिद्ध करती है कि भारतीय निर्देशकों के पास वह टेलेंट नहीं है जैसा हॉलीवुड के पास है जब जादुई बात दिखाने का मामला हो|

अहल्या का सबसे कमजोर दृश्य वही है जिसमें अहल्या के बिस्तर के सामने लगे दर्पण में वह अपनी जगह गौतम की छवि देखता है| वह दृश्य कायदे का नहीं बन पाया| फिल्म का रहस्य ज्यादा जानदार रहता अगर सिर्फ अहल्या के उसकी ओर देखकर उसे गौतम होने की स्वीकृति देने के कारण वह ऐसा मान लेता और दर्शक कभी भी इस दृश्य से रूबरू न होते कि वह दर्पण में क्या देख पा रहा है| इसकी जरुरत थी ही नहीं| अहल्या के उसे गौतम के रूप में संबोधित करने से ही दर्शक के लिये बात बन जाती|

यह दृश्य फिल्म की आत्मा के विरोधाभास में है कि गौतम पत्थर के रहस्य और अहल्या के खूबसूरत आकर्षण को परोस कर युवकों क शिकार करता है| पत्थर को जादुई बना फिल्म इस पहलू को कमजोर कर देती है|

दूसरी कमी है गौतम दवारा लोगों को छोटी मूर्तियों के रूप में बदल देना|  इसके विकल्प की आवश्यकता थी| ऐसे थिलर में जादू की कोई जगह नहीं हो सकती| जादू की बात कथानक का हिस्सा बने यह बढ़िया है पर अंत में तो यह नज़रों का फेर ही सिद्ध होना चाहिए|

बहुत पहले की बात है पहाड़ी पर एक जादूगरनी रहती थी जो पहाड़ी पर जा पहुँचने वाले युवकों को बकरा बना देती थी… लगभग हरेक भारतीय बालक ने ऐसी कहानी सुनी होगी यकीन मानिए इसके फिल्मांकन की कुव्वत भारतीय निर्देशकों में नहीं पाई जाती पर यही हॉलीवुड के काबिल निर्देशक बना कर प्रस्तुत करें तो हम मुँह खोले जादू का कमाल परदे पर देखते हैं|

फिल्म के ये दो पहलू फिल्म को आधुनिक काल का बेहद उम्दा थ्रिलर होने से रोकते हैं| उम्दा थ्रिलर में तार्किकता का बहुत बड़ा रोल होता है और यहाँ तार्किकता गायब है| इन दो कमियों से बचा जा सकता था|

फिल्म का नाम भले ही अहल्या हो और अहल्या (राधिका आप्टे) के चरित्र के व्यक्तित्व पर फिल्म निर्भर करती है और तीनों मुख्य अभिनेताओं ने बढ़िया अभिनय किया है पर फिल्म से जो अभिनेता सबसे ज्यादा चमक कर बाहर आता है वे सौमित्र चटर्जी हैं चाहे उनका परफेक्ट अंग्रेजी डिक्शन हो या चेहरे का नापा तुला हाव भाव सभी गजब हैं, और उनकी शारीरिक भाव-भंगिमा और बोलने की टाइमिंग का सामंजस्य देखते ही बनता है जब हास्य का पुट लिए बात चीत करते हुए व्हिस्की का गिलास हाथ में लिए वे कुर्सी पर बैठते हैं और अधिकारपूर्ण स्वर में बोलते हैं,”व्हाट कैन आई डू फॉर यू इन्स्पेक्टर?”

सौमित्र चटर्जी को इस फिल्म में देखकर ऐसा ही लगता है कि सत्यजीत रे की अप्पू के बाद क्या गैर-बंगाली फिल्म दर्शकों ने इतने दशकों इस अभिनेता को क्या भुला नहीं दिया| इस फिल्म में उनके जलवे को देख यह भी लगता अहै कि अमिताभ बच्चन की जगह अगर वे पीकू में दीपिका पादुकोण के चरित्र के पिता की भूमिका निभाते तो फिल्म क्या गजब की ऊँचाई न पा जाती, एक बंगाली चरित्र के विश्वसनीय और अच्छे चित्रण से?

राधिका आप्टे के लिए यह छोटी सी फिल्म बड़ी संभावनाओं के द्वार खोलती है और उनके नाम के साथ हाल के महीनों में जुड़ते तमाम विवादों के बावजूद फिल्म उन्हें एक संभावना वाली अभिनेत्री के रूप में स्थापित कर देती है|

 …[राकेश]

इच्छुक लोग फिल्म को यहाँ देख सकते हैं

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