हिंदी की पत्रिका वनमाली के सितम्बर 2026 के अंक में वरिष्ठ लेखक श्री कृष्ण बिहारी जी की कहानी – यह भी कोई ज़िन्दगी है, प्रकाशित हुयी है|

मनोविकार या मनोरोगों पर आधारित हिन्दुस्तानी साहित्य मंटो, राजकमल चौधरी और स्वदेश दीपक के कथा साहित्य में मिलता है| कृष्ण बिहारी  जी ने भी कुछ कहानियां मनुष्य के मस्तिष्क के अँधेरे कोनों के बारे में लिखी हैं| उनकी एक पुरानी कहानी याद आती है जिसमें उन्होंने हास्य के माध्यम से ऐसे व्यक्ति की कथा लिखी थी जिसे अन्यों को स्पर्श करने की बीमारी थी और इस एक आदत के कारण वह अक्सर मुश्किल में पड़ जाता है|

हंस के संपादक राजेन्द्र यादव जी ने जब हंस में आत्मस्वीकृतियों की श्रंखला प्रकाशित की तो लेखकों के मन की बातें जानकर अच्छा शोर मचता था| हिंदी के एक चर्चित लेखक ने कभी कहा था कि लेखक के जीवन में उसकी पत्नी के अलावा कम से कम एक प्रेयसी अवश्य होनी चाहिए जिससे उसे लिखने की प्रेरणा मिलती रहे|

इस कथन को बाद में कई वरिष्ठ कवियों और लेखकों ने भी दुहराया| हंस की आत्मस्वीकृतियों की श्रंखला में स्त्री और पुरुष दोनों वर्गों के लेखकों ने दुस्साहस करते हुए खुलासे किये| अगर ऐसे लेखकों और लेखिकाओं के जीवन साथी जीवित रहे होंगे और वे पहले इन खुलासों से अपरिचित रहे होंगे तो इन बातों को पढ़कर, अपने जीवन साथी के जीवन के राज जानकर उन पर क्या असर पड़ा होगा? लेखक ऐसे वीर बयान देते हुए इसके जोखिम से अनजान ही रहते हैं| वे यह भी भूल जाते हैं कि अगर उनके जीवन साथी भी इसी दर्शन को अपने जीवन में अपना लें तो वे एक संवेदनशील मन के स्वामी होने के नाते जीवनसाथी के विवाहेत्तर संबंध को कैसे बर्दाशत कर पायेंगे? वे अपनी लेखनी के द्वारा ऐसे जीवनसाथी को चरित्रहीन ही सिद्ध कर देंगे|

स्वयं राजेन्द्र यादव ने जब मुड़ मुड़ के देखता हूँ,  शीर्षक से अपने जीवन के प्रेम प्रसंगों के बारे में लिखा और अपने वैवाहिक जीवन के बारे में भी लिखा तो मन्नू भंडारी ने भी प्रत्युत्तर में – देखा तो इसे भी देखते, लिख कर अपने ह्रदय के गुबार सार्वजनिक किये| वे तो लेखिका थीं और एक समय राजेन्द्र यादव से ज्यादा चर्चित उपन्यासकार और कथा लेखिका रहीं, और उनके पास शब्द कला थी अपने मन के अन्दर चल रहे तूफ़ान को बाहर निकाल कर अपने अंतस में शान्ति स्थापित करने के लिए लेकिन जिनके जीवन साथी लेखक नहीं हैं, वे अपने अंतर्द्वंद को कैसे संभाल सकते हैं?

कलाकार का जीवनसाथी होना आसान नहीं होता| अगर कलाकार के किन्हीं गुणों या कर्मों से उनके जीवन साथी के मन में कोई बात दबी रह जाए तो यह ग्रंथि भविष्य में बहुत बड़े गुल भी खिला सकती है|

भारत जैसे देश में मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बहुत कम जानकारी लोगों के पास रहती है| इन समस्याओं को लेकर सही वक्त्त पर डॉक्टर के पास सलाह या इलाज के लिए जाना एक बहुत बड़ा काम है और अक्सर ही लोग इस बात को टालते रहते हैं और ऐसे भी हालात हो जाते हैं कि मानसिक विकार या रोग व्यक्ति के व्यक्तित्व को अपने कब्जे में ले लेता है|

कृष्ण बिहारी  जी ने उपरोक्त सारे परिवेश के अखाड़े में  इस कहानी – यह भी कोई ज़िंदगी है, को गढ़ कर इसमें मनो विकार से ग्रसित व्यक्ति, उसके इर्द गिर्द के माहौल, और मनोरोगी के कारण पीड़ित उसके जीवनसाथी की दुर्दशा का वर्णन किया है|

साहित्य समाज का दर्पण होता है, और दर्पण में बनती और दिखाई देती छवि ही अंततः समाज को सुधारने या सुधरने की प्रेरणा लोगों को देती है|

अकेलेपन की छाया में सिमटे वातावरण से कहानी की शुरुआत होती है और  वृद्धावस्था में  व्यक्ति कैसे विभिन्न प्रकार से अकेला होता जाता है, उसका वर्णन बड़े प्रभावी ढंग से होता जाता है| कहानी दर्शाती है कि दूर से बेहद सफल दिखाई देता लेखक भी वृद्धावस्था में बेहद जटिल जीवन का सामना करने पर विवश हो सकता है|

कथा का सूत्रधार लेखक जिस अग्रज लेखक – शिवम हरि का प्रशंसक और मित्र पिछले लगभग 4 दशक से है और उसके जीवन को एक सफल जीवन का प्रतिनिधित्व मानता है, उसी लेखक के वर्तमान के जीवन के बारे में गहराई से जानकर वह स्वयं भी घबराने लगता है कि इनके साथ ऐसा हो सकता है तो उसके साथ क्यों नहीं हो सकता| हाइपोकॉन्ड्रिया में जैसे किसी की बीमारी के बारे में जानकर व्यक्ति को यह भय सताने लगता है कि उसे भी यह बीमारी हो सकती है ऐसा ही कथा के सूत्रधार लेखक को लगता है क्योंकि उसकी और शिवम हरि के जीवन में बहुत समानताएं भी रही हैं|

शिवम हरि के जीवन की बीती घटनाएं उनकी पत्नी के दिमाग के अवचेतन भाग में एकत्रित होती रहीं| समय पर उन्होंने पति से इस बाबत बात कर सच्चाई जानने की कोशिश नहीं की, और यह सब एक ग्रंथि बन कर दिमाग में बस गया|

वृद्धावस्था में बेटी के विवाह के बाद के नारकीय हो गए जीवन से उपजा मानसिक कष्ट, स्वेच्छा से बेरोजगार बैठे बेटे के प्रेम विवाह से घर आई बहु द्वारा दी जाने वाले प्रताड़ना से उपजा शारीरिक और मानसिक कष्ट उन्हें मनोरोग के ऐसे अँधेरे में धकेलता रहा जहाँ वे सिर्फ दो तरह से बच सकती थीं – या तो उनका वातावरण बदले या समुचित चिकित्सीय सहायता उन्हें समय पर मिले|

लेकिन दोनों ही उपाय उनके लिए नहीं हैं और सहते सहते वे डिल्यूजनल डिसऑर्डर का शिकार हो गयी हैं| अपनी बेटी के जीवन को वे संवार नहीं सकतीं, बेटे बहु पर उनका जोर नहीं सो उनका पति ही उनके डिल्यूजनल एग्रेसन का केंद्र बन जाता है|

कहानी समाज की कडवी सच्चाइयां जाहिर करती जाती है| अपने वारिस के बेटे की चाह में शिवम हरि का बेरोजगार बेटा तीन लड़कियों का पिता बन चुका है और अब चौथी संतान का पिता बनने ही वाला है| उसकी पत्नि ने उसकी माँ को अपनी नौकरानी बना डाला है| बेटे को परवाह ही नहीं है कि उसके जीवन जीने के ढ़र्रे का उसके वृद्ध माता-पिता पर क्या असर पड़ रहा है?

पिता की पेंशन पर घर चलता है और दोनों वृद्धों की ही घर में बुरी हालत है|

लेखक के जीवन के बीते दिनों की स्मृतियाँ, तब लिखी डायरियां, और कहानियां, कैसे ऐसे जीवन साथी, जो लेखक नहीं है, पर असर डाल सकती हैं, यह कथा का एक महत्वपूर्ण बिन्दु है|

सामाजिक यथार्थ दर्शाते हुए कहानी सहसा कहानी के क्राफ्ट के साथ भी प्रयोग करती दिखाई देती है और यह भेद मिट जाता है कि एक कहानीकार जीवन से कितना कुछ लेता है या सभी कुछ उसकी कल्पना की ही उपज होता है|

ऐसा अक्सर कहा जाता है कि साहित्य में फिक्शन से बड़ा सच कुछ नहीं होता और आत्मकथा से बड़ा झूठ नहीं होता|

इस कहानी में सूत्रधार लेखक शिवम हरि के वर्तमान जीवन के बारे में जिन पांच दृश्यों की कल्पना करता है  वहां यह कह पाना मुश्किल है कि ये कल्पनाएँ हैं या शिवम हरि द्वारा लेखक से साझा की गयी घटनाएं|

शिवम हरि की इन हालात से मुक्ति क्या संभव है? पत्नि से दूरी वे बना नहीं सकते| वे एक संवेदनशील लेखक हैं, जिस स्त्री से उन्होंने विवाह किया था, जिसके साथ जीवन के चार-पांच दशक व्यतीत किये हैं, सुख दुःख साझा किये हैं, उसे छोड़ भी नहीं सकते|

सूत्रधार लेखक भी ऐसी स्थिति में शिवम् हरि की सहायता कैसे कर सकता है?

जीवन को बेहद जटिल स्थितियों में ढालकर मनोरोग को विचार के केंद्र में लाने का प्रयास करती हुई यह कहानी एक सामयिक कहानी है और वर्तमान की  ज्वलंत समस्या और सामाजिक बदलाव और आवश्यकता की कहानी है|

…[राकेश[

 

 


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