कह रहा है शोर-ए-दरिया से समुंदर का सुकूत
जिस का जितना ज़र्फ़ है उतना ही वो ख़ामोश है

~ नातिक़ लखनवी

ये ढाई किलो का हाथ जब किसी पर पड़ता है तो आदमी उठता नहीं उठ जाता है|

चिड़ियाघर में पिंजरे में बंद शेर पर बच्चे भी मूंगफलियाँ फेंक कर मारते हैं| वह और बात है| मैदान में खुले शेर का सामना करोगे, तुम्हारे मर्द होने की गलतफहमी दूर हो जायेगी|

समझाओ इसे, ऐसे खिलौने बाज़ार में बहुत बिकते हैं मगर इसे खेलने के लिए जो जिगर चाहिए न वह दुनिया के किसी बाज़ार में नहीं मिलता, मर्द उसे लेकर पैदा होता है|

तूने कभी बच्चों को बिजली की तार से पतंग उतारते देखा है? कुछ तारें ऐसी होती हैं, जिसमें से उलझी हुयी पतंग बच्चे भी उतार लाते हैं| ये और बात है| दामिनी के केस को छेड़ कर जो तार तूने छू लिया है, बिजली का वो झटका लगेगा कि तू झटकना भूल जायेगा|

बहुत तरक्की कर ली चड्ढा, कानून की दलाली से इज्ज़त की नीलामी तक आ गए| इस पेशे को भडवागिरी कहते हैं|

चिल्लाओ मत, नहीं तो ये केस यहीं रफ़ा दफ़ा कर दूंगा, ना तारीख न सुनवाई सीधा इन्साफ वो भी ताबड़तोड़|

अदालत में तूने कोई बदतमीजी की तो वहीं मरूँगा, जज ऑर्डर ऑर्डर करता रहेगा और तू पिटता रहेगा|

…[राकेश]


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