“भारत गाँवों में बसता है, अगर गाँव नष्ट होते हैं तो भारत भी नष्ट हो जायेगा| इंसान का जन्म जंगल में रहने के लिए नहीं हुआ बल्कि समाज में रहने के लिए हुआ है| एक आदर्श समाज की आधारभूत ईकाई... Continue Reading →
समाजवादी चिन्तक और राजनेता डा. राम मनोहर लोहिया, ब्रिटिश राज से स्वतंत्रता पाए भारत में, इसके प्रथम प्रधानमंत्री प. जवाहर लाल नेहरु के घनघोर राजनीतिक आलोचक रहे| परन्तु ब्रिटिश राज से आजादी से पूर्व दोनों बड़े नेताओं के मध्य कैसे संबंध थे यह... Continue Reading →
जब मैंने कहा, तकरीबन बीस बरस पहले, कि आदमी-आदमी समान नहीं हैं, भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी (सी.पी.आई) ने मेरी आलोचना करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया और कम्यूनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष – एस. ऐ . डांगे ने घोषणा की कि शीघ्र ही उनका दामाद,... Continue Reading →
हालात और हादसों से गुज़रते हुए आम आदमी बहुत सजग और चौकन्ना हो गया है | हर बात पर वह संदेह करने लगा है | मैंने एक आदमी से पूछा – दो और दो कितने होते है ?सवाल सुनते ही... Continue Reading →
[ Sir Francis Bacon की एक कविता - The Art of Reading से प्रेरित, विस्तृत की गयी कविता ] ...[राकेश]
सिनेमा परदे पर मायाजाल रचता है और दर्शक उसमें जानबूझ कर फंसते हैं| कई बार मायाजाल भी झूठे चित्रों से रचा जाता है जिसके बारे में अक्सर दर्शकों को पता नहीं चलता| स्टंट सीन्स में तो जानकार मानकर ही चलते... Continue Reading →
कुछ लोगों में कहीं न कहीं जीवन को त्यागने की इच्छा का बीज छिपा रहता है और किसी भी तरह की समस्याओं से घिरने पर वह बीज अंकुरित हो उठता है और ऐसे लोगों में से कुछ लोग आत्मघात की... Continue Reading →
ओशो महावीर के जीवन के सहारे अपनी बात कहते हैं| महावीर के जीवन में एक घटना का उल्लेख है, जिस पर एक बहुत बड़ा विवाद चला। और महावीर के अनुयायियों का एक वर्ग टूट गया। और महावीर के पाँच सौ मुनियों... Continue Reading →
~ © HK Verma [नोट : यह लेख श्री एच के वर्मा के अंगरेजी में लिखे लेख का हिंदी अनुवाद है| HK Verma, an alumnus of FTII, is a renowned cinematographer who earlier in his career collaborated with celebrated cinematographer KK Mahajan on many great... Continue Reading →
फिल्म ज़मीन आसमान (1984) में संजय दत्त और अनीता राज पर फिल्माया गीत "ऐसा समां न होता, कुछ भी यहाँ न होता, मेरे हमराही जो तुम न होते" से है, अस्सी के दशक में पंचम द्वारा संगीतबद्ध उन बेहतरीन गीतों... Continue Reading →
इस बात का बड़ा भारी शोर सुना जा रहा है कि पढ़ने वाले नौजवान(विद्यार्थी) राजनीतिक या पोलिटिकल कामों में हिस्सा न लें। पंजाब सरकार की राय बिल्कुल ही न्यारी है। विद्यार्थी से कालेज में दाखिल होने से पहले इस आशय की शर्त... Continue Reading →
श्री संपादक जी,माडर्न रिव्यू, आपने अपने सम्मानित पत्र के दिसंबर, १९२९ के अंक में एक टिप्पणी “इंकलाब जिन्दाबाद” शीर्षक से लिखी है और इस नारे को निरर्थक ठहराने की चेष्टा की है। आप सरीखे परिपक्व विचारक तथा अनुभवी और यशस्वी... Continue Reading →
प्रिय भाई, मुझे दंड सुना दिया गया है और फ़ांसी का आदेश हुआ है। इन कोठरियों में मेरे अतिरिक्त फ़ांसी की प्रतीक्षा करने वाले बहुत से अपराधी हैं। ये लोग यही प्रार्थना कर रहे हैं कि किसी तरह फ़ांसी से... Continue Reading →
सारे दिन उदास रहने के बादशाम भी अगर उदासी में गुजर जायेऔर हर पलअपनी खामोशी मेंठहर जायेतो लगता है किज़िंदगी का सबसे संवेदनशील हिस्साबगैर छटपटाए मर गया हैया फिरज़िंदगी की नस-नस मेंतेज ज़हर भर गया है। मैं नहीं जानता मेरे... Continue Reading →
विश्व प्रसिद्द चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन ने तूलिका के स्थान पर कलम हाथ में थामी अपने अन्दर उभरती भावनाओं को इस बार काव्य का आकार देने के लिए| विश्व कविता दिवस पर उनकी कविता का उल्लेख प्रासंगिक है...
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन जी ने एक कविता लिखी थी – वात्स्यायन जी की बहुत सी लघु कवितायेँ बड़े और गहरे प्रभाव वाली हैं| उनके रचनात्मक वर्षों में उनकी कविताओं, और अन्य विधाओं के लेखन पर पर्याप्त चर्चाएँ होती ही होंगी, समीक्षाएं और... Continue Reading →
कहानी आधारित प्रसिद्द त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका - निकट, ने बीते साल 2024 का अपना अंतिम अंक प्रसिद्द साहित्यकार 'प्रियंवद' के रचनाकर्म पर आधारित किया है| हिंदी साहित्य पढने वालों में से बहुतों ने शायद प्रियंवद का रचा पढ़ा न हो... Continue Reading →
बॉलीवुड की चमक फीकी पड़ती जा रही है, इसकी जगह एक कठोर वास्तविकता ने ले ली है कि यह एक ऐसे संकट से घिर गया है जो इसने खुद ही पैदा किया है। अत्यधिक बजट में चौंका देने वाला सबसे... Continue Reading →
प्रतीत तो ऐसा ही होता हैरचनाकार को कि उसके द्वारा ही रचा जा रहा हैपर क्या रचने वाला वास्तव में रचनाकार का “मैं” ही होता है?तब,कभी एक बाल मन,कभी एक किशोर मन,कभी एक युवा मन,कभी एक प्रौढ़ मन,और एक... Continue Reading →
7 अक्तूबर 1914 को जन्मीं अख्तरी बाई फैजाबादी 13 वर्ष की आयु की ही थीं जब एक कामांध धनपशु ने उन्हें यौनहिंसा का शिकार बनाया| उस दुर्घटना के फलस्वरूप उत्पन्न कन्या को बहुत सालों तक अख्तरी बाई की छोटी बहन... Continue Reading →
चिड़चिड़ा बूढ़ा आदमी (Cranky Old Man) ---------------------------------------------- नर्स, तुम मेरी ओर देखती हो... तुम क्या देखती हो? मेरी तरफ़ देख कर तुम क्या सोचती हो? क्या मैं तुम्हें एक चिड़चिड़ा बूढ़ा आदमी दिखाई देता हूँ? जो बहुत समझदार नहीं है,... Continue Reading →
यूँ ही एक शाम मैं अपने मेट्रोपॉलिटन शहर की भीड़ भरी सड़कों पर पार्टी मनाने के लिए अपनी एक सहेली के साथ निकल पड़ी! वे बड़ी संख्या में आए और हमारे शरीर का उत्पीड़न करने लगे, लेकिन अपनी सुरक्षा की... Continue Reading →
सांप तुम सभ्य तो हुए नहीं, नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया। एक बात पूछूँ-- (उत्तर दोगे?) तब कैसे सीखा डसना... विष कहाँ पाया?
कविता – असाध्य वीणा, विचार, कल्पना, और भाषा तीनों के स्तर पर एक अनूठी कविता है| कविता बेहद खूबसूरत विम्ब रचते हुए आगे बढ़ती है और पाठक को सम्मोहित करके अपने खूबसूरत संसार में खींच ले जाती है और जब तक... Continue Reading →
हिंदी अनुवाद --- ...[राकेश] https://www.youtube.com/watch?v=vGoBlrYNwHo
भारत के गौरव गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर, एक मानवतावादी, प्रकृतिविद, कवि, चित्रकार, संगीतकार, लेखक, शिक्षाविद, और भारतीय संस्कृति एवम कला के ध्वजवाहक रहे हैं, वे देशों की सीमाओं को पार कर गये हैं और पिछले सौ सालों से भी ज्यादा समय से... Continue Reading →
80 के दशक के अंत में और 90 के दशक के शुरू में दो घटनाएं हुईं| तमिलनाडू के एक राजनेता पर पीडोफ़ाइल् होने के आरोप लगे थे, उससे पहले भी एक राज्य के मुख्यमंत्री पर ऐसे आरोप लगे थे और इलस्ट्रेटेड... Continue Reading →
Martin Brest की प्रसिद्द फ़िल्म Beverly Hills Cops (1984) से प्रेरित होकर पंकज पाराशर ने जलवा बनायी थी जिसे, खट्टा मीठा, और चश्मे बद्दूर, जैसी रोचक मध्यमार्गी फ़िल्में निर्मित करने वाले निर्माता गुल आनंद का भरपूर सहयोग मिल गया| भारत... Continue Reading →
सिनेमा, साहित्य की तरह उस काल का ही दर्पण नहीं होता कभी कभी वह वर्तमान को देख कर आगे की घटनाओं का पूर्व अनुमान भी लगा लेता है | वर्तमान में जो अमेरिका में घट रहा है वह बिलकुल भी... Continue Reading →
अमेरिकन पिता और जर्मन माता की संतान के रूप में सन 1920 में जन्मे Charles Bukowski 24 वर्ष की उम्र में अपनी पहली कहानी छपवा पाए और उनकी पहली कविता तब छपी जब वे 35 साल के थे| 39 वर्ष की आयु... Continue Reading →
शिव कोई पुरोहित नहीं है। शिव तीर्थंकर हैं। शिव अवतार हैं। शिव क्रांतिद्रष्टा है, पैगम्बर है। वे जो भी कहेंगे, वह आग है। अगर तुम जलने को तैयार हो, तो ही उनके पास आना; अगर तुम मिटने को तैयार हो, तो ही उनके निमंत्रण को स्वीकार करना। क्योंकि तुम मिटोगे तो ही नये का जन्म होगा। तुम्हारी राख पर ही नये जीवन की शुरुआत है।
(Your Laughter – Pablo Neruda) हिंदी अनुवाद – …[राकेश] Painting : Amrita Sher-Gil
दो तरह के प्रेम (निजी प्रेम और देश प्रेम) के मध्य संघर्ष इस फ़िल्म के बुनियादी तत्वों में से एक है| प्रेम, देशप्रेम, और स्वतंत्रता आन्दोलन का संघर्ष की पृष्ठभूमि में देशप्रेम जब आहुति माँगता हो तो व्यक्तिगत प्रेम एक व्यसन की तरह... Continue Reading →
गांधी फ़िल्म की विश्व स्तरीय सफलता के बाद के वर्षों में कभी किसी पत्रकार ने बासु भट्टाचार्य से उनके घर जाकर साक्षात्कार लिया था तो उन्होंने रिचर्ड एटनबरो की फ़िल्म - गांधी पर कुछ टिप्पणियाँ करते हुए यह भी कहा... Continue Reading →
छुआ है जिस दिन से तुमनेमेरा मनसमा गयी है उष्णता तुम्हारीमुझमें। यह गरमी और इस आँच की खुश्बूकहाँ जाये?यह उम्र झूठ बोलने की नहीं हैपैंतालिस की उम्र मेंप्लेटॉनिक/ अदभुत प्रेमहोता नहींऔर जो होता हैलाख कोशिशों के बावजूदसोता नहीं।चाहता है एकांत... Continue Reading →
Don’t Go Far Off (Pablo Neruda) हिन्दी अनुवाद :- …[राकेश] Painting : Vincent Von Gogh
देव आनंद हिंदी सिनेमा के बड़े सितारों में फ़िल्म का विषय चुनने में सबसे साहसी अभिनेता रहे हैं| जिन विषयों की तरह सुपर स्टार मुंह करके सांस भी न लें कि अगर पत्रकारों को ऐसी भी भनक लग गयी कि उन्होंने... Continue Reading →
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