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Cine Manthan

Cinema, Theatre, Music & Literature

Category

Hindi

कमर जलालाबादी

किसी भी गीत को उम्दा बनाने के लिये संगीतकार, गायक और गीतकार तीनों के बेहतरीन योगदान की जरुरत होती है और किसी एक का भी योगदान कमतर हो तो गीत की गुणवत्ता और आयु कम हो जाती है। तीनों में... Continue Reading →

Satyakam (1969) : हत्या ईमानदारी की होते बेशर्मी से देखता रहा है हिन्दुस्तान

Jolly LLB (2013) : प्रेमी वकील बाबू vs. कानून के अंधेपन के दलाल

“बाबूजी, पेशाब ज़रा उधर कर लेंगे…यहाँ हमारा परिवार सोता है”, फुटपाथ पर तीन छोटे बच्चों के साथ बैठे एक बुजुर्गवार, जॉली  वकील (अरशद वारसी) से कहते हैं और बहुत से दर्शक अपने भारत देश की इस विभीषिका पर शर्म से... Continue Reading →

Tanu Weds Manu(2011): सोती चिंगारी के प्रेम में पड़ गया घोंचू

सर्वप्रथम तो जिक्र इस फिल्म में हीरे की माफिक अलग से चमकने वाला गीत – रंगरेज़…- का ही होना चाहिए। गीत वडाली भाइयों द्वारा गाया गया है। जो फिल्म ऐसे गीत को अपने साथ चलने के लिये आमंत्रित करे उसमें... Continue Reading →

Dhobi Ghat (Mumbai Diaries) : ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ

धोबी घाट उर्फ मुम्बई डायरीज एक अच्छी फिल्म है। पहली बार निर्देशन की बागडोर संभाल रही किरण राव की इस फिल्म में रोचक कथ्य है और उसे प्रस्तुत करने का उतना ही रोचक तरीका भी है। किरण राव के निर्देशन... Continue Reading →

Kissa Kursi Ka : लालकृष्ण आडवाणी से एक करोड़ मुआवजा मांगते अमृत नाहटा का पत्र

नोट: शैक्षणिक व अव्यवसायिक उपयोग के लिये हिन्दी सिनेमा के इतिहास से सम्बंधित एक विवादास्पद फिल्म के निर्माता के पत्र का हिंदी रुपांतरण प्रस्तुत किया गया है।

Kissa Kursi Ka : हिंदी सिनेमा की सबसे ज्यादा विवादास्पद फिल्म का इतिहास

नोट: शैक्षणिक व अव्यवसायिक उपयोग के लिये हिन्दी सिनेमा के इतिहास से सम्बंधित एक विवादास्पद फिल्म के निर्माता के लेख का हिंदी रुपांतरण प्रस्तुत किया गया है।

नमकीन (1982) : चौरंगी में झांकी चली

https://www.youtube.com/watch?v=hLWJ3pWy2ac https://www.youtube.com/watch?v=erkeCqZp7os …[राकेश]

Dus Tola (2010) : गुलज़ार की सोने की खान से कुछ स्वर्ण-मुद्राएं

…[राकेश]

Jagte Raho (1956): न जागा है न जागेगा “भारत”

...[राकेश] https://youtu.be/S3Lhs8HEC_I?si=633obFDq1l4icFzN

Maya (2001) : गढी हुयी सामाजिक कुरीति के नाम कन्या की बलि चढाती फिल्म

सिनेमा एक बेहद सशक्त्त माध्यम है और लिखे अक्षर से एकदम अंजान बिल्कुल अनपढ़ किस्म के व्यक्ति भी इस माध्यम के द्वारा संदेश ग्रहण कर सकते हैं और दिखाये हुये की अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर व्याख्या कर... Continue Reading →

Road to Sangam (2010) : गाँधी कलश यात्रा

...[राकेश]

Well Done Abba (2010): गरीबी और सिलिकॉन इम्प्लान्ट्स के बाजार के बीच फंसे देश की हास्यास्पद स्थिति

“वेल डन अब्बा“ अभाव और समृद्धि के निर्लज्ज प्रदर्शन के दो विरोधी पाटों के बीच पिसते भारत पर व्यंग्य करती एक कहानी को दिखाती है। श्याम बेनेगल इस फिल्म में भ्रष्ट भारतीय समाज में समस्यायों से दो चार होते एक... Continue Reading →

Road Movie (2010): जीना है ज़िन्दगी का धर्म और मर्म

प्रेम को जानने के लिये प्रेम को अपने जीवन में महसूस करना जरुरी है और केवल पढ़ कर या सुनकर इसके बारे में ढ़ंग से नहीं जाना जा सकता। प्रेम को जीकर ही जाना जा सकता है। ज्यादातर मानवीय भावनायें... Continue Reading →

City of Gold (2010) : गरीबी को पटखनी देती अमीरी

महेश मांजरेकर की फिल्म City of Gold अमीरी गरीबी के बीच संघर्ष की राजनीति को दिखाती है। उदारीकरण के बाद से हिन्दी सिनेमा ने गरीब और अमीर के बीच के अन्तर को दर्शाती हुयी फिल्में बनाना बंद कर दिया था... Continue Reading →

Swami (1977): प्रेम का धागा पति से टूटे या प्रेमी से?

सत्तर के दशक में बासु दा बहुत तेज रफ्तार से फिल्में बनाते थे और उनकी उस दौरान बनायी गयी फिल्मों की गुणवत्ता सराहनीय है। सत्तर के दशक की उनकी फिल्में बार बार देखी जाती हैं और तब भी न तो... Continue Reading →

Peepli Live(2010): न्यू इंडिया और इसके मीडिया के मुँह पर तमाचा लगाता गरीब देहाती हिन्दुस्तान

प्रसिद्ध कवि रामावतार त्यागी की एक कविता की पंक्त्तियाँ हैं जी रहे हो जिस कला का नाम ले ले कुछ पता भी है कि वह कैसे बची है? सभ्यता की जिस अटारी पर खड़े हो, वही हम बदनाम लोगों ने... Continue Reading →

Life Goes On (2009) : यादों और सांस्कृतिक टकराव के चक्रव्यूह

किसी भी परिवार के मुखिया की पत्नी उस घर की धुरी बन जाती है। मुखिया, उसकी संताने सभी लोग उस एक महिला के कारण आपस में जुड़ाव महसूस करते हैं। उन लोगों के आपस में एक दूसरे से अलग विचारधारायें... Continue Reading →

Yeh Saali Zindagi (2011): प्रेम की ख्वाहिश पे दम निकले

ऐसा हो जाता है कि कुछ रचते हुये उस ताने-बाने के कुछ रेशे रचियता को पसंद आ जाते हैं और वह उन्हे बाद में किसी और चीज के बुनने के लिये रख लेता है। उन पुराने रेशों से नये में... Continue Reading →

Haat The Weekly Bazaar : सामंतवादी पुरुष समाज में चीरहरण सहने को विवश स्त्री शक्त्ति की विजय गाथा

औरत ने जनम दिया मरदों को, मरदों ने उसे बाज़ार दिया जब जी चाहा मसला कुचला, जब जी चाहा धुत्कार दिया तुलती है कही दिनारो में, बिकती है कही बाजारों में नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में ये... Continue Reading →

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