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Cinema, Theatre, Music, Literature & Life

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दूसरी दुनिया (निर्मल वर्मा) : गरीबी, ठण्ड और अकेलापन

"It's no good trying to get rid of your own aloneness. You've got to stick to it all your life." — D.H. Lawrence ...[राकेश]

ओशो वाया प्रीतीश नंदी (1985)

Courtesy : Illustrated Weekly of India, 29 September 1985

रुक जा रात ठहर जा रे चंदा (दिल एक मंदिर 1963)

रुक जा रात ठहर जा रे चंदा बीते न मिलन की बेलाआज चांदनी की नगरी में अरमानों का मेलारुक जा रात ...पहले मिलन की यादें लेकर आई है ये रात सुहानीदोहराते हैं चाँद सितारे मेरी तुम्हारी प्रेम कहानीमेरी तुम्हारी प्रेम... Continue Reading →

“स्वराज भवन + आनंद भवन” @ इलाहाबाद

स्वराज भवन और आनंद भवन (इलाहाबाद) : राष्ट्र को समर्पित हैं या नहीं ? अपने समय के बहुत बड़े वकील मोतीलाल नेहरु ने सन 1900 में एक बना बनाया भवन खरीदा जिसका नाम "आनंद भवन" था या रखा गया| अपनी... Continue Reading →

एक बार ज़रा फिर कह दो (बिन बदल बरसात 1963)

...[राकेश]

Kevin Carter : फोटोग्राफर की आत्महत्या !

लोगों ने केविन कार्टर की आत्महत्या के इर्द गिर्द मिथक रच दिए हैं| यह सत्य है कि उन्होंने आत्महत्या की लेकिन यह सत्य नहीं कि उन्होंने सूडान में भूख से बेहाल अफ्रीकन बच्चे और उसे घूरते, पास बैठे गिद्ध की... Continue Reading →

मुझे ले चलो आज फिर उस गली में (शराबी 1964)

मुझे ले चलो, आज फिर उस गली मेंजहाँ पहले पहल, ये दिल लड़खड़ायावो दुनिया, वो मेरी मोहब्बत की दुनियाजहां से मैं बेताबियां लेकर के आया जहाँ सो रही है मेरी जिंदगानी जहाँ छोड़ आया मैं अपनी जवानीवहां आज भी एक... Continue Reading →

अन्ना कारेनिना : क्या तुमने कभी सोचा!

© ...[ राकेश]

अंधायुग, अलकाजी, तुगलक : राम गोपाल बजाज

साभार : सारिका, फरवरी 1984

भारत में ब्रितानी राज के लिए सबसे खतरनाक भारतीय

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन (1900-1947) में ब्रिटिश सरकार ने जिन भारतीय नेताओं/क्रांतिकारियों को अपने लिए सबसे बड़ा खतरा माना, उनकी सूची, ब्रिटिश दस्तावेजों (India Office Records - IOR, Intelligence Bureau - IB रिपोर्ट्स, Viceroy के पत्र, Cellular Jail रिकॉर्ड्स, Rowlatt... Continue Reading →

चंद्रशेखर आज़ाद : पंडित नेहरु की दृष्टि से

पंडित नेहरु की आत्मकथा (मेरी कहानी/ MY Story) में छपे वर्णन से स्पष्ट है कि हालांकि पंडित नेहरु ने अपनी आत्मकथा 1934-35 में लिखी और 1936 में छपवाई, जब तक कि भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद दोनों की प्रसिद्धि आकाश छू... Continue Reading →

ओशो को सद्गुरु ने बिलकुल पढ़ा नहीं है!

खजुराहो पर जैसा ओशो ने अपने प्रवचनों पर कहा, वैसा उनसे पहले कभी किसी ने नहीं कहा था| खजुराहो के मंदिरों के अध्यात्मिक महत्त्व को ओशो ने ही सबसे पहले रेखांकित किया| उन्होंने ही इस बात पर प्रकाश डाला कि... Continue Reading →

शतरंज के खिलाड़ी और प्रेमचंद की कहानियों पर बनी अन्य फ़िल्में

चित्र में प्रेमचंद मुंबई में फ़िल्मी अनुबंध पर हस्ताक्षर करते हुए प्रेमचंद के साहित्य पर बनी फिल्मों पर उनके सुपुत्र अमृतराय के विचार सारिका, 1980 संलग्न चित्र में प्रेमचंद मुंबई में फ़िल्मी अनुबंध पर हस्ताक्षर करते हुए

शतरंज के खिलाड़ी – सत्यजित रे का रवैया

खोट रे के रवैये में दीखता है - नेत्र सिंह रावत सारिका, मई 1978

शतरंज के खिलाड़ी : प्रेमचंद बनाम सत्यजित रॉय

© राजेन्द्र यादव प्रेमचंद की कहानी ज्यादा ईमानदार थी| - राजेंद्र यादव

मीना कुमारी : चालीस मील लम्बी मौत

मीना कुमारी की डायरी (14) , सारिका, मार्च 1975 प्रस्तुति - © गुलज़ार

कविराज शैलेन्द्र का पढ़ाकूपन

प्रेम कपूर ( सारिका 1966)

जनकवि दुष्यंत के अंतिम पल …

लेखक - राजेश्वरी त्यागी (धर्मपत्नी दुष्यंत कुमार) साभार : दुष्यंत के जाने पर दोस्तों की यादें (संपादक - कमलेश्वर)

साम्प्रदायिकता और सत्ता …(महादेवी वर्मा)

महादेवी वर्मा का साक्षात्कार , साक्षात्कारकर्ता - उमाकांत मालवीय Published in Sarika , November 1981

कुंदनलाल सहगल … फिल्मों में पदार्पण

राघव मेनन , Published in सारिका 1981

लालबहादुर शास्त्री… एक संस्मरण ( हेमवती नंदन बहुगुणा)

Published in Sarika, 1981

रेणु … संस्मरण (जयप्रकाश नारायण)

Published in Sarika (April 1979)

लाल कवेलुओं की छत : याद न जाए बीते दिनों की

...[राकेश]

Dillagi (1978) : होलीमय संगीत के पांच सुरीले रंग

होली केवल मनुष्यों द्वारा जन्माया गया उत्सव ही नहीं है बल्कि प्रकृति भी इस समय धरती पर रंग बिरंगे रूप में छटा बिखेरने लगती है, ऋतुओं में भी बसंत अपने पूरे यौवन पर आ जाता है| होली जीवन में लचीलेपन... Continue Reading →

लड़ाकुओं के युद्ध

विलियम ब्लेक, कहिये तो

मैंने देखा उसे…

लता मंगेशकर : स्मरण

ख़ुदा की उस के गले में अजीब क़ुदरत हैवो बोलता है तो इक रौशनी सी होती है ~ बशीर बद्र

राजेंद्र यादव को जानना और अपनाना

First Published in - हमारे युग का खलनायक राजेंद्र यादव (संपादक - भारत भारद्वाज, साधना अग्रवाल), 2003 © कृष्ण बिहारी

बात मनुज की ही कविता होगी…

© कृष्ण बिहारी

मेरी जिंदगी के दिन …

© कृष्ण बिहारी

नींद – रंजीत कपूर (नाट्य व फिल्म निर्देशक, लेखक)

प्रख्यात लेखक, नाट्य एवं फिल्म निर्देशक, व अवसरानुकूल अभिनेता श्री रंजीत कपूर की यह पहली प्रकाशित कहानी है जो अप्रैल 1969 में हिंदी की प्रसिद्द साहित्यिक पत्रिका सारिका में छपी थी| लेखक कमलेश्वर ने 1967 से तकरीबन 11 साल तक... Continue Reading →

गिरिजा कुमार माथुर : “छाया मत छूना मन” – प्रसंग

----------------------- लम्हों में ज़िन्दगी - 4 ----------------------- एम.ए. हिंदी करतें समय मुझे गुना कॉलेज के प्रो कांति कुमार जैन का मेसेज मिला की दों दिन बाद मुझे हिंदी विषय का शोध निबंध (dissertation) - "गिरिजा कुमार माथुर का काव्य शिल्प"... Continue Reading →

गिरिजा कुमार माथुर : न्यू यॉर्क की पहली यात्रा

----------------------- लम्हों में ज़िन्दगी - 2 ----------------------- अशोकनगर के रेलवे स्टेशन की बेंच पर बैठे हुए गिरिजा कुमार माथुर साहब मुझसे अपने अतीत की स्मृतियों को साझा करने लगे| उन्होंने बताया कि पचास के दशक में वह न्यू यॉर्क में... Continue Reading →

गिरिजा कुमार माथुर : यादों का सरमाया (डॉ. गोपाल किशोर सक्सेना)

किसी दार्शनिक ने कहा है -- 'यह मत देखो कि ज़िन्दगी में कितने लम्हे हैं… यह देखो कि लम्हों में कितनी ज़िन्दगी है | पचास बरस पहले मुझे माथुर साहब से मिलने का सौभाग्य निरंतर मिलता रहा. और उन से... Continue Reading →

ओशो : नेताजी सुभाषचंद्र बोस और महात्मा गांधी

मुझे एक युवक याद आते हैं| उनका नाम सुभाष चंद्र बोस था। वे एक महान क्रांतिकारी बने और मेरे मन में उनके लिए बहुत सम्मान है, क्योंकि वे भारत में एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने महात्मा गांधी का विरोध किया; वे देख सकते थे... Continue Reading →

Osho : The day he left his body!

When Osho left his physical body on January 19, 1990, having lived for 58 years, 1 month, and 8 days, many might have thought this marked the end of a spiritual leader known for his playful nature. Some believed his... Continue Reading →

मीना कुमारी की दौड़ !

मधुलिका कुमारी थी, सुंदरी थी। कौशेय वसन उसके शरीर पर इधर-उधर लहराता हुआ स्वयं शोभित हो रहा था। वह कभी उसे संभालती और कभी अपनी रूखी अलकों को। कृषक बालिका के शुभ्र भाल पर श्रमकणों की भी कमी न थी,... Continue Reading →

Anupama(1966): एक स्त्री और एक पिता की मूर्तियों की गढ़न

“उस रात की वर्षा में” : इच्छापूर्ति की शतरंज

हिन्दी की प्रसिद्द पत्रिका - निकट, का नया अंक (जनवरी - अप्रैल 2026) "आत्मकथात्मक प्रेम-कथा विशेषांक" है और इसमें सुप्रसिद्ध लेखक प्रियंवद की प्रेमकथा - उस रात की वर्षा में, को भी सम्मिलित किया गया है| प्रियंवद उन लेखकों में... Continue Reading →

Mrs.Deshpande : वह है कातिलाना !

ख़ुदा के वास्ते इस को न टोकोयही इक शहर में क़ातिल रहा है ~ मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ सर्वप्रथम तो मिसेज देशपांडे की सबसे बड़ी खासियत है कि इसने माधुरी दीक्षित जैसी समर्थ अभिनेत्री को ओटीटी के अखाड़े में ही नहीं... Continue Reading →

The Great Shamsuddin Family

लखनऊ के इतिहासकार योगेश प्रवीण ने लखनऊ का एक पुराना किस्सा सुनाया जो बेहद लोकप्रिय हो गया| ******** "1920 में लखनऊ में पहली बार म्यूनिसिपैलिटी के चुनाव हुए तो चौक के इलाक़े से कारपोरेटर के चुनाव के लिये लखनऊ की मशहूर... Continue Reading →

JwarBhata(1944): दलीप कुमार की पहली फ़िल्म की समीक्षा

प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक बाबूराव पटेल ने दलीप कुमार की पहली फिल्म ज्वार भाटा (1944) की समीक्षा में दलीप कुमार की बेरहमी से आलोचना की थी| Review Courtesy : Jhinjhar @ IMDB

और क्या अहद-ए-वफ़ा होते हैं (सनी 1984) : धर्मेन्द्र फैक्टर

और क्या अहद-ए-वफ़ा होते हैंलोग मिलते हैं, जुदा होते हैं कब बिछड़ जाए, हमसफ़र ही तो हैकब बदल जाए, एक नज़र ही तो हैजान-ओ-दिल जिसपे फ़िदा होते हैं और क्या अहद-ए-वफ़ा होते हैं जब रुला लेते हैं जी भर के... Continue Reading →

धर्मेन्द्र : परदे पर स्त्री तिरस्कार का सामना

...[राकेश]

Baramulla (2025): अगर रूहें न होतीं तो क्या बात होती!

इंदिरा गांधी की वसीयत

तुम्हारा इंतज़ार है तुम पुकार लो : Khamoshi(1969)

...[राकेश]

नूरानांग दिवस और बाबा जसवंत की अदृश्य पहरेदारी

Dharmendra : Sholay(1975) – सफलता के कारवां का सबसे कम भाग्यशाली अभिनेता

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