किसी ने ग़म नहीं समझा हमारामुक़द्दर खा गया सपना हमारा ~ आफ़रीद कुरैशी बाबा ...[राकेश] फिल्म को नीचे दिए लिंक के माध्यम से देखा जा सकता है| https://play.pocketfilms.in/dr.ramu
कह रहा है शोर-ए-दरिया से समुंदर का सुकूतजिस का जितना ज़र्फ़ है उतना ही वो ख़ामोश है ~ नातिक़ लखनवी ये ढाई किलो का हाथ जब किसी पर पड़ता है तो आदमी उठता नहीं उठ जाता है| चिड़ियाघर में पिंजरे... Continue Reading →
पंडित नेहरु ने अपनी जीवनी में Robert Frost की कविता के अंतिम पद्यांश को उद्घृत किया तो यह कविता भारत में ख्याति पा गयी| डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता के उपरोक्त्त पद्यांश का हिन्दी में खूबसूरत... Continue Reading →
जासूसी, रहस्य रोमांच से भरी किताबें लिखने वाले सभी लेखक, अपनी कहानियों और उपन्यासों में इस दावे को अवश्य ही दर्ज करते हैं कि "कातिल कितना ही होशियार क्यों न हो, हत्या करते हुए कितनी भी सावधानी क्यों न बरते,... Continue Reading →
यह एक अविश्वसनीय सा तथ्य है कि कवि शैलेन्द्र ने 1948 में, ब्रितानी राज से स्वतंत्रता मिलने के एक साल बाद ही निम्न प्रस्तुत कविता लिख दी थी| यह आज़ाद भारत के हर दशक की कविता लगती है और आज... Continue Reading →
कई साल पहले हम कुछ साथी एक पब्लिक लाइब्रेरी में जाकर किताबें देखने लगे तो देखा वहां उपस्थित हिंदी साहित्य में गद्य की अधिकतर किताबें पढ़ ली हैं और काव्य व निबंधों की किताबें ही बची हैं| अलमारी को एक... Continue Reading →
अब जो रिश्तों में बँधा हूँ तो खुला है मुझ परकब परिंद उड़ नहीं पाते हैं परों के होते ~ जौन एलिया जौन एलिया के उपरोक्त्त शेर में इस गीत की नायिका की दिल की हालत छिपी हुयी है| यह... Continue Reading →
"It's no good trying to get rid of your own aloneness. You've got to stick to it all your life." — D.H. Lawrence ...[राकेश]
रुक जा रात ठहर जा रे चंदा बीते न मिलन की बेलाआज चांदनी की नगरी में अरमानों का मेलारुक जा रात ...पहले मिलन की यादें लेकर आई है ये रात सुहानीदोहराते हैं चाँद सितारे मेरी तुम्हारी प्रेम कहानीमेरी तुम्हारी प्रेम... Continue Reading →
स्वराज भवन और आनंद भवन (इलाहाबाद) : राष्ट्र को समर्पित हैं या नहीं ? अपने समय के बहुत बड़े वकील मोतीलाल नेहरु ने सन 1900 में एक बना बनाया भवन खरीदा जिसका नाम "आनंद भवन" था या रखा गया| अपनी... Continue Reading →
लोगों ने केविन कार्टर की आत्महत्या के इर्द गिर्द मिथक रच दिए हैं| यह सत्य है कि उन्होंने आत्महत्या की लेकिन यह सत्य नहीं कि उन्होंने सूडान में भूख से बेहाल अफ्रीकन बच्चे और उसे घूरते, पास बैठे गिद्ध की... Continue Reading →
मुझे ले चलो, आज फिर उस गली मेंजहाँ पहले पहल, ये दिल लड़खड़ायावो दुनिया, वो मेरी मोहब्बत की दुनियाजहां से मैं बेताबियां लेकर के आया जहाँ सो रही है मेरी जिंदगानी जहाँ छोड़ आया मैं अपनी जवानीवहां आज भी एक... Continue Reading →
पंडित नेहरु की आत्मकथा (मेरी कहानी/ MY Story) में छपे वर्णन से स्पष्ट है कि हालांकि पंडित नेहरु ने अपनी आत्मकथा 1934-35 में लिखी और 1936 में छपवाई, जब तक कि भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद दोनों की प्रसिद्धि आकाश छू... Continue Reading →
खजुराहो पर जैसा ओशो ने अपने प्रवचनों पर कहा, वैसा उनसे पहले कभी किसी ने नहीं कहा था| खजुराहो के मंदिरों के अध्यात्मिक महत्त्व को ओशो ने ही सबसे पहले रेखांकित किया| उन्होंने ही इस बात पर प्रकाश डाला कि... Continue Reading →
चित्र में प्रेमचंद मुंबई में फ़िल्मी अनुबंध पर हस्ताक्षर करते हुए प्रेमचंद के साहित्य पर बनी फिल्मों पर उनके सुपुत्र अमृतराय के विचार सारिका, 1980 संलग्न चित्र में प्रेमचंद मुंबई में फ़िल्मी अनुबंध पर हस्ताक्षर करते हुए
खोट रे के रवैये में दीखता है - नेत्र सिंह रावत सारिका, मई 1978
© राजेन्द्र यादव प्रेमचंद की कहानी ज्यादा ईमानदार थी| - राजेंद्र यादव
मीना कुमारी की डायरी (14) , सारिका, मार्च 1975 प्रस्तुति - © गुलज़ार
लेखक - राजेश्वरी त्यागी (धर्मपत्नी दुष्यंत कुमार) साभार : दुष्यंत के जाने पर दोस्तों की यादें (संपादक - कमलेश्वर)
महादेवी वर्मा का साक्षात्कार , साक्षात्कारकर्ता - उमाकांत मालवीय Published in Sarika , November 1981
होली केवल मनुष्यों द्वारा जन्माया गया उत्सव ही नहीं है बल्कि प्रकृति भी इस समय धरती पर रंग बिरंगे रूप में छटा बिखेरने लगती है, ऋतुओं में भी बसंत अपने पूरे यौवन पर आ जाता है| होली जीवन में लचीलेपन... Continue Reading →
ख़ुदा की उस के गले में अजीब क़ुदरत हैवो बोलता है तो इक रौशनी सी होती है ~ बशीर बद्र
First Published in - हमारे युग का खलनायक राजेंद्र यादव (संपादक - भारत भारद्वाज, साधना अग्रवाल), 2003 © कृष्ण बिहारी
प्रख्यात लेखक, नाट्य एवं फिल्म निर्देशक, व अवसरानुकूल अभिनेता श्री रंजीत कपूर की यह पहली प्रकाशित कहानी है जो अप्रैल 1969 में हिंदी की प्रसिद्द साहित्यिक पत्रिका सारिका में छपी थी| लेखक कमलेश्वर ने 1967 से तकरीबन 11 साल तक... Continue Reading →
----------------------- लम्हों में ज़िन्दगी - 4 ----------------------- एम.ए. हिंदी करतें समय मुझे गुना कॉलेज के प्रो कांति कुमार जैन का मेसेज मिला की दों दिन बाद मुझे हिंदी विषय का शोध निबंध (dissertation) - "गिरिजा कुमार माथुर का काव्य शिल्प"... Continue Reading →
----------------------- लम्हों में ज़िन्दगी - 2 ----------------------- अशोकनगर के रेलवे स्टेशन की बेंच पर बैठे हुए गिरिजा कुमार माथुर साहब मुझसे अपने अतीत की स्मृतियों को साझा करने लगे| उन्होंने बताया कि पचास के दशक में वह न्यू यॉर्क में... Continue Reading →
किसी दार्शनिक ने कहा है -- 'यह मत देखो कि ज़िन्दगी में कितने लम्हे हैं… यह देखो कि लम्हों में कितनी ज़िन्दगी है | पचास बरस पहले मुझे माथुर साहब से मिलने का सौभाग्य निरंतर मिलता रहा. और उन से... Continue Reading →
मुझे एक युवक याद आते हैं| उनका नाम सुभाष चंद्र बोस था। वे एक महान क्रांतिकारी बने और मेरे मन में उनके लिए बहुत सम्मान है, क्योंकि वे भारत में एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने महात्मा गांधी का विरोध किया; वे देख सकते थे... Continue Reading →
When Osho left his physical body on January 19, 1990, having lived for 58 years, 1 month, and 8 days, many might have thought this marked the end of a spiritual leader known for his playful nature. Some believed his... Continue Reading →
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