क्षार क्षार होना पड़ता है ज़ार ज़ार रोना पड़ता है कंचन काया का रूप हमेशा दरपन से बाहर था अंटता नहीं किसी आंख में जलवा इतना नाहर था राख हुई उस काया को भी अंजुरी में ढोना पड़ता है पल... Continue Reading →