“कैफ बरदोश, बादलों को न देख,

बेखबर, तू न कुचल जाए कहीं|”

आकाश में उमड़ घुमड़ आये बादलों से मनुष्य का बहुत पुराना सम्बन्ध है शायद तब का जब मानव ने धरती पर बस जन्म लिया ही होगा और उसे भाषा आदि के माध्यम भी उपलब्ध नहीं थे अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए| हमेशा से ही मनुष्य के एकांत में बादल उसके साथी रहे हैं| अकेले बैठे मनुष्य को बादल की बंनती, और लगातार परिवर्तित होती भिन्न भिन्न आकृतियाँ हमेशा से ही आकर्षित करती रही हैं| चित्रकारी करने का सर्वप्रथम विचार मनुष्य को साफ़ नीले आकाश में तैरते सफ़ेद बादलों की निरंतर परिवर्तित होती मोहक छवियों से आया हो या सलेटी हो चुके आकाश में काले बादलों की गति से, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है|

बादलों का मनमोहक जादू इस युग में हवाईजहाज में बैठ कर बादलों से भी ऊपर उड़ने के बाद भी समाप्त नहीं होता| आज भी लम्बे चौड़े हरियाले मैदान या पर्वतों की चोटियों या घाटियों में जब आकाश में श्वेत श्याम बादल अठखेलियाँ करते हैं और नीचे धरती पर उनके साए भागे फिरते हैं तो उम्रदराज लोगों के दिल भी बच्चे बन जाते हैं| बादलों की महिमा, मेह बरसाने से पहले और बरसाने के बाद अलग ही छटा बिखेरती है| बादलों की खूबसूरती पर ही बाबा नागार्जुन ने अपनी प्रसिद्ध कविता  “बादल को घिरते देखा है”, की रचना की|

बादल तो स्वंय में ही कलाकार हैं, चित्रकार हैं, शिल्पी हैं, रंग हैं, कूची हैं| स्वंय ही बादल पेंटिंग भी हैं, और कृति भी| बादल आकाश में नाना प्रकार की मोहक छवियाँ बनाया करते हैं| भारत जैसे गर्म देश में बादल मनुष्य को बेहद सुहाने प्रतीत होते हैं, काले मेघ बरसात आने के संदेशवाहक होते हैं, बादलों को देख मयूर ही नहीं नाचने लगते, पक्षी ही प्रसन्न नहीं हो जाते वरन मनुष्य का मन मयूर भी नृत्य करने लगता है| उसके अन्दर ठंडी बयार की छुअन के भाव हिलोरे लेने लगते हैं| बरखा जीवन की आपाधापी में मनुष्य को ठहराव देती है| बारिश जब हो रही होती है तब दिमाग शिथिल होकर ठहराव के आनंद को पाने लग सकता है| प्रकृति के इस खूबसूरत उपहार का मनुष्य जीवन में अपना एक अर्थ है और मनुष्य संग एक अन्तर्निहित संबंध|

मैदानी इलाकों में बादल अलग अनुभूतियाँ प्रदान करते हैं। यहां बादल बहुत ऊंचाई पर आकाश में विचरण करते हैं। ग्रीष्म कालीन माहों में आग बरसाते प्रतीत होते आकाश में घने बादल छा भर जाएं तो मन तृप्त हो उठते हैं, ठंडक के अहसास से ही मन खिल उठते हैं। नभ में गति करते बादल कभी तो परिचित सी आकृतियां बनाते प्रतीत होते हैं और कभी इंसानी कल्पना से बाहर की आकृतियां आकाश में बादल की गतिविधियां रचती हैं।

पर्वतों पर बादल से रिश्ता अलग किस्म का होता है, वहां बादल सुदूर आकाशीय उपस्थितियाँ न होकर साथ ही आवागमन करने वाले सहचर होते हैं जिनका स्पर्श मनुष्य महसूस कर सकता है। वहां ऊंचाई पर बादल मनुष्य संग अटखेलियां करते हैं। ये भी है कि पर्वतों पर या पर्वतों से घिरी घाटियों में अगर बादल अपने मनमोहक रूप दिखाते हैं तो रौद्रतम रूप में भी वहीं सामने आते हैं।

श्वेत वस्त्रधारी गुलज़ार स्वयं भी सफ़ेद बादल की तरह कलात्मक दुनिया में विचरण किया करते हैं और भिन्न भिन्न रूपों में उनकी कला बरस बरस पाठक, या दर्शक को अपने स्पर्श से भिगोती रहती है|

गुलज़ार की फ़िल्में इशारों में बातों को, भावों को, ह्रदय के उद्गारों को व्यक्त किया करती हैं| कविता की तरह उनकी फिल्मों के दृश्य के मानी भी अक्सर बहुवचन वाले ही होते हैं| उनके दृश्यों के अर्थ तक पहुँचने के लिए दूरी दर्शक को ही तय करनी पड़ती है| वे एक अच्छे शिक्षक या मार्गदर्शक की भांति दर्शक को इशारा भर कर देते हैं कि उस तरफ उठ कर कुछ दूर जाने का कष्ट करो तो अर्थ समझ आ जाएगा, पर यहीं थाली में परोस कर तुम्हे भोज्य पदार्थ मिलने से रहा, कुछ मेहनत तो बरखुरदार तुम्हे करनी ही पड़ेगी, इस बात का भरपूर आनंद उठाने के लिए| और बहुधा तो गुलज़ार रचित इमेज़री को ज्यों का त्यों एक अनुभव की भांति ही स्वीकार करना पड़ता है क्योंकि अर्थ का भेद या तो गुलज़ार खोलें, बताएं या ईश्वर|

गुलज़ार के हर फ़िल्मी गीत को तीन स्तर पर स्वीकार कर सकते हैं| एक तो उन फिल्मों के गीत जहां वे केवल एक गीतकार के तौर पर योगदान देते हैं| दूसरे वे गीत जिनका फिल्मांकन भी वे बतौर निर्देशक वे करते हैं और जहां उनके द्वारा निर्देशित दृश्य उनके रचे काव्य में अलग से कोण या अर्थ जोड़ सकते हैं| तीसरे शैलेन्द्र, साहिर, मजरूह, नीरज और कैफ़ी आजमी जैसे बड़े गीतकारों की तरह गुलज़ार के गीत भी फ़िल्मी सीमा से परे जाकर स्वतंत्र अस्तित्व भी रखते हैं| आंधी के “आरती देवी आई हैं” गीत में किरदार के नाम की पंक्ति को छोड़ दें तो वह भारत में चुनाव और हर नेता के ऊपर एकदम उचित बैठता गीत है| ऐसे ही उनके लगभग सारे गीत हैं जो पूरे नहीं तो उनके अंश फ़िल्मी गीत के पहनावे से बाहर आकर भी स्वतंत्र वेशभूषा का आकार ग्रहण कर लेते हैं|

गुलज़ार शब्दों से चित्र, छवियाँ गढ़ते हैं या अगर फिल्म की बात हो तो चित्रित करते हैं| वे मात्र कवि नहीं वरन शिल्पी या चित्रकार कवि हैं| वे इमेजरी रचने वाले कवि हैं| अगर व्यक्ति के पास वैसा अनुभव है जैसा उनकी कविताओं या गीतों में वर्णित है तो उनकी कविताओं और उनके गीतों को पढ़कर ज्यादातर ही ऐसा महसूस होने लगता है कि अरे यह तो हमने भी देखा है या किया है पर ऐसी कलात्मक तवज्जो तो इस अनुभव को दी नहीं हमने कभी| या इस बात को ऐसे भी प्रदर्शित किया जा सकता है यह तो कल्पना भी नहीं की कभी| वे विशुद्ध कल्पना और आस पास बिखरी पडी चीजों के संगम से ऐसा लोक रचते है जहां जाकर रचनात्मकता के संसर्ग का आनंद पाठक या दर्शक को अन्दर तक छूने लगता है और अगर बात दुःख को ही प्रकट करने की है तो उसका अंतर्मन तक दुःख के कोहरे से भीगने लगता है|

वायु, हवा या पवन आदि की तरह बादल को दूत बना कर अपने मनोभाव या ह्रदय के उदगार अपने प्रिय तक या ईश्वर तक पहुंचाने की प्रार्थना करना एक बहुत पुरानी भारतीय परम्परा रही है जो सामूहिक तो है पर वैयक्तिक रूप से बार बार उजागर होती है|

ख्वाजा अहमद अब्बास’ कृत ‘दो बूँद पानी’, के गीत “जा री पवनिया पीया के देस जा (कैफ़ी आजमी)” जैसा दुखद भाव गुलज़ार के इस फ़िल्मी गीत (फिर से अइयो बदरा बिदेसी) में नहीं है क्योंकि वहां नायिका नायक के विरह में पवन द्वारा अपना सन्देश भेजना चाहती है और यहाँ ज्यादातर दुःख ही देखने वाली नायिका – मिट्ठू (शबाना आजमी) प्रफुल्लित मन से इस कवित्त को महसूस कर रही है| वह गा नहीं सकती क्योंकि वह बोल नहीं सकती, पर ये उसी की रचना है| कागज़ पर उकेरी कविता को छोड़ दें तो यह गूंगे के गुड़ सामान बात है| वह महसूसती तो है और गुनगुना तो सकती है पर शब्दों को बोल कर व्यक्त नहीं सकती| इसके मुखड़े को धुन में गुनगुनाते सुनकर ही नायक उससे पूछता है कि वह क्या गुनगुना रही थी? और नायिका जमीन पर लकड़ी से लिख कर उसके साथ गीत का मुखड़ा साझा करती है| नायक आग्रह करता है कि जब कविता पूरी हो जाए तो उसे लिख कर दे दे|

हामी भर कर मिट्ठू मुस्कराती रह जाती है और एक रहस्य दर्शक के समक्ष प्रस्तुत कर देती है| पर इस सूत्र के रहस्य से पहले दो-चार अन्य प्रश्न भी महत्वपूर्ण हैं|

बोल न सकने वाली मिट्ठू क्यों इतनी प्रसन्न चित्त है कि घरेलू दैनिक काम करते हुए भी वह अपनी ही लिखी इस कविता का मुखड़ा गुनगुना रही है? इससे भी पहले सार्थक प्रश्न यह भी है कि वह इस या ऐसी कविता को रच ही क्यों रही है? क्या मात्र एक कवि होने के नाते उसकी मौजूदा मानसिकता के मद्देनज़र यह कविता उस पर उतरी है? यदि हाँ तो ऐसी कैसी उसकी मानसिकता हो गई है कि उसकी मार्फ़त एक प्रेम गीत जन्म ले रहा है?

क्या वह नायक गेरुलाल (संजीव कुमार) से प्रेम करने लगी है?

पर जैसा उसकी छोटी बहन चिनकी (किरण वैराले) एक बार गेरुलाल से कहती है की वह सबसे बड़ी बहन निमकी (शर्मीला टैगोर) को शिव मंदिर ले जाए जिससे वह मिट्ठू की शादी के लिए मन्नत मांग सके और प्रार्थना कर सके, और वह ही क्यों निमकी से विवाह नहीं कर लेता? सबसे छोटी बहन के सामने अगर स्पष्ट है कि गेरुलाल के लिए सबसे बड़ी बहन उपयुक्त साथी रहेगी तो यही बात मिट्ठू के मन में क्यों न आयेगी कि पहले बड़ी बहन का विवाह सुयोग्य वर से हो जाए?

या कि निमकी ही मिट्ठू से बात कर चुकी है कि वह गेरुलाल से उसके विवाह की बात करेगी?

या कि चूंकि उसके दुःख से ही नियंत्रित सीमित अवसर वाले जीवन में पहली बार प्रसन्नता के भाव आने से वह इन सब व्यावहारिकताओं से ऊपर उठ गयी है और सिर्फ अपने दिल के भावों को ही ऊँची उड़ान देना चाहती है| वह संभवतः यह भी न सोचना चाहती हो कि शायद गेरुलाल उसके प्रेम को स्वीकार न करे? क्योंकि ऐसा सोचना ही उसके नए-नए देखे स्वप्न की भ्रूण ह्त्या कर देगा| अभी वह सिर्फ इस नए जन्में प्रेम के भाव के अहसास में घिरे रहने का लुत्फ़ उठाना चाहती है|

दर्शक को इन सब संभावनाओं के मध्य ही बैठ कर ही मूक मिट्ठू के अंतर्मन से फूट रहे इस बेहद मधुर गीत का आनंद लेना है| मिट्ठू प्रेम में है, यह बात बर्फीली हवाओं के थपेड़ों से जूझते हुए एकांत में पर्वत की चोटी पर सर्द चट्टानों पर बैठी या वहां विचरण करती मिट्ठू के चेहरे पर बार बार बरबस उभरती मुस्कान से और उसके चेहरे और आँखों की चमक से स्पष्ट हो जाती है|

पर मिट्ठू के ये सब भाव और उसके व्यव्क्तित्व में पनपी चमक उसके अपने जैसे देहधारी गेरुलाल के प्रति प्रेम से उत्पन्न हुयी है या यह मीरा के श्याम से प्रेम जैसा अस्तित्व से परे का अधात्मिक प्रेम है? क्योंकि ऐसी स्थितियां भी मनुष्य जीवन में आ जाती हैं जहां मनुष्य प्रेममयी स्थितियों में तो आ जाता है पर यह प्रेम या तो उसके तसव्वुर में बसी किसी छवि के प्रति होता है या बस प्रेम में होने की खातिर वह प्रेम मार्ग पर चल पड़ता है| इस मनस्थिति के लिए ‘अज्ञेय’ ने ‘शेखर: एक जीवनी’ में निम्न कविता उद्घृत की –

A lad there is, and I am that poor groom

That’s fallen in love and knows not with whom

यह सुखद रूप से विविधता की बात है कि जहां निमकी शिव के मंदिर जाना चाहती है वहीं मिट्ठू के अंतर्मन के गीत में काली कमली वाले कान्हा का वास है| जो सीधे सीधे उसके मन में प्रेम के अंकुर फूटने का धोतक भी है|

गुलज़ार के बहुत से अन्य गीतों की तरह यह गीत भी अपने स्वरूप में बहुअर्थी ही है|

“दरगाह” और “ताबीज़” दो शब्द अगर इस गीत में न होते तो गुलज़ार का यह गीत समयातीत होकर राधा और मीरा के प्रेम तक पहुँच गया होता पर इन दो प्रतीकों के कारण यह नमकीन फिल्म के पात्र मिट्ठू का गीत बन जाता है| पर यह फिल्म से स्वतंत्र गीत भी है और यह किसी पहाडी अंचल की एक स्थानीय युवती का गीत भी आसानी से बन जाता है|

बदरा बिदेसी को प्रेमी का प्रतीक भी माना जा सकता है| जिसे अपने काली कमली वाले की सौगंध देकर मिट्ठू उससे अपने मन की आकाक्षाओं को पूरा करने का आग्रह कर रही है| कृष्ण तो सर्वव्यापी अमर प्रेमी हैं जगत में और एक स्त्री अपने प्रेमी को प्रेम करने के साथ-साथ कृष्ण को भी डंके की चोट पर प्रेम कर सकती है और संसार में कोई उसे कुछ न कहेगा वरन उसके प्रेम में होने की क्षमता की सत्यता की गवाही देगा|

अपनी अलंकृत भाषा, शाब्दिक विन्यास, शाब्दिक अर्थ, और गीत के खूबसूरत फिल्मांकन के बलबूते गुलज़ार के दस सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मी गीतों में यह गीत सहज ही शामिल हो जाएगा|

इस गीत को कवियत्री पर झरने या उतरने वाले प्रेममयी कवित्त और प्रेम के अनूठे संसार में नई नई प्रवेश करने वाली युवती के ह्रदय के उद्गारों के मिश्रण से उपजे गीत की संज्ञा दी जा सकती है| कभी गीत की किसी पंक्ति में कवियत्री नेतृत्व करती है तो कभी प्रेममयी युवती आगे बढ़ सब कुछ अपने भावों के नियंत्रण में ले लेती है| इस सम्मोहक मिश्रण के कारण ही गीत के सार से कोई एक छवि निकालना लगभग असंभव बात है| इस गीत का सम्पूर्ण आनंद तो जब जैसा भाव हो उसके साथ धारा के उतार चढ़ाव के साथ बहने में ही है|

फिर से अइयो बदरा बिदेसी

तेरे पंखों पे मोती जड़ूँगी

फिर से अइयो बदरा बिदेसी … यह प्रेम के अहसासों से दो चार हो रही युवती का आग्रह है उस व्यक्ति के प्रति जिसके प्रति उसके मन में प्रेम के अंकुर फूटे हैं| प्रेमी को कल्पना में बादल बना वह अपने पास बुलाकर वह उसका श्रृंगार करना चाहती है अपना प्रेम, सत्कार, और वात्सल्य आदि सब कुछ उस पर उडेलना चाहती है|

भर के जइयो हमारी तलैया

मैं तलैया किनारे मिलूँगी

तुझे मेरे काले कमली वाले की सौं

भर के जइयो हमारी तलैया…  बादल से कवियत्री का आग्रह है जिसमें बचपन से लेकर नायिका की आज की उम्र तक के वे सब लम्हे सिमट गए होंगे जब उसने बरसात के पश्चात बरसात के पानी से भरी तलैया के माध्यम से कितने ही आनंददायक अनुभवों को जिया होगा| नायिका बादल से उसकी अपनी निजी तलैया किनारे मिलने की बात करती है जहां वह तलैया के भरने से लेकर भरने के बाद के रूपांतरण का भरपूर आनंद ले सके| इस तलैया को नायिका का ह्रदय भी माना जा सकता है जिसमें वह बादल रूपी प्रेमी से प्रेम भरने का आग्रह कर रही है और ऐसा ही करने के लिए उसे अपने इष्ट “काली कमली वाले” की सौगंध भी दे रही है|

तेरे जाने की रुत मैं जानती हूँ

मुड़ के आने की रीत है कि नहीं

एक स्थान पर अल्पावधि के लिए वास करने वाले और जगह जगह घूमने वाले घुमंतू ट्रक चालक की प्रवृत्ति का सामंजस्य वह आकाश में इधर उधर विचरण करते बादल से करती है जो हवा के रुख के संग बह जाया करता है| प्रेमी/बादल को जाना है और वह जाएगा और इस बात को स्वीकारने में उसकी वाणी में कहीं कोई थरथराहट नहीं सुनाई देती लेकिन ‘मुड़ के आने की रीत है कि नहीं’ गाते हुए वाणी में शरारत तो है परन्तु अनिश्चय का पुट उभर आने का आभास भी है जि नायिका के चेहरे पर भी उभर आता है|

काली दरगाह से पूछूँगी जाके

तेरे मन में भी प्रीत है कि नहीं

ऐसे अनिश्चय में जहां उसे नहीं पता कि जिसके कारण उसके हृदय में प्रेम की वीणा के तार झंकृत हुए हैं क्या उसके ह्रदय में भी प्रेम के अंकुर फूटे हैं या नहीं? उस पुरुष से पूछ न सकने के कारण वह अपने इष्ट या श्रद्धा के स्रोत पीर की दरगाह पर जाकर पूछने का संकल्प करती है| पीर ही उसके मौन प्रश्न का मौन उत्तर दे सकते हैं ऐसा एक छोटे पहाडी अंचल में रहने वाली युवती के मासूम और जीवन के बहुत से अनुभवों से हीन मन का विश्वास  है|

कच्ची पुलिया से होके गुजरियो

कच्ची पुलिया किनारे मिलूँगी..

तुझे मेरे काले कमली वाले की सौं

कुछ स्थान एक व्यक्ति के लिए स्थानीय और व्यक्तिगत महत्त्व के होते हैं और छोटी जगहों पर जहां जीवन मंथर गति से बहा करता है और जीवन में दैनिक स्तर पर बहुत सी घटनाएं घटित नहीं हुआ करतीं वाहना तो व्यक्तिगत पसंद की कोई बहुत छोटी सी जगह जो दूसरों को मामूली लगेगी एक व्यक्ति के लिए निजी रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है| हो सकता है यह कच्ची पुलिया मिट्ठू की पसंदीदा जगहों में से एक हो या यह वह पुलिया हो जिससे होकर गेरुलाल ट्रक से गाँव से बाहर जाया या गाँव के अन्दर आया करता है और इसलिए मिट्ठू के लिए इस पुलिया का महत्व बढ़ जाता है| और इस पुलिया किनारे मिलने की लालसा वह जाहिर करती है|

तू जो रुक जाए मेरी अटरिया

मैं अटरिया पे झालर लगा दूँ

डालूँ चार ताबीज़ गले में

अपने काजल से बिंदिया लगा दूँ

छूके जइयो हमारी बगीची

मैं पीपल के आड़े मिलूँगी..

तुझे मेरे काले कमली वाले की सौं

यह बहुत गहरे में नायिका का प्रणय निवेदन गीत भी है| इस अंतरे के दृश्यात्मक रूपांतरण में मिट्ठू के चेहरे और आँखों से उसके प्रेममयी क्षणों को जीने का आनंद झर रहा है| यहाँ वह प्रेम में सराबोर संतुष्ट जीव है| इसमें वात्सल्य का पुट भी महसूस होता है| प्रेमी के रुकने से प्रसन्न हो वह साज सज्जा की ही बात नहीं करती बल्कि उसके इस प्रेममयी संसार को किसी की नज़र न लग जाए इसके लिए एक नहीं बल्कि चार ताबीज़ बाँध कर रक्षा कवच बनाने की तैयारी रखती है|

इस गीत को शबाना आजमी के फ़िल्मी जीवन में उन पर फ़िल्माए गीतों में सर्वश्रेष्ठ कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी| जिस तरह खामोश रह कर अपने चेहरे, अपनी आँखों और अपने ओठों और अपने शारीरिक हाव भावों से गीत को जीवन प्रदान किया है और नायिका एके मनोभावों को व्यक्त किया है वह काबिले तारीफ़ अभिनय प्रदर्शन है|

आशा भोसले की गायिकी ने इस गीत में प्राण भर दिए हैं| उदासी, प्रेम के रस, प्रेम के प्रति समर्पण और सहसा मन में उभर आये आशा और ऊर्जा के संचार जैसे भावों को उन्होंने बेहद खूबसूरती से इस व्यंजनात्मक और अलंकारिक गीत में अभिव्यक्त्त किया है| जैसा दर्द और बिछोह का पुट वर्तमान में रेखा भारद्वाज की आवाज और गायिकी में है उससे ऐसा अनुमान लगता है कि नमकीन में गुलज़ार का यह बेहद ख़ास गीत उनके गायन के लिए भी एक श्रेष्ठ माध्यम है| अगर कभी गुलज़ार के किसी पुराने गीत को उन्हे अपने स्वर देने पड़ें तो यह गीत सर्वश्रेष्ठ अवसर उत्पन्न करता है उनके लिए|

…[राकेश]

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