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Cinema, Theatre, Music, Literature & Life

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Indian Cinema

Satyam Shivam Sundaram(1978): सौन्दर्यशास्त्र पर टीका

अष्टावक्र का शरीर 8 जगह से झुका हुआ था इसलिए बचपन से ही उन्हें अष्टावक्र नाम से संबोधित किया जाता था| जब अष्टावक्र केवल 12 वर्ष के थे, तब वे राजर्षि राजा जनक के दरबार में चल रहे शास्त्रार्थ से अपने पिता को बुलाने गये| जनक के दरबार... Continue Reading →

Woh Bhi Din The (2004) : स्कूली जीवन

स्कूल के दिन भी क्या दिन होते हैं और व्यक्ति को जीवन भर उनकी स्मृतियाँ अपनी ओर खींचती रहती हैं| हिंदी फ़िल्म उद्योग में जमशेदपुर वासियों की ओर से बनाई गई यह फ़िल्म कम से कम दस साल पुरानी है लेकिन प्रदर्शित... Continue Reading →

Shakti(1982): दुःखजनित सन्नाटे से भरे वे 3 मिनट

दर्द हो दुख हो तो दवा कीजे फट पड़े आसमाँ तो क्या कीजे एक सिनेमा वैसा होता है जिसके लिए कहा जाता है Clash of the Titans. बड़े बड़े धुरंधर अभिनेता एक साथ अपने अभिनय के जौहर दिखाकर सिनेमा के परदे... Continue Reading →

Dushman 1972 : अपराध, दंड और प्रायश्चित

ताजिराते हिन्द की दफा 304 के लिए एक अनोखी सजा सुनाकर दुश्मन फ़िल्म में जज महोदय (रहमान) गैर- इरादतन अपराध कर जाने वाले व्यक्ति को सुधरने का अवसर देते हैं| किसी सामान्य व्यक्ति से गैर-इरादतन कोई अपराध हो जाए, इसमें... Continue Reading →

जब्बर सिंह (मेरा गाँव मेरा देश 1971)

...[राकेश]

वफ़ा जो न की तो (मुकद्दर का सिकंदर 1978)

सिनेमा के परदे पर अमिताभ बच्चन और रेखा की जोड़ी का अर्थ ही परदे पर बिजली का करेंट दौड़ना रहा है| एक समय था जब अमिताभ बच्चन अपने चरित्रों में कॉमेडी की भरपूर डोज़ दर्शकों को दिया करते थे और उस दौर की फिल्मों में अगर रेखा उनकी... Continue Reading →

बीड़ी जलाई ले, जिगर से पिया (Omkara 2006)

अच्छा फ़िल्मी गीत लिखना क्रिकेट की भाषा में ऐसा है कि ऐसा बल्लेबाज हो जो हर तरह की गेंद पर टीम की आवश्यकता के अनुसार रन बना सके| फ़िल्मी गीत महज कविता नहीं होती, और न वह कविता की तरह... Continue Reading →

Prem Parbat (1973): मिथक या सत्य

फिल्में जो समय के साथ उपलब्ध नहीं रह पातीं, उनके साथ लोगों की कल्पनाएँ जुड़ती चली जाती हैं और जैसे लोग एक ही घटना को अपनी ओर से कुछ लीपापोती के साथ प्रस्तुत करके उसका प्रारूप ही बदल देते हैं... Continue Reading →

स्मिता पाटिल को अचानक लगते थप्पड़ (भूमिका)

कई साल पहले जब फ़ारुक शेख टीवी शो - जीना इसी का नाम है, को प्रस्तुत करते थे तब श्याम बेनेगल वाली क़िस्त में सेट पर आये अमरीश पुरी ने श्याम बेनेगल की फ़िल्म - भूमिका, के बारे में कहा... Continue Reading →

Girls Will Be Girls (2024): बड़ी होती लड़की!

...[राकेश]

Meiyazhagan (2024) : भोलेपन में है वफ़ा की खुशबू

आज फिर शुरू हुआ जीवन आज मैंने एक छोटी-सी सरल-सी कविता पढ़ी आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा जी भर आज मैंने शीतल जल से स्नान किया आज एक छोटी-सी बच्ची आई, किलक मेरे कन्धे चढ़ी आज मैंने... Continue Reading →

Agni (2024) : आग ये किस ने लगाई?

अपने जलने का हमेशा से तमाशाई हूँ आग ये किस ने लगाई मुझे मालूम नहीं (~ मोहम्मद आज़म) एक अग्निशामक, दमकलकर्मी, अग्नियोद्धा या फायरमैन को नायक बनाकर उनके खतरनाक कार्य को बारीकी से दिखाने के लिए फ़िल्म - अग्नि, सराहनीय... Continue Reading →

Kooki (2024) : कानूनी छ्लात्कार

कूकी, फ़िल्म की 16 वर्षीय नायिका (रितिषा खौंड) का नाम भी है और फ़िल्म का शीर्षक भी| गैंग रेप की शिकार नायिका के बलात्कारियों को पुलिस पकड़ लेती है, अदालत सजा भी दे देती है लेकिन कूकी को इससे राहत... Continue Reading →

Aye Zindagi (2022) : दुःख अपने पराये

दुःख ऐसा भाव है मनुष्य के जीवन में कि इसमें कुछ कहावतें एकदम सटीक बैठती हैं पर उपदेश कुशल बहुतेरे जाके पाँव न फटे बिवाई सो क्या जाने पीर पराई किसी दूसरे पर जब दुःख का साया पड़ता है तो... Continue Reading →

Sharda(1957): प्रेमिका सुहागन प्रेमी के पिता की

कल्पना कीजिये कि एक युवक की प्रेमिका परिस्थितिवश उसकी माँ बन जाये तो क्या हो? ऐसे रिश्ते से उपजे जटिल समीकरण को सुलझाने के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित दक्षिण और हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक एल वी... Continue Reading →

अगम (2022): अध्यात्म की खोज वाया बनारस

संस्कृत भाषा से आये शब्द - अगम, के कई अर्थ हैं -> अनादि, अनंत, निस्सीम, अथाह, बहुत गहरा, समझ की सीमा से बाहर, जहां तक पहुँच न हो, आदि इत्यादि | हिंदी फिल्मों ने अध्यात्म पर हिन्दू दर्शन को समेटने... Continue Reading →

फिर कभी (2008)

निर्देशक वी के प्रकाश द्वारा निर्देशित फ़िल्म - फिर कभी को यूटीवी ने सीधे डीवीडी और डी टी एच पर प्रदर्शित किया था| जिन सालों में वयस्क प्रेम कहानियों पर जोगेर्स पार्क जैसी फ़िल्में बन रही थीं| यह उस दिशा से अलग किस्म की... Continue Reading →

Zid (1976) : लापता फ़िल्म

1976 में प्रदर्शित हुयी फ़िल्म - ज़िद, के अभी 50 साल भी पूरे नहीं हुए लेकिन निर्देशक विजय द्वारा निर्देशित यह फ़िल्म बहुत सालों से लापता है| चूंकि इसकी डीवीडी और शायद वीसीडी भी कभी प्रदर्शित नहीं हुयी तो वीएचएस... Continue Reading →

DevAnand@101 : लता मंगेशकर गीत देव आनंद के लिए

लता मंगेशकर ने गायन में अपनी एक अधूरी रह गई इच्छा के बारे में कहा था कि वे दिलीप कुमार के लिए गीत नहीं गा पायीं और यह संभव भी नहीं था क्योंकि कई अन्य अभिनेताओं की तरह दिलीप कुमार... Continue Reading →

देव आनंद के आंसू

रोमांटिक कॉमेडी फिल्मों में देव साब को देखने की बात ही कुछ है| पचास के दशक के तीन सबसे बड़े नायकों में से एक देव आनंद अपनी फिल्मों में कोशिश करते थे कि उन्हें परदे पर रोने के सीन न करने पड़ें| शायद उन्हें... Continue Reading →

अंखियों के झरोखों से मैंने देखा जो सांवरे…

राजश्री प्रोडक्शन हाउस के अंतर्गत निर्माता ताराचंद बड़जात्या द्वारा निर्मित एवं हिरेन नाग द्वारा निर्देशित फ़िल्म, अंखियों के झरोखों से, मोटे तौर पर  Erich Segal के 1970 में प्रकाशित बहुचर्चित लघु उपन्यास Love Story, जिस पर हॉलीवुड में इसी नाम... Continue Reading →

Hip Hip Hurray (1984)

प्रकाश झा की इस फ़िल्म हिप हिप हुर्रे में गुलज़ार स्क्रीनप्ले और संवाद+गीत लेखक के रूप में जुड़े हुए हैं सो बहुत हद तक यह गुलज़ार की भी फ़िल्म है| गुलज़ार की परिचय में जीतेंद्र के चरित्र को अपने योग्य नौकरी मिलने तक के काल में अपने... Continue Reading →

Angry Young Men The Salim Javed Story

सलीम-जावेद द्वारा लिखी गई फिल्मों की सफलता की पतंग आसमान में ऊपर, और ऊपर चढ़ती ही जा रही थी कि पहले ईमान धरम और फिर शान ने उस उड़ान को नीचे गोता लगवा दिया| बीच बीच में डॉन जैसी सुपर... Continue Reading →

Gulzar@90

शेरदिल: द पीलीभीत सागा और प्रकृति प्रेमी गुलज़ार : गुलज़ार घोषित रूप से 90 साल के हो गए हैं| आज भी वे अवसर मिलते ही पूरे संवदेना से हिंदी फ़िल्मी गीतों की सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए भी वर्तमान में... Continue Reading →

गुरु दत्त, ओशो और जीने की इच्छा!

कहा जाता है कि अभिनेता-निर्देशक गुरुदत ने आत्महत्या की थी, और इस बात को मानने वाले इस बात को स्वीकार नहीं करते कि शराब और नींद की गोलियों के मिश्रण से यह एक दुर्घटना मात्र भी हो सकती थी पर तब भी... Continue Reading →

Routu Ka Raaz (2024)

उत्तराखंड में मसूरी के पास स्थित एक छोटी सी जगह के एस एच ओ - दीपक नेगी (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) मंथर गति से चलायमान इस फ़िल्म के नायक हैं| फ़िल्म में दीपक नेगी का भूतकाल है जिसने उसके वर्तमान को ग्रसित... Continue Reading →

The Miniaturist Of Junagadh (2021)

एक शाम जब, अपने अन्दर जाने कितने दशकों की दास्ताँ समेटे हुये पुश्तैनी घर को छोड़कर जाना है, उस दिन की सुबह कैसी होगी, वृद्ध कलाकार हुसैन के लिए और उसके परिवार (पत्नी - सकीना, और बेटी - नूर) के... Continue Reading →

Tarla (2023)

पीयूष गुप्ता द्वारा निर्देशित फ़िल्म - तरला, जो कला की, विशेषज्ञ , कलाकार एवं वैज्ञानिक तरला दलाल की बायोपिक है और "स्त्री विमर्श" को आधुनिक काल में केंद्र में रखती है| भारत में स्त्री विमर्श और स्त्री प्रगति पर बनी एक सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म... Continue Reading →

Gandhi & Film

रिचर्ड एटनबरो की गांधी और बासु भट्टाचार्य एवं राजकुमार संतोषी ---------------------------------------------------------------------- 50 और 60 के दशक में हिंदी सिनेमा में एक से बढ़कर एक दिग्गज फ़िल्म निर्देशक और हर लिहाज से समर्थ निर्माता उपस्थित थे, बड़े काबिल लेखक फिल्मों के... Continue Reading →

RimJhim ke Tarane leke

एक अकेली छतरी में जब आधे आधे भीग रहे थे, पंक्ति जब गुलज़ार ने रची होगी अपनी फ़िल्म इज़ाजत के एक गीत के लिए, तब बहत संभावना है इस बात की कि उनकी स्मृति में विजय आनंद की फ़िल्म काला बाज़ार... Continue Reading →

Mandi (1983)

हिंदी सिनेमा में तवायफों के जीवन को हमेशा ही बहुत ग्लैमराइज़ किया गया था| श्याम बेनेगल ने हिंदी सिनेमा के उस तरीके से उलट 1983 में मंडी बनाकर प्रदर्शित कर दी और इसे देखना तवायफों का जीवन श्याम बेनेगल की... Continue Reading →

चाय के बहाने (चिंटूजी 2009)

अंतरे जैसे मुखड़े से शुरू होकर गीत में तीन अंतरे और हों तो यह तो स्पष्ट ही है कि 2009 में प्रदर्शित फ़िल्म - चिंटूजी में इस गीत का अस्तित्व ऐसे ही समय काटने के लिए नहीं है, बल्कि गीत... Continue Reading →

Dancing on the grave

ओटीटी के अस्तित्व से विभिन्न प्रकार की डॉक्यूमेंटरीज़ सामने आ रही हैं| कुछ तो ऐसी हैं जो जीवित लेकिन विवादास्पद लोगों के जीवन आया उनके किसी विशेष स्कैंडल पर बनी हैं| और कुछ को देखकर तो ऐसा ही लगता है... Continue Reading →

36 Ghante (1974)

थ्रिलर फ़िल्म की सफलता इस बात में है कि परदे पर घटित हर बीतते पल दर्शक को असमंजस में डाले रखे कि आगे क्या होगा या अगर दर्शक कुछ चाह रहा है किन्हीं चरित्रों की तरफ से तो वैसा घटित... Continue Reading →

Khoj (1989)

रामसे परिवार के केशु रामसे द्वारा निर्देशित खोज एक ब्रिटिश फ़िल्म पर आधारित है| मूल ब्रितानी फ़िल्म पर बहुत सी भारतीय भाषाओं में फ़िल्में बनी| रामसे ब्रदर्स फ़िल्म निर्माण फैक्ट्री की यह इकलौती फ़िल्म होगी जिसमें भूत या चुड़ैल का मुखौटा नहीं... Continue Reading →

यश चोपड़ा की फ़िल्मी शरारतें

...[राकेश]

Ittefaq (1969)

जिस मर्डर मिस्ट्री थ्रिलर को यश चोपड़ा ने बस यूँ ही वक्त के बाद अगली बड़ी फ़िल्म बनाने की तैयारियों के बीच छोटी सी अवधि में सीमित साधनों के साथ बना लिया था वह पिछले 5 दशकों से ज्यादा समय... Continue Reading →

1971 (2007)

बांग्लादेश मुक्ति संघर्ष के कारण छिड़े भारत-पाक युद्ध (1971) के दौरान भारतीय सेना ने न केवल रिकॉर्ड समय में इस युद्ध को जीता बल्कि दुनिया के किसी भी अन्य देश से ज्यादा बड़ा कारनामा दिखाते हुए पाकिस्तान की सेना से आत्मसमर्पण करवा कर लगभग 90000 युद्धबंदियों... Continue Reading →

Shiva (1990)

1990 का साल समाप्त होते होते चुपके से दक्षिण भारत से हिंदी सिनेमा में एक आगंतुक का आना हो गया| ये सज्जन साथ लाये थे एक साल पहले तेलगु में अपनी ही बनाई पहली फ़िल्म को दुबारा से हिंदी में बनाकर|... Continue Reading →

Aitbaar (1985)

जो भारतीय दर्शक Alfred Hitchcock की Dial M for Murder (1954) और हॉलीवुड में ही इसकी रीमेक, माइकल डगलस अभिनीत A Perfect Murder (1998) नहीं देख पाए, वे इसी प्लॉट पर बनी मुकुल आनंद की एतबार (1985) देख सकते हैं| हॉलीवुड की दोनों फिल्मों से अलग एतबार, बप्पी लाहिड़ी द्वारा संगीतबद्ध दो प्रसिद्द गीतों "किसी नज़र को तेरा... Continue Reading →

Kaash (1987)

दुःख को देखना, और उसके अस्तित्व को स्वीकारना, जीवन को थोड़े ही पलों के लिए सही पर, परिवर्तित कर ही जाता है, व्यक्ति ठिठक कर कुछ सोचने विचारने के लिए मजबूर हो जाता है| जैसे गाडी के ब्रेक्स उसकी गति... Continue Reading →

Sarfarosh (1999)

जॉन मैथ्यू मेथन, ने फ़िल्म निर्देशक के रूप में अपनी पहली ही फ़िल्म - सरफ़रोश, से ऐसी चमक दिखाई कि उनसे बहुत बड़ी बड़ी अपेक्षाएं सिने प्रेमियों को बंध गयीं थीं| सरफ़रोश की पटकथा पर उन्होंने छः सात साल जम कर काम किया था... Continue Reading →

डाकिया डाक लाया : गुलज़ार का लिखा ख़त लाया

गुलज़ार साब के गीत ऐसे होते हैं जो श्रोता और पाठक की भावनाओं को अपने साथ अपनी इच्छित दिशा में ले जा सकते हैं| गुलज़ार भावनाओं के ट्रैफिक के नियंत्रक कवि हैं| बहुत सी फ़िल्में ऐसी हैं जिनसे वे केवल एक गीतकार... Continue Reading →

The Kerala Story (2024) : औचित्य!

पार्थो घोष ने 1993 में एक फ़िल्म बनाई थी -दलाल, जिसका विलेन जगन्नाथ त्रिपाठी (राज बब्बर) गर्व से कहता था कि वह चमड़ी बेचकर दमड़ी कमाता है| वह स्त्रियों को वेश्यावृत्ति में धकेलकर उनके माध्यम से पैसे कमाता था| जगन्नाथ,... Continue Reading →

Amitabh Bachchan :Director Hrishikesh Mukerjee (2)

(4) मिली (1975): यहां हृषिदा ने अमिताभ को एक और जटिल किरदार- शेखर, निभाने को दिया। वह अपनी पारिवारिक परिस्थितियों के कारण अकेला रहने को मजबूर है और वह किसी से मिलना नहीं चाहता। वह कोई दुष्ट व्यक्ति नहीं है लेकिन जहां तक ​​बाहरी दुनिया का... Continue Reading →

Amitabh Bachchan + Director Hrishikesh Mukerjee (1)

हृषिदा के साथ अमिताभ बच्चन का जुड़ाव बहुत ही सफल और फलदायी रहा है| अमिताभ को जो एक अच्छा कलाकार होने का सम्मान, उनके पैन इण्डिया सुपर स्टार होने से इतर मिला उसमें सबसे बड़ी भूमिका हृषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित फिल्मों में निभाई गई भूमिकाओं... Continue Reading →

Tulsi (2008) : इरफ़ान खान की लत, लाचारी और आंसू

इरफ़ान खान ने अपने फ़िल्मी जीवन में तरह तरह की भूमिकाएं निभाईं हैं जिनकी खूब चर्चाएँ होती रही हैं| लेकिन उनकी एक फ़िल्म - तुलसी की मुश्किल से ही चर्चा होती है जबकि इरफ़ान ने इसके एक सीक्वेंस में अपने... Continue Reading →

Veer Zaara : Manoj Bajpeyee

मनमोहन देसाई की सुपरहिट फ़िल्म अमर-अकबर-एंथनी में एक दृश्य है जिसमें इन्स्पेक्टर अमर (विनोद खन्ना), एंथनी (अमिताभ बच्चन) को उसके मोहल्ले से पीट पाट कर लाकर हवालात में बंद कर देता है और हवालात से चोट खाया एंथनी, बाहर अपनी... Continue Reading →

Merry Christmas (2024) : पिंजरे के पंछी तेरा दर्द न जाने कोय

  ...[राकेश]

Dillagi (1978) : बसंत, कालीदास, कमल और फूल का प्रेम

...[राकेश]

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