मुझे ले चलो, आज फिर उस गली में
जहाँ पहले पहल, ये दिल लड़खड़ाया
वो दुनिया, वो मेरी मोहब्बत की दुनिया
जहां से मैं बेताबियां लेकर के आया

जहाँ सो रही है मेरी जिंदगानी

जहाँ छोड़ आया मैं अपनी जवानी
वहां आज भी एक चौखट पे ताज़ा
मोहब्बत के सजदों की होगी निशानी

वो दुनिया जहाँ उसके नक़्शे कदम है
वहीं मेरी खुशियाँ, वहीं मेरे गम है
मैं ले आऊंगा खाक़ उस रहगुजर की
के उस रहगुजर की जो जर्रे सनम है

वहां एक रंगीन चिलमन के पीछे
चमकता हुआ उसका, रुखसार होगा
बसा लूंगा आँखो में वो रोशनी मैं
यूंही कुछ इलाजे दिल-ए-जार होता

… [राकेश]


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