...[राकेश]
...[राकेश]
कौन है भारत में ऐसा जो हिन्दी सिनेमा के संगीत संसार में मौजूद नायाब खजाने से रुबरु हुआ हो और शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के (अलबेला-1951) , मुड़ मुड़ के न देख (श्री 420 - 1955), मेरा नाम चिन... Continue Reading →
ऐसी उलझी नज़र उनसे हटती नहीं दाँत से रेशमी डोर कटती नहीं उम्र कब की बरस कर सफ़ेद हो गयी कारी बदरी जवानी की छँटती नहीं वल्लाह ये धड़कन बढ़ने लगी है चेहरे की रंगत उड़ने लगी... Continue Reading →
स्त्री स्वरों में गाये गये गीत पुरुष स्वरों में गाये गीतों से ज्यादा अच्छे हैं। सुनो नंद रानी, ओ री सौतनियाँ, न जाने कहाँ बंसी बजाये घनश्याम, कहाँ छोड़ी मुरली कहाँ छोड़ी राधा, बन नौ रसमय, और मुरली तुम्हारी अजब... Continue Reading →
विवश श्वेत वस्त्रधारी अशरीरी अंतर्मन वापिस नरगिस के शरीर में प्रवेश कर जाता है। लता मंगेशकर ने अपनी गायिकी से इस गीत में उपस्थित दुख भरे भावों को गहरायी प्रदान की है। चाहे वह आवारा का ड्रीम सीक्वेंस हो या... Continue Reading →
जिन दर्शकों ने इसे न देखा हो, जब भी उनका मौका लगे उन्हें इस फिल्म की डीवीडी एकदम लपक लेनी चाहिये। बच्चे के मनोविज्ञान को बखूबी दर्शाती केवल 80 मिनट लम्बी फिल्म उन्हें मोह लेगी। ...[राकेश]
https://youtu.be/PZzK3CVzLKo?si=2nmcAZCge8fVpSNI इजाज़त में एक सच्चाई है। कविता है पर जीवन की सच्चाई से ओतप्रोत। © …[राकेश]
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