Darlingकौन है भारत में ऐसा जो हिन्दी सिनेमा के संगीत संसार में मौजूद नायाब खजाने से रुबरु हुआ हो और शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के (अलबेला-1951) , मुड़ मुड़ के न देख (श्री 420 – 1955), मेरा नाम चिन चिन चूँ (हावड़ा ब्रिज – 1958), और ना माँगू सोना चाँदी ना माँगू हीरे मोती (बॉबी -1973) जैसे गीतों ने उसके अंग-अंग और मन में थिरकन न पैदा की हो। बहुत सालों से ऐसे क्लब/पार्टी वाले कोरस गीत नहीं बन पाये थे और इस नयी शताब्दी के दूसरे दशक के पहले ही साल में गुलज़ार, विशाल भारद्वाज, रेखा भारद्वाज और ऊषा उत्थुप की टीम ने फिर से हिन्दी सिनेमा के संगीत संसार को उपरोक्त्त गीतों की टक्कर का गीत भेंट किया| यह गीत भी आने वाले कई दशकों तक श्रोताओं के साथ चिपका रहेगा

सन्नाटे को भंग करती हुयी ऊषा उत्थुप की मस्ती भरी ऊर्जावान आवाज गीत को जन्माती है।

डार्लिंग आँखों से आँखें चार करने दो

विशाल के वादकगण अपने अपने वाद्य-यंत्रों के सहारे धीरे से, बड़े प्रेम से हौले से छू जाने वाली धुनों के द्वारा गीत में अपने आगमन की घोषणा करते हैं और चारों तरफ धुनों को बिखेर देते हैं।

रेखा भारद्वाज की मदभरी आवाज इस संगीतमयी वातावरण में ऊषा उत्थुप द्वारा शुरु की गयी स्वर लहरी के सिरे को पकड़ कर गीत-युगलबंदी में उतनी ही ऊर्जा से प्रवेश करती है।

डार्लिंग आँखों से आँखें चार करने दो
रोको न रोको न मुझको प्यार करने दो

कोरस गाने वाले गायक भी गीत में मस्ती और ऊर्जा का स्तर बनाये रखने में पूरा योगदान देते हैं और ऊषा उत्थुप और रेखा भारद्वाज के सुरों में सुर मिलाते हैं।

बेकैफ है बहारा
बैचेन जाने यारा
बुलबुलों को अभी इंतजार करने दो

रेखा भारद्वाज की आवाज अफसोस, शायद झूठा, जाहिर करती है

डार्लिंग सॉरी तुझे संडे के दिन ज़हमत हुयी

ऊषा उत्थुप कृतज्ञता दिखाती हुयी गाती हैं।

डार्लिंग मिलना तेरा फज़ले खुदा रहमत हुयी

कोरस गाने वाले गायक दोनों की तरफदारी करते हुये गा देते हैं।

रेखा भारद्वाज प्रेम निवेदन करती हुयी गाती हैं

हे डार्लिंग खादिम को दिल पर तो एख्तियार करने दो

और कोरस के गायक इस निवेदन से खुश होकर उनके निवेदन को अपने सुरों का समर्थन प्रदान करते हैं।

ऊषा उत्थुप आग्रह करती हैं

डार्लिंग छोड़ो ज़रा शर्माने का ये कायदा

रेखा भारद्वाज रक्षात्मक रुख अपनाती हुयी गाती हैं।

हे डार्लिंग हैरत भी है
गैरत भी है क्या फायदा

कोरस के गायक दोनों का पक्ष लेकर बात को विरोधाभासी माहौल दे देते हैं, जिससे दबाव में आकर ऊषा उत्थुप प्रेम को जगजाहिर करने की बात करती हैं और इस प्रयास में अगर दुनिया में सनसनी भी फैल जाये तो उन्हे कोई परवाह नहीं है।

हे डार्लिंग पब्लिक में सनसनी एक बार करने दो
डार्लिंग आँखों से आँखें चार करने दो

इस गीत को सुनने वालों को इस बात को स्वीकार करने में कतई गुरेज न होगा कि गुलज़ार, भारद्वाज दम्पति एवम ऊषा उत्थुप ने मिलकर एक गजब का गाना रच दिया है। रेखा भारद्वाज से इस गीत को गवाया जाना इस गीत में एक खासियत उत्पन्न कर गया है। सामान्यतः वर्तमान दौर में सुनिधि चौहान का ऐसे गीतों पर एकाधिकार सा हो गया है और रेखा भारद्वाज ने इस गीत को कुशलतापूर्वक गाकर अपनी गायिकी की विशाल रेंज को दर्शाया है और गीत में एक नशीला असर उत्पन्न किया है। ऊषा उत्थुप तो चैम्पियन गायक रही ही हैं ऐसे गीतों के लिये। दोनों गायिकाओं की जुगलबंदी ने भरपूर मस्ती गीत में बिखेरी है।

ऊर्जावान गीत ’डार्लिंग’ के खुले प्रेम प्रदर्शन के उलट अगले गीत ’बेकरां’ में गुलज़ार और विशाल भारद्वाज प्रेम की कोमल अभिव्यक्त्ति का सहारा लेते हैं।

बेकरां हैं बेकरां
आँखें बंद कीजिये न
डूबने लगे हैं हम
साँस लेने दीजिये न
लिल्लाह
एक ज़रा चेहरा उधर कीजिये
इनायत होगी
आपको देखके बड़ी देर से मेरी साँस रुकी है

मुगल-ए-आज़म’ में महल में स्थित बाग में बड़े गुलाम अली खान साब की आवाज में ’ प्रेम जोगन बन के ’ गाये गये गीत के गुंजन की पृष्ठभूमि में प्रेम प्रदर्शन और प्रेम की परस्पर स्वीकार्यता के बाद प्रथम प्रेम-मिलन के क्षणों का आनंद लेते हुये सलीम-अनारकली एक दूसरे के अस्तित्व में खोये हुये हैं। ऐसी नजदीकियों के क्षणों में सलीम की उपस्थिति और भावनाओं के मौन किंतु मुखर संप्रेषण के कारण अनारकली की शर्मोहया के भावों की अभिव्यक्त्ति
गुलज़ार और विशाल भारद्वाज के इस गीत के पहले दो मुखड़ों से अवश्य ही हो जाती।

पाकीज़ा में भी एक दृष्य है जहाँ जँगल में नदी किनारे गड़े हुये राजकुमार के खेमे में मीनाकुमारी दुर्घटनावश पहुँच जाती हैं और वहाँ रखी डायरी से उन्हे पता चलता है कि रेल के डिब्बे में उनके पैरों को देखकर रोमांटिक नोट लिखकर छोड़ देने वाला व्यक्त्ति ही इस खेमे में रहता है और वे डायरी में लिखे शब्दों के नशे में डूबी हुयी लेखन का आनंद ले रही हैं कि उन्हे घोड़े की टापों की आवाज सुनायी देती है और वे भय और उत्तेजना के मिश्रण से होश खोने लगती हैं और आँखें बंद करके लेट जाती हैं। बंद आँखों से भी वे अपने चेहरे पर राजकुमार की उत्सुक आँखों की तपिश को महसूस कर सकती हैं। उनकी धड़कनों की रफ़्तार कई गुना बढ़ चुकी है, सांसे बढ़ चुकी हैं और वे मन ही मन प्राथना करती है कि ’ अल्लाह के वास्ते ज़रा उधर देखिये वरना मैं ऐसे ही मर जाऊँगी, और उनके दिल की बात सुनकर राजकुमार सौंदर्य की मल्लिका के चेहरे से नज़रें हटाकर खेमे के बाहर पड़ी आरामकुर्सी पर जा बैठते हैं।

गुलज़ार साब ने जो पंक्तियाँ ’ लिल्लाह एक ज़रा चेहरा उधर कीजिये / इनायत होगी / आपको देखके बड़ी देर से मेरी साँस रुकी है ’ रची हैं वे मीना कुमारी और कमाल अमरोही की पाकीज़ा को सच्ची श्रद्धांजलि देती हैं। पाकीज़ा जैसे माहौल का असर ये पँक्तिया यहाँ उत्पन्न करती हैं।

एक ज़रा देखिये तो
हाथों के पाँव तले
कुछ तो अटका है कहीं
वक्त्त से कहिये चले
उड़ती उड़ती सी नज़र
मुझको छू जाये अगर
एक तस्लीम को
हर बार मेरी आँख झुके
आपको देखके बड़ी देर से मेरी साँस रुकी है

किसी गीत में इतनी रोमांटिक पंक्तियाँ आज के दौर में दुर्लभ है। पिछली बार ऐसा गीत गुलज़ार साब और विशाल भारद्वाज की जोड़ी ने ही दिल तो बच्चा है जी के रुप में रचा था।

आँख कुछ लाल सी है
रात जागे तो नहीं
रात जब बिजली गयी
डरके भागे तो नहीं
क्या लगा होंठ तले
जैसे कोई चोट जले
जाने क्या सोचके
इस बार मेरी आँख झुकी
आपको देखके
बड़ी देर से मेरी साँस रुकी है

अंतिम अंतरे में गुलज़ार साब अपने बहुत सारे गीतों की तरह गीत के पहले के अंतरों में चले आ रहे भावों से उलट तस्वीर और भाव ले आते हैं और श्रोता की ओर पहेली सी उछाल देते हैं कि बूझो तो जाने! इस अंतिम अंतरे का रहस्य पूर्णतया तो इस गीत को फिल्म में देखने के बाद ही खुल पायेगा।

भूपेन्द्र या सुरेश वाडकर की गायिकी की रेंज और शैली के तहत आने वाले गीत को विशाल भारद्वाज ने अपनी गायिकी से बखूबी संवारा है। और यह रोमांटिक गीत प्रेम के मखमली स्पर्श से श्रोता को गुदगुदा जाता है और उसे शब्दों के पीछे छिपी दृष्यात्मक कल्पनाओं में घिरा हुआ छोड़ जाता है।

आवारा’ गीत में गुलज़ार साब ने डाल से टूटे सूखे पत्ते और मनुष्य के जीवन को तुलनात्मक दर्शन से परिभाषित किया है। यह गीत गुलज़ार साब द्वारा ही लिखे ’नो स्मोकिंग’ के गीत ’कश लगा ज़िंदगी के कश लगा’ की श्रेणी में आता है। बहुत पीछे चलें तो ’गाइड’ के ’वहाँ कौन है तेरा मुसाफिर जायेगा कहाँ’ जैसे गीतों की एक अलग श्रेणी बन चुकी है और वर्तमान दौर में गुलज़ार साब ने इस क्षेत्र में ऐसा मोर्चा सम्भाला है कि अन्य कवि उनके ईर्द-गिर्द कहीं भी नज़र नहीं आते।

आवारा आवारा
हवा पे रखे सूखे पत्ते आवारा
पाँव जमीं पे लगते ही उड़ लेते हैं दुबारा
ना शाख जुड़े ना जड़ पकड़े
मौसम मौसम बंजारा

कमजोरी से डाल से जुड़े सूखे पत्ते जमीं पर गिरते ही हवा के साथ उड़ तो जाते हैं पर न तो वे वापस डाल पर ही लग सकते हैं और न ही जमीं के अंदर अपनी जड़ें जमा सकते हैं। अब उनका प्रारब्ध सिर्फ हवा के संग इधर-उधर डोलना ही है। अब उनका कोई भी सम्बंध पेड़ के साथ नहीं है अब इसकी डालें इसकी सुरक्षा नहीं कर सकतीं। गिरे पत्ते पूरी तरह से मौसम की प्रकृति पर निर्भर हैं। बरसात होगी तो वे जमीं पर पड़े भीगेंगे। तेज धूप की बिलबिलाहट उनके पहले से सूखे शरीर को और जीर्ण-शीर्ण बना जायेगी।

झोंका झोंका ये हवा
रोज़ उड़ाये रे
जाकी डार गयी वो तो बीत गया
जाकी माटी गयी वो तो मीत गया
कोई न बुलाये रे
रुत रंग लिये आई भी गई
मुटिया ना खुली बेरंग रही
सूखा पत्ता बंजारा

डाल से गिरकर पत्ता बीती बात बन जाता है और मौत के बाद मनुष्य की सिर्फ यादें रह जाती हैं। अब न वे वापस आ सकते हैं और न ही कोई उन्हे बुलाता है।

सूखे पत्ते के लिये बसंत ऋतु भी किसी काम की नहीं है। पेड़ों पर छटा बिखरेगी पर जमीं पर पड़े सूखे पत्ते को बेरंग ही रह जाना होता है। जीवन में पतझड़ के आने के बाद मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही है। दूसरों के जीवन में आये बसंत से अब उसके जीवन में रंग भरने वाले नहीं।

हौले हौले ये हवा
खेल खिलाये रे
खोले धूप कभी घोले छाँव कभी
कभी पंख बने बने पाँव कभी
धूल दिखाये रे
कोई थाह ना मिली ना हवा ना जमीं
ना उम्मीद उगी ना दिलासा कहीं
उड़ता जाये बेचारा
आवारा आवारा आवारा

हवा पत्तों के संग खेल खेलती है। कभी उन्हे धूप की तेजी में ले जाती है और कभी छाँव की शीतलता में। कभी उन्हे उड़ा ले जाती हौर कभी अपने मंद मंद बहाव से उन्हे धरती की सतह पर ही सरकाती चलती है। कभी धूल में लपेट देती है उन्हे पर पत्तों क रिश्ता न हवा से बनना है और न ही जमीं से। कोई भी हरकत उनके लिये अच्छे बदलाव की उम्मीद नहीं दिला सकती। अब तो उनका जीवन बंजारा सरीखा है। वे अब दूसरों पर निर्भर हैं।

मनुष्य के जीवन दर्शन को बड़ी खूबसूरती से गुलज़ार साब ने पत्ते के जीवन से जोड़ा है। मास्टर सलीम ने आवाज के सही उतार चढ़ाव के साथ गाकर गीत के बोलों और उनमें छिपे भावों को व्यक्त्त किया है। उनकी गायिकी में ताजगी महसूस होती है।

तेरे लिये तेरे लिये’ – सुरेश वाडकर ने अपनी धीमी, मुलायम आवाज में गुलज़ार साब के शब्दों के जरिये प्रेमगीत अनूठे अंदाज़ में गाया है। प्रेम अनमोल है और इस बात को बार बार प्रेमी दर्शाता है। व्यापार की बात तो प्रेमी कर रहा है पर यहाँ व्यापार वह शेर, खुशबू, तारों, और अहसासों जैसी वस्तुओं का कर रहा है और जिनके सौदे कतई नहीं किये जा सकते।

तेरे लिये तेरे लिये
लफ़्ज़ों में लम्हों की डोलियाँ लाये हैं
शेरों में खुशबू की बोलियाँ लाये हैं
हमने सौ सौदे किये तेरे लिये तेरे लिये

आँखों में ना चुभे तारों की किरचियाँ
शीशे का आस्मां लाये हैं तेरे लिये
तारे जड़े हीरों से भी कितने बड़े
हमने आसमानों में लाखों के सौदे किये
तेरे लिये तेरे लिये

हल्की सी सर्दियाँ और साँस गरम हो
शामों की शॉल भी थोड़ी सी नर्म हो
तेरे लिये किशमिश चुने, पिस्ते चुने तेरे लिये
हमने तो परिंदों से बागों के सौदे किये
तेरे लिये तेरे लिये

जहाँ गुलज़ार साब के शब्द कल्पना में ऊँची से ऊँची छलाँग लगाते हैं वहीं वाद्य-यंत्रों के धीमे स्वर भी गीत को स्वप्निल असर देते हैं।

नो स्मोकिंग’ के गीत ’ जब भी ये सिगरेट जलती है मैं जलता हूँ ’ की श्रेणी वाला गीत ’ईशू ईशू’ अस्तित्ववाद की ओर झुकाव दिखाता है। गुलज़ार साब प्रार्थना में शिकायतनुमा प्रश्नों के मिश्रण से इंसान और तथाकथित ईश्वर के मध्य रिश्ते और इंसान के अस्तित्व के बारे में कुछ बुनियादी बातें उठाते हैं और गीत की प्रकृति के साथ रेखा भारद्वाज की गायिकी पूरा पूरा न्याय करती हुयी गीत को एक श्रेष्ठ गीत बना देती है।

ईशू…
गिरजे का गजर सुनते हो ईशू
फिर भी तुम चुप रहते हो ईशू
अपने चाहने वालों को तुम कैसे चुनते हो
ईशू

क्या जिस्म ये बेमानी है
क्या रुह गरीब होती है
तुम प्यार ही प्यार हो लेकिन
क्या प्यार सलीब होती है
रुह की तरह इस जिस्म को तुम
किस लिये बुनते हो ईशू

कोई नहीं इस वक्त्त यहाँ
इस वक्त्त मुझे अपनाना
आगोश में अपनी ले लो
फिर चाहे जहाँ ले जाना
उस पार तो कोई दर्द नहीं
बोलो ना सुनते हो ईशू

रेखा भारद्वाज की आवाज मुखरता से शब्द उच्चारती है और वाद्य यंत्रों के धीमे स्वर पार्श्व से गायन को सहारा देते हैं और मौके पर गायन के उच्च स्वर में शरण लेने पर कोरस गायक भी माहौल उत्पन्न करने आ जाते हैं और वाद्य-यंत्र भी ताकत लगाकर ध्वनियाँ फैलाने लगते हैं।

रशियन लोक गीत से प्रेरित ’दूसरी डार्लिंग’ गीत भी उतना ही मन मोहता है जितना ’डार्लिंग’ गीत। जहाँ ’डार्लिंग’ में शब्दों को खींचकर ’डार.र.र र्लिंग’ बोलने का जिम्मा ऊषा उत्थुप के पास था यहाँ ’दूसरी डार्लिंग’ में रेखा भारद्वाज भी इस शरारत भरी मस्ती में शामिल हो जाती हैं।

दो फास्ट ट्रैक गीत ’ ओ मामा ’ (गायक –के.के और क्लिंटन सेरेजो) और ’ दिल दिल है ’ (गायक –सूरज जगन) बोनस की तरह हैं और ’पाँच’ के बाद विशाल भारद्वाज ने हिन्दी में रॉक रचने का प्रयास फिर से किया है। यहाँ गुलज़ार साब के शब्द गीतों को नयी ऊँचाइयाँ देते हैं। ’ ओ मामा ’ का धीमा संस्करण भी के.के. ने ही मनमोहक अंदाज में गाया है।

विशाल भारद्वाज जब संगीत देते हैं तो किसी एक ही गायक को पकड़ कर नहीं बैठ जाते और जो उन्हे किसी गीत के लिये उपयुक्त्त गायक लगता है उसी से गीत गवाते हैं और इस तरह अपने रचे गीतों में एक ताजगी बनाये रखने में सफल रहते हैं। दूसरा कोई संगीत निर्देशक होता तो वह ’दिल तो बच्चा है जी’ के बाद “आवारा” गीत को भी राहत फतेह अली खान से गवाने की पूरी कोशिश करता पर विशाल, मास्टर सलीम से गीत गवाकर गीत को एक नयापन देते हैं। नयेपन को तवज्जो देने के लिये ही सुखविंदर की आवाज इस फिल्म के गीतों के लिये नहीं ली गयी है। राहत और सुखविंदर दोनों ही बहुत सारी फिल्मों में गीत गा रहे हैं और उनसे यहाँ भी गीत गवाना गीतों को अपेक्षित श्रेणी में डालने जैसा होता। विशाल ने गीतों को नयेपन की धार देकर अच्छा निर्णय लिया है।

विशाल भारद्वाज ने 7 खून माफ में भी ऐसा अच्छा संगीत दिया है जो लोगों को लम्बे समय तक जब तब याद आता ही रहेगा।

…[राकेश]

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