विस्मृतियों की छांह न होती तो जीना दूभर हो जाता कौन किसे जीता है हरदम याद भी होती जाती कम-कम जीवन पल-पल बदला करता स्थायी कब रहा है मौसम भूलना मुश्किल होता तो मरना भी दुष्कर हो जाता विस्मृतियों की... Continue Reading →
तुमने कभी देखा ओस की बूंद को फूल पे? एक छोटी सी बूँद … बहुत नाज़ुक लेकिन कितनी जीवंत! सारे रंग अपने में समेटे, फूल के आगोश में लिपटी ‘बूँद’ रात भर सपना देखती है… सुबह का, सुबह के ताजगी... Continue Reading →
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