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#RavindraNathTagore

सहज विश्राम – ओशो + टैगोर

हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलतेअब ठहर जाएँ कहीं शाम के ढलते ढलते (~इक़बाल अज़ीम) आधुनिक युग में जीवन की आपाधापी इतनी ज्यादा बढ़ चुकी है कि मेट्रो या बड़े नगरों की बात नहीं वरन छोटे शहरों, कस्बों... Continue Reading →

चल अकेला, चल अकेला … मुकेश

जोड़ी तोर डाक शुने केऊ ना एशे तोबे एकला चोलो रे। तोबे एकला चोलो, एकला चोलो, एकला चोलो, एकला चोलो रे। (रविन्द्रनाथ टैगोर) चल अकेला, चल अकेला, चल अकेलातेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला हज़ारों मील लम्बे रास्ते तुझको... Continue Reading →

निष्फल कुछ नहीं – (टैगोर)

भारत के गौरव गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर, एक मानवतावादी, प्रकृतिविद, कवि, चित्रकार, संगीतकार, लेखक, शिक्षाविद, और भारतीय संस्कृति एवम कला के ध्वजवाहक रहे हैं, वे देशों की सीमाओं को पार कर गये हैं और पिछले सौ सालों से भी ज्यादा समय से... Continue Reading →

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