कोई साथ नहीं जाता है ! साथ जियेंगे साथ मरेंगे झूठा एक दिलासा है नश्वरता के शिलालेख की शाश्वत अनगढ़ भाषा है वापस लौट कौन आता है ! पलक झपकते भूली दुनिया रीति यही तो उसकी है पल भर रुककर... Continue Reading →
विस्मृतियों की छांह न होती तो जीना दूभर हो जाता कौन किसे जीता है हरदम याद भी होती जाती कम-कम जीवन पल-पल बदला करता स्थायी कब रहा है मौसम भूलना मुश्किल होता तो मरना भी दुष्कर हो जाता विस्मृतियों की... Continue Reading →
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