थल थल में बसता है शिव ही
भेद ना कर क्या हिंदू-मुसलमां
ज्ञानी है तो स्वयं को जान
वही है साहिब से पहचान  [संत ललद्यद (1320-1392) कश्मीरी शैव भक्ति की संत कवियित्री]


फ़िल्म –शिकारा, में तीस साल बाद अपने गाँव वापिस जाने वाले शिव कुमार धर (Aadil Khan) को देखने उसके गाँव के पांच छः साल के बच्चे (जो जाहिर है मुस्लिम ही होंगे) आते हैं तो कहते हैं – उन्होंने कभी कोई कश्मीरी पंडित नहीं देखा!

विनोद चोपड़ा ने कश्मीर की घटनाओं पर बस इसी अप्रत्यक्ष रूप से टिप्पणियाँ की हैं|

शिव और शान्ति (Sadia Khateeb) अपने विवाह के बाद कश्मीर में एक बेहद खूबसूरत घर बनवाते हैं, जिसका नाम शान्ति – शिकारा, रखती है| कश्मीर से उन्हें भगाए जाने के बाद उनका मुस्लिम दूध वाला हाजी उनके घर पर कब्जा कर लेता है और जिस घर के कोने कोने से सौंदर्य झरता रहता था, उसकी हालत देखने लायक होती है जब लगभग तीस साल बाद शिव और शान्ति अपने घर को देखने आते हैं| घर के बाहर टीन की बदसूरत चादरों की कतार देख कर ही उनका दिल बैठ जाता है| विभिन्न रंगों से सजे उनके घर को हाजी ने गहरे हरे रंग से पुतवा दिया है| यहाँ तक कि फर्नीचर भी गहरे हरे रंग से पोत दिए गए हैं| घर में घुसते ही उन्हें दूध की ठेकियां कतार में रखी दिखाई देती हैं, चारों तरह सामान ठूसा गया है| जिस घर को देखकर दुनिया के किसी भी कोने का आदमी सराहना से भर जाता अब उसकी हालत देखकर उबकाई महसूस कर सकता है|

शिकारा बड़ी बारीकी से टिप्पणी कर जाती है कि विभिन्नताओं से भरे गुलशन में यदि एक ही किस्म मिलने लगे तो सौंदर्य और गुण बहुत पीछे चले जायेंगे, मानव का आगे का विकास ठप्प हो जाएगा| अनेकता भारत की विशिष्टता और पहचान है| यहाँ मुस्लिम और फिरंगियों के आने से पहले भी सनातन धर्म में विभिन्नताओं का भण्डार था|
 
विनोद चोपड़ा कश्मीर पर एक फ़िल्म थ्रिलर- मिशन कश्मीर, बना चुके थे जिसका बहुत बड़ा हिस्सा हॉलीवुड की फ़िल्म, The Devil’s Own (1997) से लिया गया था, और उससे भी पहले एक अन्य रोमांटिक कॉमेडी – करीब, भी बना चुके थे, अगर उन दोनों फिल्मों को कश्मीरियत से जोड़ कर देखें तो उनकी पुरानी दोनों फ़िल्में बॉलीवुड टाइप फ़िल्मी फ़िल्में थीं| उनकी तुलना में शिकारा– कश्मीर और कश्मीरियत को बहुत ज्यादा प्रतिनधित्व देती है|

शिकारा में जब तक फ़िल्म कश्मीर में सुखद दिनों को दिखाती है, बेहतरीन गीत-संगीत, पार्श्व संगीत, सिनेमेटोग्राफी और मजबूत तकनीकी पक्ष की सहायता से शिकारा, बेहद शानदार तरीके से वहां की खूबसूरती, संस्कृति और लोक संगीत का प्रदर्शन करके यह दर्शाने और स्थापित करने का प्रयत्न करती है कि बेहद खूबसूरत जगह ने आतंकवाद के कारण अपनी कितनी बड़ी पूंजी खो दी है| 

घाटी से भाग कर जा रहे लोगों से खचाखच भरी हुयी बसों, ट्रकों और कारों की भीड़ जब पटनी टॉप के एक मोड़ पर जाम में फंस जाती है तो एक ट्रक में अपने साथ गाय की बछिया साथ ले जा रहे एक व्यक्ति से दूसरा व्यक्ति कहता है कि इसे यहीं छोड़ दो कम से कम पेट भर कर घास तो मिलेगी इसे|

वाहनों की लम्बी कतार में एक बछिया घुमावदार सडक के किनारे कच्ची भूमि पर अकेली छोड़ दी जाती है| यह शायद कश्मीरी हिन्दुओं की सांस्कृतिक पहचान और भौतिक संपदा थी जिसे वहीं छोड़ कर लुटे पिटे अंदाज़ में अब उन्हें शरणार्थी कैम्पों में अभाव में अपने जीवन काटने हैं|
शिकारा चुभने वाला कोई सवाल नहीं खडा करती| शिव कुमार धर का बेहद नजदीकी अग्रज, दोस्त एवं गाइड नवीन (Priyanshu Chatterjee) उसकी आँखों के सामने आतंकवादियों द्वारा मारा जाता है| उसे अपनी पत्नी, और माता पिता को लेकर अपना जन्म स्थान, घर और सुखद भविष्य, छोड़कर शरणार्थी बन कर कैम्प में अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करना पड़ता है लेकिन वह न तो कटुता से भरता है आतंकवादी बनना तो दूर की बात है| वहीं उसका बचपन का दोस्त लतीफ़ (Zain Khan Durrani ) राजनीति में पैर पसार रहे अपने पिता के लाठीचार्ज होने से ज़ख़्मी होने के कारण मर जाने के कारण आतंकवादी बन जाता है| लतीफ़ एक उभरता हुआ क्रिकेटर था जिसके प्रदर्शन की ख़बरें अखबारों में छपती थीं| क्या इस एक घटना के बाद भी उसका भविष्य क्रिकेट में नहीं था? उसे आतंकवाद में ही क्यों मानसिक शान्ति मिली? जबकि पहले तो वह ऐसा था नहीं| पल भर में वह कैसे आतंकवादी बन गया? किसी प्रताड़ना के कारण आम आदमी राज्य तंत्र के विरुद्ध हो सकता है, बदले की भावना से भी भर सकता है लेकिन एकल व्यक्ति के लिए आतंकवादी बनना तब तक संभव नहीं जब तक कि राज्य तंत्र के समानार्थी एक ऐसा तंत्र कार्यरत न हो जो आतंकवादी तैयार करता है|


तीस साल बाद जब घायल लतीफ़ भारतीय सेना के अधिकारी के माध्यम से शिव को कश्मीर बुलवाता है तब शिव को तो उससे पूछना ही चाहिए था कि उसे पिछले तीस सालों के आतंकवाद से मिला क्या| अगर आतंकवाद न होता तो शायद लतीफ़ को कानूनी या राजनैतिक रूप से अपने पिता पर की गई सरकारी प्रताड़ना का बदला मिल जाता| पर आतंकवाद में सम्मिलित होकर उसने क्या किया? जिससे प्रेम करता था उसी आरती को मार डाला, बचपन के दोस्त शिव को परिवार सहित निर्वासित कर दिया| खुद सेना से मुठभेड़ में ज़ख़्मी होकर मर गया|
 
कश्मीर में अगर यह सियासत खेली गई कि हिंदू अल्पसंखयकों ने मुस्लिम बहुसंख्यकों के मुकाबले ज्यादा तरक्की कर ली, सब साधनों पर कब्जा कर लिया और मुस्लिम बहुसंख्यक गरीब रह गए तो १९९० में हिन्दुओं को बाहर खदेड़ देने के बाद कश्मीरी मुस्लिमों को न केवल धनी बन जाना था बल्कि कश्मीर को विकास और प्रगति के मार्ग पर चला कर भारत का सबसे ज्यादा धनी और विकसित राज्य बना देना था| कश्मीर में तो आज भी उतनी ही गरीबी है जबकि कश्मीर पर भारत के बजट का बहुत बड़ा हिस्सा खर्च होता है|
 
मोटे तौर पर ऐसा कहा जा सकता है कि पिछले दो हजार सालों में पहले एक हजार साल बौद्ध और हिंदू सभ्यताओं के वर्चस्व के काल में कश्मीर अपने नैसर्गिक सौन्दर्य, विभिन्न किस्म की कलाकारी और कारीगरी और ज्ञान-विज्ञान के वैश्विक प्रसिद्धि वाले विश्वविद्यालयों और अध्यात्म की उन्नति के लिए जाना जाता रहा| लगभग ११ वीं सदी से इस्लाम के आगमन और धीरे धीरे कश्मीर घाटी में इसके बढ़ते वर्चस्व के बाद भी कश्मीर अपनी विशिष्ट ख्याति को जीता रहा| कश्मीर की संस्कृति को शैव हिंदू, बौद्ध और भारतीय इस्लाम की सूफी परम्पराओं के मिश्रण वाली संस्कृति कहा जा सकता है| अंग्रेज पहले अफगानिस्तान और बाद में पाकिस्तान का निर्माण भारत को तोड़कर न करते तो कश्मीर के ऐसे हालात ना बनते जैसे पिछली सदी के अंतिम दशक में बना दिए गए| ऐसा क्या है और क्यों है कि हिंदुत्व/शैवत्व और बौद्ध धर्म ने तो इस्लाम को आराम से कश्मीर में जड़ें जमाने दीं, उसे इतना फलने फूलने दिया कि हिंदू और बौद्ध तो अल्पसंख्यक हो गए और मुस्लिम बहुसंख्यक बन गये लेकिन इस्लाम ने कश्मीरी हिन्दुओं को कश्मीर में उनकी जड़ों से उखाड़ फेंका? कश्मीर पर चर्चा हो, वहां की समस्या पर कुछ बने तो तार्किक प्रश्न तो उठने चाहियें| वहां अंतर्विश्लेषण तो मुस्लिमों को करना है जिनके रहते या जिनके कारण घाटी से हिन्दुओं का सफाया हो गया|

भारत विभाजन में दंगों की त्रासदी के बाद कश्मीर से हिन्दुओं को भगाए जाने की घटना सबसे बड़ी त्रासदी है| पिछले ३०-३१ सालों से ऐसा तर्क नहीं मिल पाया जिससे कश्मीर घाटी से चुनकर हिन्दुओं को भगाए जाने की भयानक घटना को न्यायोचित ठहराया जा सके| ऐसा भी तर्क मिलना मुश्किल है कि भारत देश में ऐसा हो कैसे सकता है? भारत में अन्यत्र कहाँ ऐसा मुमकिन है कि किसी एक सम्प्रदाय विशेष, भले ही उनकी संख्या वहां कुछ भी हो, को किसी राज्य से खदेड़ दया जाए और राज्य का सरकारी तंत्र और देश का केन्द्रीय तंत्र कुछ कर ही ना पाए| एक मौत पर देश मे बवाल काटने वाले शक्तिशाली लोग यहाँ रहते हैं लेकिन कश्मीर के सवाल का न कोई उत्तर आया है और न कोई समाधान!
कश्मीर की समस्या जटिल और बड़ी है| उसमें नरम उपदेश काम नहीं करते| जिन हिन्दुओं ने पिछले ३०-३१ साल कश्मीर से बाहर देश में बसे शरणार्थी कैम्पों में बिताए हैं, उन्हें सहिष्णुता आदि के भाषण भयानक उबाऊ लगते होंगे| ऐसा तर्क कि यदि किसी राज्य से पांच मुस्लिम भी कश्मीरी हिन्दुओं की तरह भगा दिए जाते तो देश भर में हंगामा हो जाता, देने वालों की बात की कोई तार्किक काट नहीं है क्योंकि ऐसा होता भी आया है| कश्मीर के ऐसे विकट राजनैतिक एवं सामाजिक माहौल में अगर विधु विनोद चोपड़ा कश्मीर पर एक ऐसी फ़िल्म लेकर आयेंगे जिसमें पीड़ितों के दुःख पर तो थोड़ा बहुत प्रकाश डाला गया हो लेकिन गलत को गलत कहने का कोई स्पष्ट प्रयास ना किया गया हो तो दर्शकों का बहुत बड़ा तबका फ़िल्म-शिकारा से असंतुष्ट ही रहेगा| फ़िल्म में बड़े नरम और अस्पष्ट तरीके से गलत को गलत कहा गया है|
विनोद चोपड़ा ने यह दिखाने का प्रयास तो किया कि कश्मीरी हिन्दू अपने ही देश में शरणार्थी बन गए पर उनके साथ ऐसा क्यों हुआ इसे दिखाने से वे बचकर कर निकल गए| उन्होंने एक आदर्श स्थिति लेकर इस फ़िल्म के मॉडल की रचना की है, अब यह वास्तविकता का कितना प्रतिनिधित्व करता है यह विचारणीय मुद्दा कश्मीरी हिन्दुओं के लिए रहेगा ही|

वे एक त्रासद परिदृश्य में ऐसे कथानक की कल्पना करते हैं और दिखाते हैं कि ऐसा होना चाहिए था| अगर हिन्दुओं पर घाटी में अत्याचार हुए भी तो वे इतने अप्रत्यक्ष और सूक्ष्म ढंग से परिवर्तनों को दिखाते हैं कि आम दर्शक असंतुष्ट रह ही जाएगा|

वे दिखाते हैं कि १९९० से पहले यह एक आम बात थी कि कश्मीरी मुस्लिम युवक लतीफ़  अपने गहरे दोस्त शिव कुमार धर की प्रेमिका/पत्नी शान्ति धर की हिंदू सहेली आरती (Bhavana Chauhan) से आसानी से विवाह कर सकता है और अगर माहौल हिन्दू-मुस्लिम विवाहों के सम्बन्ध में भी इतना ही भाईचारे वाला होता तो फिर पाकिस्तान प्रायोजित चंद आतंकवादी कश्मीर में ऐसा माहौल नहीं रच सकते थे कि 6 लाख की आबादी वाले कश्मीरी हिन्दू १९ जनवरी १९९० के बाद कश्मीर में दिखाई ही न दें| लाखों हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे को जीने वाले मुस्लिम चंद आतंकवादियों को इतनी बड़े सामाजिक परिवर्तन के लिए रोक नहीं पाए?

आतंकवाद, धार्मिक भेदभाव/नापसंदगी के आधार पर जबरन पलायन करने को विवश हुए शिव और शान्ति विवाह के कुछ समय पश्चात से अपने ही देश में शरणार्थी बन कर कैम्पों में कठिनाइयों में रहकर अपने जीवन होम कर देते हैं| वहीं शिव के माता-पिता का देहांत भी हो जाता है| शायद कैम्पों में रहने के कारण ही उन्हें संतान प्राप्ति भी नहीं होती| शान्ति और शान्ति का आपस में प्रेम और परस्पर सम्मान की भावना देखने लायक हैं| किसी भी विकत परिस्थिति में शान्ति बस पल भर के लिए विचलित होती है| कश्मीर के जिस घर में उसकी आत्मा बसी है, अपने इलाज के लिए उसे शिव द्वारा बेचे जाने की बात सुनकर वह टूट जाती है लेकिन अपने विचलन को संभाल कर कहती है- जहां शिव है वहीं उसका घर है|  
 
जितनी बड़ी त्रासदी कश्मीरी हिन्दुओं ने पिछले तीस सालों में झेली है उसे देखते हुए शिकारा उनके लिए दवा का काम नहीं कर पायेगी बल्कि उनके घाव को कुरेदेगी ही| दशकों बाद अगर कश्मीर में हालात ठीक हुए और कश्मीरी हिन्दुओं का घाटी में पुनर्वास हो गया तो आने वाली पीढियां ही इस फ़िल्म को सही परिपेक्ष्य में देख पाएंगी| अभी तो यह अपनी तमाम खूबियों के बावजूद यह सटीक राजनैतिक एवं सामाजिक टिप्पणी न कर पाने के बोझ तले दबी एक ऐसी फ़िल्म बन कर रह गई है जो एक बेहद दुखद प्रेम कथा दिखाती है|

विनोद चोपड़ा ने जब 1942 A Love Story बनाई थी और अखबारों में उनका एक बयान छपा था जिसके अनुसार उन्कहोंने दावा किया था,”I am best filmmaker in India” तब किसी पत्रकार द्वारा फ़िल्म के बारे में पूछने पर भाजपा नेता अटल बिहारी बाजपेई ने कहा था स्वतंत्रता आन्दोलन के समय किसे प्रेम की फुर्सत थी| युद्ध जैसे हालात में प्रेम कहानी रचने का आकर्षण विनोद चोपड़ा का पुराना है| उसी आकर्षण और दक्षता के वशीभूत होकर उन्होंने कश्मीर आतंकवाद के दौर में एक प्रेमकहानी- शिकारा को रचा|

विनोद चोपड़ा कश्मीरी हैं सो इस जटिल विषय को न्यायसंगत ढंग से सिनेमा में ढालने के लिए उन्हें वेब सीरीज बनाने का सोचना चाहिए जिससे 9-10 घंटों के कार्यक्रम में कश्मीर समस्या का सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ शेष भारत और दुनिया के सामने आ सके|