सुबह के दस बजने में चंद सेकेंड्स बाकी हैं, जब अपनी कुर्सी पर विराजमान और कार्य में डूबे कलेक्टर हेमेन्द्र प्रताप का मोबाइल बजने लगता है| हेमेन्द्र अपने लैपटॉप पर कार्य करते रहते हैं और तीन चार बार बजने के बाद ही मोबाइल की तरफ निगाह उठाकर कॉल लेते हैं और मोबाइल को स्पीकर पर करते हुए कहते हैं
- बोलिए मैडम, कैसे सुबह ही बन्दे को याद कर लिया, अभी तो दो घंटे ही हुए हैं … हमसे दूरी सहन नहीं होती आपसे
- अरे तुमसे जल्दी नहीं लिया जाता फोन?
- जल्दी तो उठा लिया, अब क्या लाईट की स्पीड से काम करने लगूं?
- एप्पल खा लिया या एप्पल पर आँखें दुखा रहे हो?
- अरे देखता ही रहूँगा क्या एप्पल को, एप्पल खाए 1 घंटा हो गया| उसके बाद तो वो तुम्हारा स्पेशल हर्बल पेय भी पी लिया|
- कलेक्टर साहब, एक एप्पल खाने वाला है तो एक आपका एप्पल लैपटॉप भी है न, जो आपकी आँखों का दुश्मन है जिस पर सारे दिन आँखें गडाए रहते हो|
- ओह्ह हाँ, अरे काम तो करना ही पड़ेगा न| तुम्हे बताया तो था मंत्री जी के सामने प्रेजेंटेशन है आज| उसी की तैयारी चल रही है|
- ओके सुनो|
- सुनाओ, क्यों फोन किया था?
- मामा जी अपने दोस्त के बेटे की शादी में जाने को बोल रहे हैं, पर बुखार तो उनका उतरा नहीं है अभी तक| कह रहे हैं बचपन का दोस्त है, उसके बेटे की शादी में नहीं गया तो ठीक नहीं लगेगा|
- शाम ही तो मैंने उन्हें समझाया था ना कि शादी को रहने देते हैं हफ्ते भर बाद ही तो रिस्पेशन है उसमें चलेंगे, मैं साथ चलूँगा|
- आज कह रहे हैं दिल नहीं मान रहा| जाना तो पडेगा|
- ये मीटिंग का चक्कर फंस गया नहीं तो मैं ले ही जाता|
- क्या करें फिर? एक तो बीमार हैं, ऊपर से दोस्त के कारण उनका मुंह और ज्यादा लटक गया है| कह रहे हैं बीमारी भी अभी ही आनी थी| हर मुलाक़ात में बेटे की शादी में आने का वादा लेकर जाता है अमरजीत|
- अरे बड़ी पक्की यारी है दोनों में| अमरजीत मामा को मैंने बड़ी मुश्किल से समझाया फोन पर कि मैं क्यों शादी में नहीं पहुँच सकता| रिसेप्शन पर पहुँचने का वादा लेकर ही बात संभाली|
- अब क्या करें ये बताओ?
- तुम एक काम करो, माँ और मामा जी को लेकर तुम चली जाओ| मैं ड्राइवर भेज देता हूँ| दो-ढाई घंटे का ही रास्ता है| दुपहर बाद चार बजे निकलोगे तो हर हालत में 7 बजे से पहले ही पहुँच जाओगे| कुछ देर आराम कर लेंगे मामा जी| शादी में हर वक्त मामा जी के पास ही रहना| उनकी दवाई वगैरह रख लेना याद से| कुछ भी दिक्कत हो मुझे तुरंत मेसेज करना| कॉल मत करना|
- चलो ठीक है आज तुम्हारी श्रवण कुमार की ड्यूटी मैं निभा लेती हूँ|
- हे देवी, आपका ये एहसान मैं जीवन भर नहीं भूलूंगा|
- चलो काम करो अब, फालतू लफ्फाजी न करो| हम नागरिक लोग टैक्स देते हैं तो तुम्हें सेलेरी मिलती है, यूँ घंटो तक घर वालों से फोन पर बात करने के पैसे नहीं मिलते हैं| काम करो, देश का विकास करो|
- जी मैडम| कल सुबह दर्शन होते हैं फिर आपके| (हंसता है)
- ओके कलेक्टर साहब, सी यू टूमारो मोर्निंग| लव यू बाय!
हेमेन्द्र प्रताप कुर्सी से उठते हैं, हाथों को सर से ऊपर उठाकर अपने कसरती शरीर को ऊपर की खींचते हैं, फिर ऊपरी शरीर को दायें बाएं घुमाते हैं और वाशरूम चले जाते हैं| वाशरूम से वापिस आते ही उनके कक्ष का दरवाजा खटखटा कर उनका अर्दली सुखबीर अन्दर आकर एक विजिटिंग कार्ड उनकी डेस्क पर रख देता है|
साहब, कोई सज्जन हैं, बुजुर्ग हैं, कहते हैं इंग्लैंड से आये हैं और आपसे अर्जेंट मिलना चाहते हैं।
हेमेन्द्र प्रताप विज़िटिंग कार्ड उठाकर देखते हैं| विज़िटिंग कार्ड पर एक नाम अंग्रेजी में सुनहरे अक्षरों में छपा था।– Virenedra Pratap Singh
- काम नहीं बताया? आज तो बिलकुल फुर्सत नहीं है|
अर्दली ने पूछा,” साहब क्या कहूँ फिर उनसे? वापिस भेज दूं?”
” अच्छा भेज दो अन्दर, पर कह देना पंद्रह मिनट से ज्यादा वक्त्त नहीं है मेरे पास और ड्राइवर को बोलो कि गाड़ी तैयार रखे, बीस-पच्चीस मिनट में निकलना है मंत्रालय में मीटिंग के लिये”।
अर्दली बाहर जाता है| हेमेन्द्र अपने लैपटॉप पर कार्य करने लगते हैं|
धीरे- धीरे बंद होते जाते दरवाजे से अर्दली की आवाज सुनाई देती है|
” आप साहब से मिल सकते हैं| पर साहब को बाहर जाना है, सो समय का ध्यान रखें| केवल पंद्रह मिनट हो पायेंगे |”
दरवाजा खटखटा कर अर्दली आगंतुक को कक्ष के अन्दर भेज देता है| हेमेन्द्र प्रताप एक नज़र आगंतुक को देखते हैं|
आइये बैठिये। बस एक मिनट दीजिये मुझे| ज़रा ये सेव कर लूँ|
वे अपने लैपटॉप के कीबोर्ड पर तेजी से अपनी उंगलियाँ चलाते हैं|
आगंतुक कमरे का मुआयना करते हैं| इधर उधर देखने के बाद उनकी निगाहें हेमेन्द्र प्रताप की डेस्क पर रखे एक फोटो फ्रेम पर पड़ती है जिसमें दो फोटो लगे हुए हैं| एक बुजुर्ग दिखाई देती महिला की और दूसरी एक बुजुर्ग पुरुष की|
हेमेन्द्र प्रताप लैपटॉप का स्क्रीन नीचे करके पूछते हैं,” जी, कहिये|
माइसेल्फ वी पी सिंह| (शब्द हकलाहट भरे अंदाज़ में निकलते हैं और ऐसा लगता है मानो बोलने में कठिनाई हो रही है| आगंतुक के होंठ लरज़ कर रह जाते हैं)
,” ओ के, कहिये क्या काम है आपको मुझसे। मुझे थोड़ी देर में ही मंत्रालय के लिए निकलना है तो आप अपनी बात ज़रा ज़ल्दी से कहिये|
मैं यहाँ…| दरअसल मैं लंदन में रहता हूँ। कुछ साल पहले यहाँ ज़मीन खरीदी थी। सोचा था कि एक फाइव स्टार रिसोर्ट बनाऊँगा , पर अब नये पर्यावरण कानून के कारण अनुमति नहीं मिल पा रही है।
इसमें मैं क्या कर सकता हूँ? क़ानून का पालन तो सभी को करना ही पड़ता है|
धीमी आवाज में आगंतुक – तुम… आपने शायद मुझे पहचाना नहीं होगा… बहुत छोटे थे आप …जब…।
जी नहीं मैंने आपको पहचाना नहीं, पर ऐसा लग जरुर रहा है कि आपको कहीं देखा है। खैर आप बताइये, मैं इसमें आपकी कैसे सहायता कर सकता हूँ?
बे..टा तु..म… मुझे पहचाना नहीं रहे हो … मैं वीरेन्द्र प्रताप हूँ… आपका पिता…मैं तो बहुत साल बाद भारत आया हूँ आकर एक परिचित से पता चला कि आप आई.ए.एस बन गये हो.. तो अपने को रोक नहीं पाया… मिलने से।
हेमेन्द्र के चेहरे पर हैरत भरे भाव आ गये। वे ध्यान से सामने बैठे व्यक्ति के चेहरे को देखते हैं|
हेमेन्द्र के चेहरे पर भाव आ जा रहे हैं| कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन कुछ है जिसके कारण अपने को नियंत्रित करते हुए दृढ़ता से कहते हैं, ” पिता! पर मेरे पिता तो हैं नहीं। मैंने तो जब से होश संभाला है किसी पिता को अपने पास नहीं देखा”।
काँपती आवाज में – “बेटा ऐसा मत कहो… मैं मानता हूँ मुझसे गलती हुयी थी जो मैं मनोरमा…तुम्हारी माँ और तुम्हें तब छोड़कर विदेश चला गया था जब तुम केवल डेढ़ साल के थे। जाने क्या धुन थी विदेश जाने और धन कमाने की कि…. वहाँ जाकर कभी सुध भी नहीं ली मनोरमा और तुम्हारी”
हेमेन्द्र ने पहले से भी ज्यादा दृढ़ता से कहा,” मैंने आपसे कहा न कि मेरा कोई पिता नहीं है। मैंने तो पिछले 33-34 सालों में कभी किसी पिता नाम के जीव का अस्तित्व अपने जीवन में पाया नहीं, और न ही मुझे आवश्यकता हुयी ऐसे मनुष्य की जिसे पिता कहना पड़े| बचपन से ही मेरे मामा ने मेरा लालन-पालन किया है। मैं और मेरी माँ मेरे बचपन से ही मेरे मामा के ही घर रहे हैं।”
बेटा, मैं अपराधी हूँ मनोरमा, तुम्हारा और कुलदीप का। मैं तुम सबसे माफी माँगने को तैयार हूँ।”
माफी? किस बात की? मुझसे किस बात की माफी?
मैंने तुम्हे और तुम्हारी माँ को बेसहारा छोड़ दिया था।
माँ की बात तो माँ ही जाने, पर मैंने जब से होश संभाला है मैं तो कभी बेसहारा नहीं रहा। मेरे मामा और माँ की छत्रछाया सदा मेरे ऊपर रही। मुझे तो किसी बात की, किसी भी रिश्ते की कमी कभी महसूस हुयी नहीं।
बेटा मुझे ऐसे ठुकराओ मत। मैं मनोरमा से माफी माँग लूँगा। तुम गुस्सा त्याग कर बीती बातें भूल जाओ और मेरी भूल को क्षमा कर दो।
गुस्सा! महोदय मैं बिलकुल भी गुस्से में नहीं हूँ। मैंने आपसे कहा न कि मेरा कोई पिता नहीं है और यह बात मैं क्रोधवश नहीं कह रहा। मेरा सच यही है। मेरा जब आपसे कोई नाता है ही नहीं तो मैं आपसे नाराज क्यों होऊँगा? मेरे लिये आप एक अजनबी हैं।
बाप-बेटे और पति-पत्नी के रिश्ते कैसे ऐसे नज़र-अंदाज किये जा सकते हैं?
देखिये बाप-बेटे के रिश्ते की बात तो मैं आपको स्पष्ट कर चुका हूँ। जहाँ तक मैं अपनी माँ को जानता हूँ उन्होंने कभी मुझे ऐसा नहीं दर्शाया कि वे अपने पति की अनुपस्थिति के कारण दुखी रही हैं। मेरे इर्द-गिर्द ही उनका जीवन घूमता रहा है। ऐसा तो है नहीं कि विदेश में आप दूसरा विवाह किये बिना रहे होंगे। आपमें इतना विश्वास और साहस हो कि आप मेरी माँ की आँखों में देखकर बात कर सकें तो जायें। मैं बिल्कुल आप दोनों की बात के बीच में नहीं पड़ूँगा। आप बेहिचक प्रयास कर सकते हैं मेरी माँ से मिलने का। मुझे लगता नहीं कि आप उनके लिये जीवित भी रहे होंगे अभी तक।
ऐसा मत कहो। एक बार मुझे अपने पिता के रुप में स्वीकार कर लो, मैं वापिस चला जाऊँगा।
नरेंद्र ने गम्भीर किंतु मृदु लहज़े में कहना प्रारम्भ किया।
“मैंने कहा ना कि मेरा कोई पिता नहीं है। मेरे जीवन में पिता का कोई स्थान नहीं है। आप हमारे जीवन से गये वह आपका कृत्य था और आप हमारे जीवन से गायब हो गये हैं यह हमारे जीवन का सत्य है।
हाँ बेटा मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गयी| पर भूल किससे नहीं होती| मनुष्य ही तो हैं हम सब| गलतियों की कठपुतलियाँ|
महाशय, आपकी गलतियों में हम कहाँ से आते हैं बीच में? आपने जो भी गलतियां कीं जीवन में उनके परिणामों को आप को स्वयं ही भुगतना है|
भूल को सुधारा जाना भी तो मानव का ही कर्तव्य है| मैंने तुम्हारे बचपन में तुमसे तुम्हारे पिता का साथ छीन लिया लेकिन अब मैं उस भूल का प्रायश्चित करने आ गया हूँ| तब मैं जीवन बना ही रहा था| धन नहीं था| आज मेरे पास दुनिया का हर सुख और सुविधा है|
प्रायश्चित आपको अपनी जिस भूल का करना हो आप करो| वह आपका काम है, उसका हमसे कोई संबंध नहीं| हमारे जीवन में क्यों सेंध लगाने आप आ गए हैं महोदय?
ऐसा मत बोलो बेटा| आखिर बाप बेटे का रिश्ता ऐसे कैसे किसी गलतफहमी के कारण समाप्त हो सकता है?
आपको बेटे की कमी महसूस होती रही होगी, वो समस्या है आपकी, ऐसा आपका सच होगा| मुझे कभी अपने पिता की कमी महसूस नहीं हुयी| यह मेरा सच है| पिता के सभी कर्तव्यों से भी कहीं ज्यादा कर्तव्यों को निभाते हुए मैंने अपने मामा को देखा है| मैंने बहुत लोगों के पिताओं को देखा है पर मेरे मामा से अच्छा पितृत्व दायित्वों को निभाने वाला इंसान देखने तो क्या, ऐसे के बारे में सुनने को भी नहीं मिला आज तक।
कहते तो तुम कुलदीप को मामा ही हो न| मामा मामा होता है और पिता फिर पिता ही है, कोई भी रिश्ता पिता का स्थान नहीं ले सकता|
पति द्वारा छोड़ दी गयी अपनी बहन और उसके डेढ़ साल के बेटे का भरण पोषण जिस आदमी के जीवन का ध्येय बना रहा है सालों से। इस तप में बाधा न पड़ जाये इस नाते उस आदमी ने अपना घर नहीं बसाया। ऐसे तपस्वी के सानिध्य में मुझे किस बात की कमी होनी थी? किस रिश्ते की कमी खलनी थी?
बेटा मैं अब बूढा हो चला हूँ| मेरा सब कुछ तुम्हारा ही है|
मेरा? आपके पास है ही क्या?
सब कुछ| लन्दन में इतनी प्रोपर्टी है, धन है, बहुत कुछ है बेटा| यहाँ भी है|
मेरी माँ को तो आप यही सब इकट्ठा करने के लिए छोड़ गए थे| मेरी माँ तो आज बहुत प्रसन्न है| और एक आप हैं यहाँ मेरे सामने गिड़गिड़ा रहे हैं| क्या है आपके पास| जिस धन-दौलत के लिए आप मेरी माँ को छोड़ गए थे उसके साथ खुशी से रहिये न| हमारे पास क्यों आने के लिए व्याकुल हो रहे हैं?
मैं तुम्हारी माँ से मिल कर क्षमा मांग लूंगा| कुलदीप भी मुझे माफ़ कर देगा| आखिर मैं उसकी बहन का सुहाग हूँ|
हेमेन्द्र प्रताप हँसते हुए कहते हैं – मामा तो बेचारे कोमल ह्रदय हैं| वे तो सब कुछ मुझ पर और माँ के ऊपर छोड़ देंगे| और माँ का मुझे निश्चित पता है कि उनके विचार मुझसे अलग नहीं हो सकते| अगर मैं उनसे बात न भी करूँ और आप उनसे मिल पायें बिना यह बताये कि आप मुझसे मिल चुके हैं, तो मुझे पक्का विश्वास है कि वह भी यही कहेगी जो मैं कह रहा हूँ| आपकी कोई जगह हमारे जीवन में न थी, न है और न ही कभी रहेगी|
तुम्हारा जन्म मुझसे हुआ है बेटा| तुम्हारे अन्दर मेरा खून दौड़ रहा है|
क्या ब्लड ग्रुप है आपका श्रीमान?
हड़बड़ाहट में जवाब देते हैं – A+
मेरा, मेरी माँ का और मेरे मामा का तीनों का ब्लड ग्रुप O+ है| बचपन में एक बार मेरा सीरियस एक्सीडेंट हुआ था, मेरी जान बचाने को मामा ने अपना खून दिया| तो खून का मामला सैटल!
बाप को कैसे ऐसे अपने जीवन से निकाल सकते हो? क्या स्कूल में बाप के नाम की जगह मेरा नाम नहीं लिखा?
जो बच्चे अपने बचपन में ही अपने पिता को खो देते हैं, वे भी मृत पिता का नाम पिता वाले कॉलम में लिखते हैं| मैंने भी उसी तरीके से आपके नाम का उपयोग भर किया है|
मैं तो जीवित हूँ बेटा|
हमारे लिए थे कभी, रहे?
कल जब मरुंगा तब पितृ ऋण भी तुम्हें चुकाना है, मेरा अंतिम संस्कार भी करना है|
पितृ ऋण? वो ऋण तो मुझे अपने मामा के प्रति चुकाना है| वैसे मेरी इतनी हैसियत नहीं कि उस तपस्वी के ऋणों से मुक्त हो सकूँ? कई जीवन लूंगा और लगातार ऋण चुकाता रहूंगा तब भी शायद कमी रह जाए| उनके सानिध्य में रहने से मुझे ऐसे संस्कार मिले हैं कि मैं उनकी तपस्या का अपमान न करुँ। सच बताऊँ अगर मुझे वास्तव में एक प्रतिशत भी जीवन में पिता की कमी खली होती तब भी इतना दुस्साहस तो मैं तब भी न करता कि मामा के स्नेह का अपमान करता और अब आपसे किसी भी किस्म का रिश्ता बनाता| और रही अंतिम संस्कार वाली बात, हमारे लिए इस बात के कोई मायने हैं ही नहीं|
पर बेटा| तुम अभी गुस्से में हो| मैं फिर आउंगा| तब शान्ति से बात करते हैं| तुम्हारा मोबाइल नंबर मिलेगा?
सुनिए मैं इस विषय में और कुछ कहना नहीं चाहता। हम अपने जीवन में पूर्ण रूप से संतुष्ट एवं सुखी हैं| आप भी अपने जीवन में रमे रहें। मेरे दफ्तर का नंबर आपको अर्दली से मिल जाएगा| व्यक्तिगत नंबर मैं अपने परिवार के सिवा किसी को नहीं देता|
एक नज़र वीरेन्द्र प्रताप के ऊपर डाल कर हेमेन्द्र अपनी कुर्सी से खड़े हो जाते हैं|
आज के बाद इस विषय पर जीवन में अब कोई बात नहीं हो पायेगी। आपके नाम का कोई भी अध्याय हमारे जीवन में है ही नहीं। अब मैं चलूँगा। मुझे आवश्यक काम से बाहर जाना है। नमस्कार!”
स्तब्ध खड़े वीरेन्द्र प्रताप सिंह को कक्ष में छोड़कर तन कर दृढ़ कदमों से चलते हुए हेमेन्द्र प्रताप बाहर निकल जाते हैं|
© …[राकेश]
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October 27, 2023 at 1:04 PM
badhiya short film ban jayegi is par to bhaiya. achcha twist hai. kahani badi asli lag rahi hai