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Cine Manthan

Cinema, Theatre, Music, Literature & Life

मेरी जिंदगी के दिन …

© कृष्ण बिहारी

नींद – रंजीत कपूर (नाट्य व फिल्म निर्देशक, लेखक)

प्रख्यात लेखक, नाट्य एवं फिल्म निर्देशक, व अवसरानुकूल अभिनेता श्री रंजीत कपूर की यह पहली प्रकाशित कहानी है जो अप्रैल 1969 में हिंदी की प्रसिद्द साहित्यिक पत्रिका सारिका में छपी थी| लेखक कमलेश्वर ने 1967 से तकरीबन 11 साल तक... Continue Reading →

गिरिजा कुमार माथुर : निराला प्रसंग

---------------------- लम्हों में ज़िन्दगी - 6 ----------------------- सेवानिवृत्ति के बाद माथुर साहब अधिक समय तक अशोकनगर आते रहे. एक बार बसंत पंचमी के दिन वह वही थे. उन्हें स्मरण हुआ कि बसंत पंचमी के दिन तो महाप्राण निराला का जन्मदिन... Continue Reading →

गिरिजा कुमार माथुर : “छाया मत छूना मन” – प्रसंग

----------------------- लम्हों में ज़िन्दगी - 4 ----------------------- एम.ए. हिंदी करतें समय मुझे गुना कॉलेज के प्रो कांति कुमार जैन का मेसेज मिला की दों दिन बाद मुझे हिंदी विषय का शोध निबंध (dissertation) - "गिरिजा कुमार माथुर का काव्य शिल्प"... Continue Reading →

गिरिजा कुमार माथुर : न्यू यॉर्क की पहली यात्रा

----------------------- लम्हों में ज़िन्दगी - 2 ----------------------- अशोकनगर के रेलवे स्टेशन की बेंच पर बैठे हुए गिरिजा कुमार माथुर साहब मुझसे अपने अतीत की स्मृतियों को साझा करने लगे| उन्होंने बताया कि पचास के दशक में वह न्यू यॉर्क में... Continue Reading →

गिरिजा कुमार माथुर : यादों का सरमाया (डॉ. गोपाल किशोर सक्सेना)

किसी दार्शनिक ने कहा है -- 'यह मत देखो कि ज़िन्दगी में कितने लम्हे हैं… यह देखो कि लम्हों में कितनी ज़िन्दगी है | पचास बरस पहले मुझे माथुर साहब से मिलने का सौभाग्य निरंतर मिलता रहा. और उन से... Continue Reading →

ओशो : नेताजी सुभाषचंद्र बोस और महात्मा गांधी

मुझे एक युवक याद आते हैं| उनका नाम सुभाष चंद्र बोस था। वे एक महान क्रांतिकारी बने और मेरे मन में उनके लिए बहुत सम्मान है, क्योंकि वे भारत में एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने महात्मा गांधी का विरोध किया; वे देख सकते थे... Continue Reading →

Osho : The day he left his body!

When Osho left his physical body on January 19, 1990, having lived for 58 years, 1 month, and 8 days, many might have thought this marked the end of a spiritual leader known for his playful nature. Some believed his... Continue Reading →

मीना कुमारी की दौड़ !

मधुलिका कुमारी थी, सुंदरी थी। कौशेय वसन उसके शरीर पर इधर-उधर लहराता हुआ स्वयं शोभित हो रहा था। वह कभी उसे संभालती और कभी अपनी रूखी अलकों को। कृषक बालिका के शुभ्र भाल पर श्रमकणों की भी कमी न थी,... Continue Reading →

Anupama(1966): एक स्त्री और एक पिता की मूर्तियों की गढ़न

अनागत : जाने गए निश्चित अंत का भय

मृत्य की दौड़ में है धरा पर हर चीज, हर भाव, जीवन में सभी कुछ अनिश्चित है निश्चित है बस एक मृत्यु | कल कल बहती नदियाँ भी सूख जायेंगीं स्थिर दिखाई देतीं चट्टानें रेत बन कर बह जायेंगीं नदियों... Continue Reading →

“उस रात की वर्षा में” : इच्छापूर्ति की शतरंज

हिन्दी की प्रसिद्द पत्रिका - निकट, का नया अंक (जनवरी - अप्रैल 2026) "आत्मकथात्मक प्रेम-कथा विशेषांक" है और इसमें सुप्रसिद्ध लेखक प्रियंवद की प्रेमकथा - उस रात की वर्षा में, को भी सम्मिलित किया गया है| प्रियंवद उन लेखकों में... Continue Reading →

Mrs.Deshpande : वह है कातिलाना !

ख़ुदा के वास्ते इस को न टोकोयही इक शहर में क़ातिल रहा है ~ मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ सर्वप्रथम तो मिसेज देशपांडे की सबसे बड़ी खासियत है कि इसने माधुरी दीक्षित जैसी समर्थ अभिनेत्री को ओटीटी के अखाड़े में ही नहीं... Continue Reading →

The Great Shamsuddin Family

लखनऊ के इतिहासकार योगेश प्रवीण ने लखनऊ का एक पुराना किस्सा सुनाया जो बेहद लोकप्रिय हो गया| ******** "1920 में लखनऊ में पहली बार म्यूनिसिपैलिटी के चुनाव हुए तो चौक के इलाक़े से कारपोरेटर के चुनाव के लिये लखनऊ की मशहूर... Continue Reading →

JwarBhata(1944): दलीप कुमार की पहली फ़िल्म की समीक्षा

प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक बाबूराव पटेल ने दलीप कुमार की पहली फिल्म ज्वार भाटा (1944) की समीक्षा में दलीप कुमार की बेरहमी से आलोचना की थी| Review Courtesy : Jhinjhar @ IMDB

और क्या अहद-ए-वफ़ा होते हैं (सनी 1984) : धर्मेन्द्र फैक्टर

और क्या अहद-ए-वफ़ा होते हैंलोग मिलते हैं, जुदा होते हैं कब बिछड़ जाए, हमसफ़र ही तो हैकब बदल जाए, एक नज़र ही तो हैजान-ओ-दिल जिसपे फ़िदा होते हैं और क्या अहद-ए-वफ़ा होते हैं जब रुला लेते हैं जी भर के... Continue Reading →

धर्मेन्द्र : परदे पर स्त्री तिरस्कार का सामना

...[राकेश]

Maharani 4 : रानी भारती की मूर्ति का भंजन !

...[राकेश]

Baramulla (2025): अगर रूहें न होतीं तो क्या बात होती!

इंदिरा गांधी की वसीयत

तुम्हारा इंतज़ार है तुम पुकार लो : Khamoshi(1969)

...[राकेश]

नूरानांग दिवस और बाबा जसवंत की अदृश्य पहरेदारी

Dharmendra : Sholay(1975) – सफलता के कारवां का सबसे कम भाग्यशाली अभिनेता

संजीव कुमार : अभिनय कला की बारीकी के उस्ताद

ज़हीन आप के दर पर सदाएँ देते रहेजो ना-समझ थे वो दर-दर सदाएँ देते रहे (~वरुन आनन्द) संजीव कुमार और गुलज़ार की शानदार सिनेमाई जोड़ी की अंतिम दो प्रस्तुतियों में से एक है "नमकीन"| नमकीन में एक गीत है -... Continue Reading →

Doctor G (2022) : पुरुष स्पर्श का घुल जाना

कौन बदन से आगे देखे औरत कोसब की आँखें गिरवी हैं इस नगरी में (~हमीदा शाहीन) पश्चिमी देशों में ऐसे बहुत सारे पुरुष डॉक्टर्स मिलेंगे जो स्त्री-रोग विशेषज्ञ हैं, प्रसूति विभाग के अध्यक्ष हैं, बल्कि अक्सर ही सबसे ज्यादा जाने... Continue Reading →

Sulakshana Pandit : चेहरा है या फूल खिला है!

हिंदी सिनेमा में तीन ऐसे खुशनुमा चेहरों वाली अभिनेत्रियाँ रही हैं जिनके चेहरों पर उदासी कभी भी फ़बी नहीं और उनके उदास चेहरे देख दर्शक भी बैचेनी महसूस करने लगते हैं कि ये स्त्रियाँ हंस क्यों नहीं रहीं? क्योंकि उनकी... Continue Reading →

Uff Ye Siyappa (2025) : संवाद रहित हंगामा

ओटीटी मंचों पर देखने लायक कोई हल्की फुल्की फिल्म खोजी जा रही हो या ऐसी कोई फिल्म एकाएक सामने आ जाए तो ऐसी फिल्मों के वर्ग में लेखक, निर्देशक और निर्माता लव रंजन का नाम अपनी विश्वसनीयता कायम कर चुका... Continue Reading →

Taj Mahal : Osho

ताजमहल अगर आपने देखा है तो यमुना के उस पार कुछ दीवारें आपको उठी हुई दिखाई पड़ी होंगी। कहानी यह है कि शाहजहां ने मुमताज के लिए तो ताजमहल बनवाया और अपने लिए, जैसा संगमरमर का ताजमहल है ऐसी अपनी... Continue Reading →

सरदार पटेल : हम पर हिंदुस्तान की जिम्मेदारी आई है (नवम्बर 1947)

नवम्बर 1947 में सरदार पटेल द्वारा भारतीय रियासतों के भारतीय संघ में विलय के विषय पर दिए भाषण के अंश

राम – रावण : ओशो

कोई राम हो सकता है या रावण, लेकिन दोनों के बीच कोई रास्ता नहीं है। हमारी परेशानी यह है कि हम अच्छी तरह जानते हैं कि हम राम नहीं हैं, लेकिन यह अहंकार को बहुत ठेस पहुँचाता है और मन... Continue Reading →

मीडिया ऋणात्मक क्यों ? (डा. ए.पी.जे अब्दुल कलाम)

 प्रिय भारतवासियों आपसे दो शब्द कहने हैं! हमारे यहाँ मीडिया इतना ऋणात्मक क्यों है? भारत में हम लोग क्यों इतना अटपटा महसूस करते हैं अपनी क्षमताओं और उपलब्धियों को पहचानने में? हम एक महान देश हैं| हमारे पास अद्भुत सफलता की... Continue Reading →

देह विशेष की क़ीमत कुछ भी नहीं!

Painting : Man & Woman (Vincent Van Gogh)

Osho’s world of jokes -1

एक जुआघर में दो महिलाएं प्रविष्ट हुईं। होगी पेरिस की घटना। पहली महिला उत्सुक थी दांव लगाने को| दूसरी ने कहा कि दांव तो मैं भी लगाना चाहती हूं, लेकिन किस नंबर पर लगाना? पहली महिला ने कहा: मेरा तो... Continue Reading →

सहज विश्राम – ओशो + टैगोर

हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलतेअब ठहर जाएँ कहीं शाम के ढलते ढलते (~इक़बाल अज़ीम) आधुनिक युग में जीवन की आपाधापी इतनी ज्यादा बढ़ चुकी है कि मेट्रो या बड़े नगरों की बात नहीं वरन छोटे शहरों, कस्बों... Continue Reading →

The Ba***ds of Bollywood (2025) : A Satirical Model

नवोदित निर्देशक के तौर पर आर्यन खान ने आत्मविश्वास से भरी शुरुआत की है| उनकी वेब सीरीज की सामग्री को देखा जाए तो भाषा के स्तर पर वह कुछ वर्षों पूर्व AIB के एक कुख्यात कार्यक्रम जैसी है, जिसे अंततः... Continue Reading →

Mani Kaul : जहाँ सिनेमा एक ‘राग’ बन गया (HK Verma)

~ © HK Verma हिन्दी अनुवाद – …[राकेश] [नोट : यह लेख श्री एच के वर्मा के अंगरेजी में लिखे लेख का हिंदी अनुवाद है| HK Verma, an alumnus of FTII, is a renowned cinematographer who earlier in his career collaborated with celebrated cinematographer KK... Continue Reading →

वह भी देखेगा सुखद सपने?

मेरी राम कहानी…

© कृष्ण बिहारी

एक यक्ष प्रश्न है …

सावित्री मंदिर … पुष्कर

Saiyaara (2025) : मरज़-ए-इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे

दुखांत न भी हों लेकिन दुःख भरे मार्गों से गुजरने वाली प्रेम कहानियों पर आधारित महत्वपूर्ण हिन्दी फ़िल्में हर दशक में 2-3 के औसत से बनती ही आ रही हैं| कभी लता मंगेशकर के आयेगा आने वाला गीत (महल) को... Continue Reading →

नेताजी सर्वधर्मसमभाव वाले

 © Krishna Bihari

विनोद कुमार शुक्ल  के घर जो न जा पाएंगे

छोटी मगर गहरे भाव और अर्थ अपने में समाहित की हुयी कविता का उदाहरण देखना हो तो प्रसिद्ध लेखक विनोद कुमार शुक्ल की कविता “जो मेरे घर नहीं आयेंगें” तुरंत सामने आ जाती है| उनकी कविता दृश्यात्मक होते-होते एक अन्य दिशा पकड़... Continue Reading →

M F Husain : The White

हुसेन साहब के जलवे प्रदर्शनी का शीर्षक था - श्वेताम्बरी ! हुसेन साहब तब जॉन एलिया की नज़्म - रम्ज़ भी गुनगुना सकते थे | तुम जब आओगी तो सोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ... Continue Reading →

गरीब बीड़ी और इसके धनी भाई बहन और विज्ञापन जगत

"धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है" जैसी वैधानिक चेतावनी उपभोक्ता के दिमाग में प्रविष्ट कराई जाए ऐसी प्रथा पहले नहीं होती थी| बीड़ी, तंबाकू को तेंदू पत्ते में लपेटकर बनाई जाती है, और यह भारत में एक लोकप्रिय तंबाकू उत्पाद... Continue Reading →

कुमार गन्धर्व : सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

कुमार गन्धर्व का गायन सुनते हुए ... (सर्वेश्वरदयाल सक्सेना) https://youtu.be/fls_YUpVbvs?si=_24Cccm7-bf9Ltly

Pehla Pyaar < 1% Chance : दिल तो आशिक है

वो कमसिन हैं उन्हें मश्क़-ए-सितम को चाहिए मुद्दतअभी तो नाम सुन कर ख़ंजर-ओ-पैकाँ का डरते हैं [~ हाज़िक़] ओटीटी के भारत में पैर जमाने से दो अच्छे काम सिनेमा के माध्यम में हुए, एक तो बचपन को समाहित करने वाली... Continue Reading →

Maareesan(2025): Thrill के बोझ तले दबा Romanticism

हृषिकेश मुकर्जी द्वारा निर्देशित बावर्ची और बुड्ढा मिल गया जैसी फिल्मों को देखें तो दोनों में एक केन्द्रीय चरित्र है, जिसके बारे में उसके संपर्क में आने वाले अन्य चरित्र संदेह में रहते हैं कि जैसा यह व्यक्ति उनको दिखाई... Continue Reading →

चल अकेला, चल अकेला … मुकेश

जोड़ी तोर डाक शुने केऊ ना एशे तोबे एकला चोलो रे। तोबे एकला चोलो, एकला चोलो, एकला चोलो, एकला चोलो रे। (रविन्द्रनाथ टैगोर) चल अकेला, चल अकेला, चल अकेलातेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला हज़ारों मील लम्बे रास्ते तुझको... Continue Reading →

Panchayat (2025) Season 4 : प्रहलाद

उपन्यास में एक सहूलियत होती है कि लेखक घटनाओं को विस्तार दे सकता है, इधर उधर की व्याख्या या वर्णन कर जो दर्शाना है उसे ज्यादा गहराई और विस्तार से पाठक को समझा सकता है| एक कहानी जैसी कहानी तो... Continue Reading →

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