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#Prem

रोज़ / गैंग्रीन ( अज्ञेय ) : अप्रेम से रसहीन होता जाता जीवन!

...[राकेश] ©

तुम्हें याद हो कि न याद हो …

बस इतने का वादा है…

थोड़ा सा … (अशोक वाजपेयी)

एक संवेदनशील और जिम्मेदार कवि अपनी कविता में जीवन में जो कुछ अच्छा है उसकी देखरेख अवश्य ही करता है और किसी भयानक दौर में उस अच्छे को बचाए रख पाने के आशावाद को भी अपनी कविता में समाहित करता... Continue Reading →

प्रेम – एक व्याख्या

मैत्री,सख्य, प्रेम – इन का विकास धीरे-धीरे होता है ऐसा हम मानते हैं: ‘प्रथम दर्शन से ही प्रेम’ की सम्भावना स्वीकार कर लेने से भी इस में कोई अन्तर नहीं आता| पर धीरे-धीरे होता हुआ भी यह सम गति से... Continue Reading →

कैसे हो द्वारकाधीश?… पूछती है राधा

स्वर्ग में विचरण करते हुएअचानक एक दूसरे के सामने आ गए विचलित से कृष्ण, प्रसन्नचित सी राधा… कृष्ण सकपकाए,राधा मुस्काई… इससे पहले कृष्ण कुछ कहतेराधा बोल उठी… कैसे हो द्वारकाधीश? जो राधा उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी उसके... Continue Reading →

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