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Cinema, Theatre, Music & Literature

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Indian Cinema

Mirza Ghalib (1988-89): बंसीधर, ज़ौक़ और शहज़ादा ज़फ़र – ईमानदारी और चापलूसी के बीच घिरे ग़ालिब (अध्याय 2)

ग़ालिब के किशोरवय के काल में उनके ससुर द्वारा उनसे किए जाना वाले दोस्ताना और उनके प्रति सम्मान और प्रशंसा रखने वाले रुख ने ग़ालिब को एक शायर के विकसित होने वाले शुरुआती दौर में बेहद प्रोत्साहन दिया होगा| पिछले... Continue Reading →

मिर्ज़ा ग़ालिब (1988-89) : ‘ग़ालिब का बयान’ वाया गुलज़ार – अध्याय 1

‘हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और’ जब यही बात विनोद सहगल की आकर्षक गायिकी बताती है तो असर कुछ ज्यादा ही पड़ता है और ग़ालिब का सिक्का जम जाता है... Continue Reading →

Chintu Ji (2009) : आधी हक़ीक़त आधा फ़साना

सम्पूर्ण परिवार के संग देखी जाने वाली चंद आधुनिक स्वस्थ हास्य फिल्मों में चिंटू जी को रखा जा सकता है| फिल्म की टैग लाइन - This film is part reality, part illusion and part fact, part fiction फ़िल्म को बेहतर... Continue Reading →

Koshish (1972) : संवेदना उकेरती मौन प्रेमकथा

...[राकेश] ©

Dil Bechara (24.07.2020) : मौत के कुएं में विचरते ‘आनंद’ और ‘मिली की प्रेमकहानी

  फ़िल्म – दिल बेचारा, की विशेषता है मौत के निराशा भरे माहौल में प्रेम के आशामयी अंकुर उगाना| मौत का छाता तना होने के बावजूद प्रेम की कोंपले फूट पड़ती हैं और इस तरह यह एक सफल प्रेम की... Continue Reading →

धूप आने दो (2020) : “गुलज़ार एवं ‘विशाल+रेखा’ भारद्वाज” की वैदिक सूर्य स्तुति

‘सूरज की पहली किरण से आशा का सवेरा जागे’ जीनियस किशोर कुमार द्वारा रचित पंक्ति गागर में सागर भरने की उक्ति को चिरतार्थ कर देती है| धरा पर मानव जीवन पर छाए “कोविड-19” के गहरे धुंध भरे साये तले सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक... Continue Reading →

guLaBO SITaBO (2020) : अमिताभ को नकली नाक और सिर पर गमछे के पीछे काहे छिपा दिया बे!

कम अक्ल, रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऐसी छोटी मोटी साजिश भरी हरकतें, जिन्हे सब जानते हों, करने वाले बुजुर्ग के चरित्र से दर्शक कैसे जान-पहचान कर पाएंगे? अगर वह अपना मुंह ढके रहे और आँखें भी बेहद मोटे चश्मे के... Continue Reading →

पाताल लोक (2020) : अपराध, राजनीति, मीडिया और पुलिसिया गठजोड़ का चिट्ठा

हिन्दी सिनेमा के अब तक के इतिहास में राजनीतिक थ्रिलर वर्ग में श्रेष्ठ फ़िल्मों में गुलज़ार लिखित और रमेश शर्मा निर्देशित “न्यू दिल्ली टाइम्स (1987)” के बाद हाल में अमेज़न प्राइम वीडियो पर प्रदर्शित क्राइम और राजनीतिक थ्रिलर वैब सीरीज़... Continue Reading →

Sacred Games (2018,2019) : खोजा परमाणु बम, निकला गुरुजी!

श्रंखला के दूसरे सीज़न में उपस्थित कमजोरियों में सबसे बड़ी कमजोरी हर षड्यंत्र का सूत्रधार गुरुजी को दिखाना ही है| कथा का सारा वज़न इस कोण पर गिर जाता है| दुनिया में बहुत से षड्यंत्रकारी सिद्धान्त चलते रहते हैं| इनमें... Continue Reading →

Sacred Games (2018,2019) : क्या श्रंखला सिख संप्रदाय का अपमान करती है?

सिख धर्म का अपमान करना तो श्रंखला के लेखकों, निर्देशकों और प्रस्तोता का आशय  बिलकुल भी नहीं रहा होगा पर उन्होने अतार्किक गलती अवश्य की या उनसे ऐसी अतार्किक गलती अवश्य ही हुयी या हो गई| इस पर आने से... Continue Reading →

Sacred Games (2018,2019) : दर्शक के भ्रम की आंच पर पकता खेल

किसी भी फ़िल्म में बड़े और महत्वपूर्ण चरित्रों को पा जाने वाले अभिनेताओं में अपने आप एक ऊर्जा भर जाती है और हर काबिल अभिनेता उसका लाभ उठाता है| पर अकसर ही कम महत्व वाले या छोटे काल के लिए... Continue Reading →

सड़कों पे घूमता है अब कारवाँ हमारा : राज कपूर, तुम न जाने किस जहां में खो गए!

बड़े बाँध बनने से, माइनिंग के कारण, बहुत बड़े उद्योग लगने के कारण हुये स्थानीय लोगों के विस्थापन को नेहरू युग में देश में अन्यत्र रह रहे लोग महसूस भी न कर पाते होंगे| तब देश के नेता ने एक... Continue Reading →

थप्पड़ (2020) : अनुभव सिन्हा कृत हिंसा हिंसा न भवति!  

थप्पड़ : (बस इतनी सी बात), निर्देशक अनुभव सिन्हा की सामाजिक मुद्दों पर टीका टिप्पणी वाली श्रंखला की अगली कड़ी है जिसमें व्यावसायिक करियर के अपने स्वप्न पर अपने ऑफिस द्वारा नियंत्रण करने से बेहद नाराज़ युवक अपने ही घर... Continue Reading →

ऋषि कपूर (1952-2020) : बचपन, जवानी, बुढ़ापा, शो का पटाक्षेप

...[राकेश]

इरफ़ान (1966-2020) : चकाचौंध मचाता सितारा डूब गया गुलशन सारा उदास छोड़ कर

अच्छे सिनेमा की शक्ति मनुष्य के ऊपर ऐसी होती है कि जिस अंत के बारे में दर्शक निश्चित ही जानते हैं, उसके बारे में भी एक और बार फ़िल्म देखते हुये भावनाओं के वशीभूत होकर बदलाव की आशा रख बैठते... Continue Reading →

रमैय्या वस्तावैय्या (Shri 420) … राम तेरा दिल और कर्म मैले

रमैय्या वस्तावैया, रमैय्या वस्तावैया मैंने दिल तुझको दिया,  मैंने दिल तुझको दिया ओ रमैय्या वस्तावैया, रमैय्या वस्तावैया नैनों में थी प्यार की रौशनी तेरी आँखों में ये दुनियादारी न थी तू और था, तेरा दिल और था तेरे मन में... Continue Reading →

फिर से अइयो बदरा बिदेसी (नमकीन 1982) … गुलज़ार का मेघदूत

अगर कभी गुलज़ार के किसी पुराने गीत को उन्हे अपने स्वर देने पड़ें तो यह गीत सर्वश्रेष्ठ अवसर उत्पन्न करता है उनके लिए| ...[राकेश] https://youtu.be/BfeJ-tuUoIc?si=GAonq-Xo3g4RN6PO ©

Juice (2017) : क्वथनांक से बस एक डिग्री कम

लघु फ़िल्म “जूस” अच्छे निर्देशन और अच्छे अभिनय से सजी हुई है| घरेलू माहौल में पार्टी के दौरान कमरों के सीमित स्पेस में असरदार तरीके से फ़िल्म को फिल्माया गया है| चरित्रों की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं को बहुत कुशलता से... Continue Reading →

Chutney (2016) : सच और कल्पना के पाटों के बीच पिसता हुआ होश

कहानी सुनाना तो एक कला है ही और कहानी को इस तरीके से सुनाना कि सुनने वाले साँस रोक कर सुनने के लिए बाध्य हो जाएँ तो ऐसी कथा वाचन कला बेहतरीन कला का नमूना बन जाती है| कहानी की... Continue Reading →

Mumbai Varanasi Express (2016) : मौत के आगोश में संतुष्ट जाने का दर्शन

जीवन का खेल बड़ी तेजी से चलता है, जीवन के खिलौने एक के बाद एक पीछे गिरते जाते हैं, और भुला दिए जाते हैं| जीवन को जीने या जीवन को सुख सुविधा से भरपूर तरीके से जीने के साधन जुटाने... Continue Reading →

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