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Cine Manthan

Cinema, Theatre, Music & Literature

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Hindi

Majboor (1974) : मजबूर ये हालात इधर भी हैं उधर भी

...[राकेश]

मेरा तुझसे है पहले का, क्या नाता कोई?

सुबह के दस बजने में चंद सेकेंड्स बाकी हैं, जब अपनी कुर्सी पर विराजमान और कार्य में डूबे कलेक्टर हेमेन्द्र प्रताप का मोबाइल बजने लगता है| हेमेन्द्र अपने लैपटॉप पर कार्य करते रहते हैं और तीन चार बार बजने के... Continue Reading →

उद्धव और राधा

[कान्हा तेरी बांसुरी ...(2)] ...[राकेश] ©

कान्हा तेरी बांसुरी …(1)

* * * * * * * * * * * * * (शेष ...) ....[राकेश] ©

रुई का बोझ (1997) : विधुर बुजुर्ग पिता का बुढ़ापा और संतान की बेरुखी  

किसन साहू के सबसे छोटे बेटे की भूमिका में रघुवीर यादव फिल्म की एक और खूबी हैं| रघुवीर  यादव कमाल के अभिनेता हैं और वे इस बात को पुनः इस फ़िल्म में भी साबित कर देते हैं| किसन साहू की... Continue Reading →

Dev Bhoomi [Land of the Gods] 2016 : पर्वतों के डेरे पर वापसी

ब्रितानी साम्राज्य से स्वतंत्रता पश्चात दशकों तक मनी ऑर्डर और पेंशन जिसकी आर्थिक रीढ़ रही हो, जहाँ नारी दैनिक जीवनयापन की धुरी बनी रही हो, और जहाँ पक्की सड़कें बन जाने के कारण, कहीं बाज़ार आदि जाने में लगने वाले... Continue Reading →

Vadh (2022) : कर्मफल के चक्रव्यूह में अपराधी कौन?

फ़िल्म "वध" "दृश्यम" (भाग 1 एवं 2) जैसी कसावट ली हुयी सस्पेंस थ्रिलर नहीं है, यह चरित्रों के बीच हाई वोल्टेज ड्रामा रचने के कारण दर्शक को बाँध सकने वाली फ़िल्म भी नहीं है| "वध" में निम्नमध्यवर्गीय जीवन की पारिवारिक... Continue Reading →

रेगिस्तानी हिमपात

अंततः कविराज, जैसे कि पढ़ाई के जमाने से ही वे सहपाठियों में पुकारे जाते थे, की पहली पुस्तक प्रकाशित हो ही गयी। सालों लग गए इस पुण्य कार्य को फलीभूत होने में पर न होने से देर से होना बेहतर!... Continue Reading →

Chup (2022) : बात कुछ बिगड़ ही गई

कहते हैं हिटलर बचपन में एक चित्रकार बनना चाहता था लेकिन आर्ट स्कूल की प्रवेश परीक्षा में वह उत्तीर्ण न हो पाया और आर्ट स्कूल ने उसे अपने यहाँ प्रवेश देने से इनकार कर दिया| हिटलर के अन्दर एक ऋणात्मक... Continue Reading →

कसमें वादे प्यार वफ़ा सब [उपकार (1967)] : किशोर कुमार की नासमझी, मन्ना डे की किस्मत  

  ...[राकेश]

एंग्री ओल्ड मैन “अशोक कुमार” [Khatta Meetha (1978)] : अभिनय शानदार – 1

बासु चटर्जी निर्देशित फ़िल्म - ‘खट्टा मीठा’ को एक पारिवारिक हास्य फ़िल्म के रूप में ही देखा, समझा और याद किया जाता है| पारसी किरदारों पर बनी, अच्छे संगीत और स्वस्थ हास्य से भरपूर फ़िल्म| महान अभिनेता- अशोक कुमार, जिन्हें... Continue Reading →

चुनरी संभाल गोरी (बहारों के सपने 1967) : मन्ना डे (उत्सवधर्मिता), लता (भावों की बरसात) संग पंचम की संगीत मधुशाला

पंचम संगीत के विशाल सागर में उठी वह तरंग रही है जो आज भी संगीत सागर में न केवल विद्यमान है बल्कि पुरजोर तरीके से संगीत सागर में हिलोरे मार रही है| सागर में उठी तरंगों के कारण अन्दर से... Continue Reading →

कॉमेडी ऑफ़ एरर्स

युगों युगों से महान हिमालय पर्वत श्रंखला के साये में रहने वाले लोग जानते हैं कि उनके आदि पुरुष, देवों में श्रेष्ठतम स्थान पाने वाले शंकर महादेव कितने भोले थे, उन्हे तो भोले शंकर के नाम से भी जाना जाता है। विकट विद्वान महाशय... Continue Reading →

लुट ही गये राम नाम की लूट के फेर में

मानवेंद्र, महाश्य जी के बहुत से किस्से चटखारे लेकर सुनाया करते, और बहुत बार तो महाश्य जी की उपस्थिति में ही, और महाश्य जी खुद भी अपने बारे में नमक मिर्च लगा कर सुनाये गए इन किस्सों को सुनकर ठहाके... Continue Reading →

Mirza Ghalib (1988-89): पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है… (अध्याय 5)

“दुःख तोड़ता भी है, पर जब नहीं तोड़ता या तोड़ पाता, तब व्यक्ति को मुक्त करता है” (अज्ञेय के विलक्षण उपन्यास “नदी के द्वीप” की दो में से एक नायिका का कथन) दुःख एक नितांत निजी मसला है मनुष्य के... Continue Reading →

दुनिया रंग रंगीली ‘बाबा’

महाश्य जी, विद्वान होते हुये भी कई मर्तबा, नादानी कह लें या उनकी मासूमियत, विचित्र स्थितियों में फँस जाते थे। सामान्य जन की परिभाषा से देखें तो हर पहुँचे हुये व्यक्ति की तरह महाश्य जी भी विरोधाभासों से भरे व्यक्ति... Continue Reading →

रजनीगंधा फूल तुम्हारे  (रजनीगंधा – 1974) : जग ने देखी लता मंगेशकर की महकती गायिकी

https://www.youtube.com/watch?v=8PgqS4tcS54 ...[राकेश]

रहें न रहें हम, महका करेंगे (लता मंगेशकर) : ममता (1966)

मजरुह ने शब्दों का विन्यास इस तरह से सजाया है कि गाने और विराम में एक ज़रा सी चूक लय बिगाड़ सकती थी लेकिन लता जी ने अन्तरों की लम्बी पंक्तियों को इस खूबसूरती से गाया है, एकदम उचित जगह... Continue Reading →

लता मंगेशकर : भारत का गौरव ही नहीं, स्वाभिमान भी

(https://cinemanthan.com/2013/10/15/donainonmeinansoo/)

Chehre (2021) : चेहरों ने कितनों को लूटा?

  फ़िल्म – चेहरे, का विषय रोचक है और चार मुख्य चरित्रों में वरिष्ठ अभिनेताओं को देखना सुखद है और ज्यादा से ज्यादा ऐसे विषयों पर फ़िल्में बनें तो फिल्मों के स्तर में विविधता और ज्यादा गुणवत्ता आने की संभावना... Continue Reading →

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