इस गीत के स्त्री गायक संस्करण ने दर्शक को बरसात का आनंद खुले आसमान के नीचे दिलवाया है| गीत के लता मंगेशकर संस्करण का फिल्मांकन बम्बई के 1978-79 के दौर का दस्तावेज है| तब बारिश से बम्बई में आतंक नहीं फैलता था| बम्बई में अनायास बारिश का हो जाना कभी भी अस्वाभाविक नहीं रहा लेकिन तब आज की तरह हर बरसात में शहर में कई कई फुट पानी नहीं भर जाता था| तब बरसात बम्बई की खूबसूरती को निखार देती थी|

इस गीत के फिल्मांकन से उस वक्त के बम्बई में चलती कारों, डबल-डेकर बसों, दुपहिया स्कूटरों, लोगों की वेशभूषा, बरसात में वे किस तरह घर से बाहर निकला करते थे इन सबका संकेत मिलता है क्योंकि गीत का फिल्मांकन वास्तविक स्थलों पर हुआ है और यह स्टडियो में जुटाई हुयी नकली जनता नहीं है| बरसात में उफान मारते सागर की लहरों का दीवार से टकराकर सड़क किनारे फुटपाथ तक चढ़ आना एक अलग ही दृश्य उत्पन्न करता है| इस गीत की बम्बई को देख लगता है कि इस शहर को कितने सुनियोजित ढंग से बनाया और बसाया गया था| अंग्रेजों के बनाए और बसाए स्थल वैश्विक स्तर के और खूबसूरत लगते हैं|

इस गीत की शूटिंग करते वक्त अमिताभ बच्चन को बिल्कुल भी अनुमान नहीं होगा कि कालान्तर में वे “स्वच्छ भारत अभियान” के ब्रांड एम्बेसडर बनेंगे और लोगों से सड़कों पर गंदगी न फैलाने की अपील करेंगे| अनुमान होता तो वे जेब से (शायद) सिगरेट का पैकेट निकाल उसके भीगे होने के कारण उसे यूँ लापरवाही से सड़क पर न फेंकते| पर वह वक्त अलग था| संभवतः तब इतनी जागरूकता होती सड़कों पर कुछ भी यूँ ही न फेंकने के प्रति तो आज का भारत ज्यादा खूबसूरत दिखाई देता|

इस गीत के पुरुष गायक संस्करण में नायक इस गीत को परदे पर गाकर प्रस्तुत करता है, जबकि यहाँ स्त्री गायक संस्करण में इसे परदे पर नायिका गाती नहीं है बल्कि यह उसके हृदय के उदगार हैं जो पार्श्व में उजागर हो रहे हैं|

बरसात में नायक एवं नायिका का नव प्रेमी जोड़ा चंचल हो उठा है और एक दूसरे के साथ और बारिश के पानी के साथ अठखेलियाँ करता हुआ बरसात का और बरसात में एक दूसरे के साथ का आनंद उठा रहा है|

रिम-झिम गिरे सावन, सुलग सुलग जाए मन

भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन

रिम-झिम गिरे सावन …

किशोर कुमार से अलग और आगे निकल कर लता मंगेशकरसुलग” शब्द का उच्चारण करती हैं| जहाँ किशोर कुमार ने इसे लगभग सु और लग दो अलग शब्दों में विभाजित सा कर दिया था, लता मंगेशकर ने सु को इतना लंबा नहीं खींचा कि वह लग से अलग लगने लगे| यहाँ शाब्दिक उच्चारण के मामले में लता, किशोर के ऊपर अपनी उत्कृष्टता कायम करती हैं|

पहले भी यूँ तो बरसे थे बादल,

पहले भी यूँ तो भीगा था आंचल

अब के बरस क्यूँ सजन,  सुलग सुलग जाए मन

भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन

रिम-झिम गिरे सावन …

प्रेम में होने से पहले भी नायिका ने कई बरसातें देखी होंगीं, और बरसात में भीगी भी होगी लेकिन भावनाओं के ऐसे एहसासों से नहीं गुज़री थी जैसे कि अब प्रेम में होने के बाद प्रेमी संग बरसात का आनंद लेने से गुज़र रही है|

प्रेम काल का शुरुआती दौर व्यक्ति में बहुत बड़े परिवर्तन ले आता है, प्रेम के असर में लगभग विलीन होने के बावजूद चीजों को देखने का उसका दृष्टिकोण और उसकी चेतनता दनों में ही गुणात्मक परिवर्तन आ जाया करते हैं| बहुत कुछ ऐसा उसके सामने प्रत्यक्ष रूप में आने लगता है जिसे उसने देखा तो पहले भी होता है लेकिन इस चेतनता और समझ के साथ महसूस नहीं किया होता है|   

इस बार सावन दहका हुआ है,

इस बार मौसम बहका हुआ है

जाने पीके चली क्या पवन,  सुलग सुलग जाए मन

भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन

रिम-झिम गिरे सावन …

सावन के दहकने का, मौसम के बहकने का और पवन के कुछ पीकर चलने के एहसास प्रेम की खुमारी में झूमती नायिका को यूँ ही नहीं हो रहे| अभी तक नियंत्रित रही नायिका जब सड़कों पर नंगे पैर, अपने लम्बे कद के प्रेमी संग चाल मिलाने के चक्कर में उसके साथ लगभग दौडती हुयी, ह्रदय में प्रेम की अंतराग्नि से बाह्य व्यवहार में उछ्रंखल और उन्मुक्त व्यवहार करने में भी सहजता महसूस कर रही है और इसमें निस्संदेह रिमझिम बरसात के उन दोनों और बाकी जगत के मध्य  निरन्तर बरसती बरसात के आवरण का भी सहारा है| इस बरसात ने ही नायिका को यूँ खुलेआम सड़कों पर प्रेमी संग अठखेलियाँ करने के लिए प्रेरित या विवश किया है| जिन पक्तियों को उसके अन्दर आवाज़ मिल रही है उन्हें शायद प्रेमी संग गाने में वह लजा जाए|

नायिका के बरसात में इस दमकते रूप को देख जय शंकर प्रसाद एक उच्च कोटि की श्रृंगार रस की कविता अवश्य ही लिख देते|