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Cine Manthan

Cinema, Theatre, Music & Literature

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October 2013

जरा थम जा तू (Jogan 1950) : कोयल गर गाती गीतादत्त जैसा ही कूकती

जरा थम जा तू ए सावनमेरे साजन को आने दे आने देमेरे रुठे पिया को फिरमेरी बिगड़ी बनाने दे ओढ़नी पे बिजलियों की गोट मैं लगाऊंगीपीस के काली घटायें काजल बनाऊँगी गरज बादल की अपने दिल की धड़कन में बसाऊँगी... Continue Reading →

कुहू कुहू बोले कोयलिया (Suvarna Sundari– 1957) : मधुर रागमाला, नायाब संगीत

https://youtu.be/ANfV8VnzrYs?si=sv35zFCNO8DmBnrz …[राकेश]

3-Iron (2004): यथार्थ और कल्पना के बीच संतुलन

फिल्म का नायक अगर पूरी फिल्म में एक भी संवाद न बोले और नायिका भी केवल दो बार मुँह से आवाज निकाले, एक बार चीखने के लिये और दूसरी बार नायक को I Love You बोलने के लिये, तो जिन्होने... Continue Reading →

जैसे हो गूँजता सुरीला सुर किसी सितार का (Naulakha Haar 1953) : आशा भोसले के स्वर तो गूंजने ही थे

शुरु से ही आशा भोसले की गायिकी उस ऊँचाई पर उड़ती रही है जहाँ से वह हरेक दौर में सक्रिय बड़े से बड़े संगीतकार को इठलाकर जताती रही है कि जनाब सृष्टि में हम भी श्रेष्ठ गायकों के साथ उपस्थित... Continue Reading →

Mr Singh Mrs Mehta (2010): Nudity or Nakedness?

...[राकेश] https://youtu.be/Emv1nFGA3Oo?si=Xc5oYUmBX1yilcKj

My Brother Nikhil(2005): खुशहाल जीवन निगलता AIDS रूपी ब्लैकहोल

अस्सी के दशक में प्रकाश पदुकोण द्वारा ऑल इंग्लैंड बैडमिंटन चैम्पियनशिप जीतने से शुरुआत कर, मॉस्को ओलम्पिक में हाकी का स्वर्ण पदक जीतने, एशियाड 82 के आयोजन से लेकर कपिल देव की टीम द्वारा 1983 में क्रिकेट का विश्व जीतने... Continue Reading →

Shukno Lanka(2010) : एक्स्ट्रा से नायक बनने वाले अभिनेता की गाथा

ऊँच-नीच के अंतर के सागर में गहराई तक डूबे भारतीय समाज में फिल्मी दुनिया भी इस बीमारी से अछूती नहीं रही है। वहाँ ऊँच-नीच के भेदभाव कुछ अलग तरीके के हैं। वहाँ नायक की भूमिकायें निभाने वाले अभिनेता, जो व्यवसायिक... Continue Reading →

Kanchivaram 2008 : जब सिल्क के रेशे भी खुरदुरे लगें ज़िन्दगी को

कवि धूमिल की अंतिम कविता – लोहे का स्वाद- एक तरह से करोड़ों शोषितों की चुप्पी को जुबान देती है। प्रियदर्शन की फिल्म कांजीवरम एक सामंजस्य स्थापित करती है उस कविता से। शब्द किस तरह कविता बनते हैं इसे देखो... Continue Reading →

Eskiya – The Bandit (1996) : तुर्की डाकू की प्रेमकहानी

पैंतीस साल का अरसा बहुत बड़ा होता है। कितने बड़े बड़े परिवर्तन हो जाते हैं इस लम्बे अरसे में। कितनी नई चीजें दुनिया में आ जाती हैं। अगर कोई सामान्य जीवन व्यतीत कर रहा है तो भले ही उसके चारों... Continue Reading →

A man in our house (1961): जनांदोलन और प्रेमकहानी का सहअस्तित्व

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे बोल ज़बाँ अब तक तेरी है तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा बोल कि जाँ अब तक तेरी है देख के आहंगर की दुकां में तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन खुलने लगे क़ुफ़्फ़लों के... Continue Reading →

The White Balloon (1995): जफर पनाही की स्वतंत्रता कब उड़ान भरेगी?

ज्यादातर समाज कई सारे धरातलों पर जीते हैं और कोई एक परिभाषा उनका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती। बच्चे भी अक्सर समाज में व्याप्त धारणाओं से ही सीखते हैं। समाज में बड़े जैसा कर रहे होते हैं बच्चे भी जाने अन्जाने... Continue Reading →

The Other End of the Line (2008) : इंडो-अमेरिकन प्रेमकहानी

ओह्ह्ह्ह मुम्बई तो भारत का New York है और वहाँ नौकरियों का विस्फोट हो गया है अमेरिकी धनी Kit Hawksin अपने होटल में ठहरी हुयी भारत से अमेरिका गयी प्रिया से मिलने पर  कहता है। मैं New York को अमेरिका... Continue Reading →

स्मिता पाटिल : प्रतिभावान लड़की को भी समझौते करने पड़ते हैं|

अभिनेत्रियाँ तो स्मिता पाटिल से पहले भी बहुत आयीं और बाद में भी पर भारतीय सिनेमा में सबसे ज्यादा कमी किसी अभिनेत्री की खलती है तो वह स्मिता पाटिल ही हैं। नवम्बर 1985 में हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री कृष्ण... Continue Reading →

एक ही ख्वाब (Kinara 1977): गुलज़ार ने रची गहन प्रेम की खूबसूरत सिनेमाई अभिव्यक्त्ति

https://youtu.be/V-Ym1pm2hDw?si=IHlQatk3e5Qe14qD …[राकेश]

नव कल्पना नव रुप (Mrig Trishna 1978) : नारी सौन्दर्य की भारतीय परिकल्पना

https://youtu.be/UN5-DjAu85U?si=49MP4JjYOyGpjZnV ...[राकेश]

i Am KALAM(2010): खुदी को कर बुलंद इतना…

बेहद संतोष की बात है कि Smile Foundation जैसी गैर-सरकारी समाजसेवी संस्था ऐसी फिल्म के निर्माण के लिये आगे आयी। …[राकेश]

दो नैनों में (Khushboo 1975) : निर्देशक, कवि गुलज़ार की कल्पना और तकनीक के संगम का जादू

…[राकेश]

तुम एक गोरखधंधा हो…याखुदा जवाब नहीं

…[राकेश] https://youtu.be/mXY5-TK2sJ0?si=D7z5et6E_Rt6GT4L

The Univited Guest (2004): सायों के भय से घिरा जीवन

स्पेनिश भाषा में 2004 में बनी फिल्म का शीर्षक El habitante incierto था। यूरोप में इसे The Uncertain Guest शीर्षक से रिलीज किया गया और DVD पर इसे The Univited Guest नामक शीर्षक दिया गया है। यह एक ऐसा थ्रिलर... Continue Reading →

Raavan (1984) : रो रो के पिघलते हैं गुनाहों के पहाड़

तेरे इश्क की एक बूँदइसमें मिल गयी थीइसलिये मैंने उम्र कीसारी कड़वाहट पी ली ….( अमृता प्रीतम) कैसे रो रो के पिघलते हैं गुनाहों के पहाड़आके देखे तो सही ये भी नज़ारा कोई © …[राकेश]

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