Netflix पर प्रदर्शित 6 प्रेम कहानियों पर आधारित फिल्मों की वैब श्रंखला में तीन फ़िल्में, क्रमश: The Interview, Star Host, और Quaranteen Crush ही ऐसी हैं जिनके चरित्र जमीन पर पैर टिकाये लगते हैं जो विश्वसनीय लगते हैं और जो अन्य फ़िल्मों से उठाये चरित्रों के क्लोन, या हाइब्रिड या फेब्रिकेटेड संस्करण नहीं हैं|

श्रंखला की पहली कड़ी Save The Da(y)te को पहले नंबर पर रखना श्रंखला के प्रेजेंटर की सबसे बड़ी गलती है क्योंकि यह इतनी उबाऊ कड़ी है कि बहुत से दर्शक इसके आधार पर इस श्रंखला को आगे न देखने का विचार बना सकते हैं| राधिका मदान का चरित्र कभी खुशी कभी गम में करीना कपूर के चरित्र वाली फैक्ट्री का उत्पाद लगता है और राधिका मदान ने उसे निभाया भी इस अंदाज़ में है कि दर्शक में ऐसी भावना भर जाए कि आगाज़ ऐसा है तो अंजाम किया होगा? जुम्मा जुम्मा एक घंटे की मुलाक़ात में राधिका का चरित्र वेडिंग प्लानर युवक के मोबाइल को पानी में फेंक देता है और वह ऐसी बिगडैल युवती के इतना सम्मोहन में है कि सिर्फ हवा में एक दो बार हाथ फेंकने और एक दो शब्द बोलने के नियंत्रित ही रहता है| मोबाइल आजकल किसी के भी जीवन का अभिन्न अंग है, किसी का मोबाइल खो जाए, या चोरी हो जाए तो उसकी हालत देखने वाली होती है और जिसका व्यापार इस पर बहुत निर्भर हो और जो विवाह स्थल से गायब हो और जिसकी बॉस उस पर बिगड़ रही हो उसका मोबाइल ऐसे फेंक दिया जाए तो उसकी प्रतिक्रिया में कुछ तो जीवन होगा ही ना! काठ के उल्लू की तरह तो नहीं ही रहेगा चरित्र| ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा में अभय देओल, हृतिक रोशन और फरहान अख्तर के चरित्र बचपन के दोस्त हैं और जब फरहान का खिलंदड़ा चरित्र अपने बिजनेस के प्रति बेहद गंभीर हृतिक के चरित्र के मोबाइल को तेज गति से दौडती कार से ढलान पर झाड़ियों में फेंक देता है तो हृतिक की प्रतिक्रिया आधुनिक मानव की प्रतिक्रिया है जिसके जीवन में मोबाइल का बड़ा महत्त्व है|

श्रंखला की यह फ़िल्म और अन्य दो फ़िल्में She Loves Me, She Loves Me Not, एवं Ishq Mastana देखने के बाद ऐसा ही भाव जगाती हैं कि काश इतना समय लगाकर कोई अच्छी फ़िल्म देख ली होती| Ishq Mastana में अभिनेत्री Tanya Maniktala की उपस्थिति कुछ आशा जगाती है लेकिन अंततः एक अच्छी स्क्रीन प्रेजेंस वाला अभिनेता भी कितना कर पायेगा अगर चरित्र और कथा में ही जान न हो? इन तीनों ही फिल्मों के चरित्र जमीन पर पैर टिकाये व्यक्तियों के नहीं हैं| उन्हें विचित्र चरित्र कहना ज्यादा मुनासिब लगता है| नकली किस्म के चरित्र जो अक्सर अन्य फिल्मों को देखकर गढ़े जाते हैं और जिनमें वास्तविक जीवन का कोई पुट नहीं मिलता|

Quaranteen Crush कोविड काल की कथा के रूप में अपना स्थान बना लेती है| किशोर नायक का दुकानदार पिता अपने व्यवसाय की खूबी बताता है कि किसी भी माहौल से उसकी दूकान पर आई स्त्री को ऐसा आरामदायक लगना चाहिए कि वह बिना किसी हिचक, दबाव के अपनी जरुरत बयान कर सके| कैनेडा और अमेरिका में जन्में लोगों को होने वाली फूड एलर्जी का अच्छा उपयोग फ़िल्म करती है| जिन बातों को भारत में मासूम समझा जाता है वह क़ानून की निगाह में स्टॉकिंग भी हो सकती हैं ऐसी बात को भी फ़िल्म स्थापित करती है| नायक की निगाहों से ही नायिका को और नायिका की निगाहों से ही नायक को देखा, समझा और स्वीकारा जाता है, यह उनके दिलों का मामला है, इसमें अन्य लोगों के निजी विचार मायने नहीं रखते, यह बात भी फ़िल्म बखूबी दर्शा देती है|

Star Host के नायक Rohit Saraf का अभिनय और महाबलेश्वर की खूबसूरती दो तत्व इस फ़िल्म को इसके कथानक के स्तर से ज्यादा आकर्षक बनाते हैं| कथात्मक स्तर पर इस फ़िल्म में ज्यादा वज़न लाकर फ़िल्म को और आकर्षक बनाया जा सकता था| नायक नायिका के पास बहुत कुछ नाटकीय था नहीं अतः थोड़े में उन्होंने काम चलाने का प्रयत्न किया और उसमें भी रोहित सर्राफ ज्यादा प्रभावशाली रहे|

इस वैब श्रंखला की सबसे अच्छी फ़िल्म है The Interview जो एक तो नायक नायिका के रोचक चरित्रों और उनको निभाने वाले अभिनेताओं के अच्छे अभिनय के कारण आकर्षक बन जाती है दूसरे कथानक में ऐसा है जो दर्शक के आसपास का है, नए जमाने का है, और उस बारे में भी कुछ नयी  जानकारियाँ प्रदान करता है|

अगर किसी का सीधा संपर्क ही शो रूम्स में सेल्स का काम कर रहे युवाओं से नहीं है तो उन्हें उनके जीवन और विशेषकर व्यावसायिक जीवन की बहुत सी बातों का पता नहीं चल पायेगा| फूड और अन्य सामाग्रियों की डिलीवरी देने आने वाले और आधुनिक स्टोर्स पर सेल्स का काम करने वाले लोगों के व्यवसाय बहुत पुराने नहीं हैं और इस नाते उनकी कथाएं भी पुरानी नहीं हैं, उस नाते यह कड़ी रोचक है| इस फ़िल्म को देखने के बाद स्टोर्स पर कुछ सामान खरीदने गए दर्शकों को उन्हें सामान दिखाने और खरीदने के लिए प्रेरित करने वाले युवाओं के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन आयेगा ही आयेगा| वे शायद उनकी कही बातों पर कुछ ज्यादा ध्यान दें| या उनके दावों को शब्दश: न लेकर सही परिपेक्ष्य में ले सकें| मानवीय भावनाओं के स्तर पर भी यह अन्य पाँचों फिल्मों से दर्शक के मन को छू पाने में सबसे सफल फ़िल्म है| बेरोजगारी झेल रहे नायक नायिका के बीच एक कोण प्रियदर्शन की फ़िल्म हेरा फेरी में दिखाया गया था यहाँ यह फ़िल्म उससे भिन्न दृष्टिकोण से अवसर की समस्या को दिखाती है|

इस फ़िल्म में चरित्रों से मेल खाते मानवीय भावों को स्थान मिला है, उनमें रोचकता है, आकर्षण है, काल और स्पेस में वांछित ठहराव है और घटनाओं में आवश्यक नाटकीयता है| चरित्रों की पृष्ठभूमियाँ विश्वसनीय हैं और जहां वे आये हैं वहां उनके व्यवहार में कुछ कर दिखाने की इच्छा दिखाई देती है, गंभीरता दिखाई देती है| अवसर अनुसार कभी संकोच भरा कभी मौक़ा हाथ से न निकल जाए वाले भाव से भरी पहलें भी नायक नायिका के चरित्र में स्मामिलित हैं जो उन्हें जीवित और रोचक चरित्र बनाती हैं| त्याग और उसे जाहिर न करने का उतावलापन न दिखाना स्त्री चरित्र की गहराई को दिखाता है| इस फ़िल्म में गुंजाइश है कि 90 मिनट या ज्यादा अवधि की पूर्ण फ़िल्म बन सके दोनों चरित्रों को लेकर| यह अकेली फ़िल्म है जिसे और देखने की इच्छा दर्शक में जागती है लेकिन यह जल्दी ही समाप्त हो जाती है|

यदि श्रंखला में इसे पहले स्थान पर रखा जाता तो शायद दर्शक कुछ प्रभावित होकर अन्य फिल्मों को देख पाता|