…[राकेश]
ऐसी उलझी नज़र उनसे हटती नहीं दाँत से रेशमी डोर कटती नहीं उम्र कब की बरस कर सफ़ेद हो गयी कारी बदरी जवानी की छँटती नहीं वल्लाह ये धड़कन बढ़ने लगी है चेहरे की रंगत उड़ने लगी... Continue Reading →
जरा थम जा तू ए सावनमेरे साजन को आने दे आने देमेरे रुठे पिया को फिरमेरी बिगड़ी बनाने दे ओढ़नी पे बिजलियों की गोट मैं लगाऊंगीपीस के काली घटायें काजल बनाऊँगी गरज बादल की अपने दिल की धड़कन में बसाऊँगी... Continue Reading →
ज़िन्दगी रोज नये रंग में ढ़ल जाती है कभी दुश्मन तो कभी दोस्त नज़र आती है। कभी छा जाये बरस जाये घटा बेमौसम कभी एक बूँद को रुह तरस जाती है ज़िन्दगी रोज नये रंग में ढ़ल... Continue Reading →
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