Mammo1994-001मम्मो अकेली इंसान नहीं थी जिसकी ज़िंदगी मुहम्मद अली जिन्ना के पाकिस्तान बनाने के कारण पटरी से उतर गई, उस जैसे लाखों लोग 1947 के बाद दो राष्ट्र के सनकी प्रयोग के कारण टूटी फूटी ज़िंदगी जीने के लिए विवश रहे और जो कीमती जीवन के बहुमूल्य सुखों से वंचित रहे|

इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि पाकिस्तान भले ही बन गया हो पर सम्प्रदाय के आधार पर दो राष्ट्र का सिद्धांत बुरी तरह समय के हाथों पिटा| अगर सम्प्रदाय (रिलीजन) के आधार पर पाकिस्तान मुसलमानों के लिए बनाया गया था तो पाकिस्तान बनने के तेईस साल बनने के भीतर ही पाकिस्तान से संघर्ष करके इसे तोड़कर बांग्लादेश का जन्म क्यों हुआ? आखिर बांग्लादेश भी तो मुस्लिम देश ही है| सच्चाई तो यह है कि बांग्लादेश के अस्तित्व में आने से जिन्ना के रिलीजन के आधार पर दो राष्ट्र के सिद्धांत का उपहास अपने आप उड़ा|

कहते हैं कि रक्तपात को रोकने के लिए देश के बंटवारे को स्वीकार किया गया पर क्या बंटवारे से रक्तपात रुक पाया? दस लाख से ज्यादा लोग मारे गये बंटवारे के कारण उत्पन्न दंगों में और दंगे भी इतने वीभत्स कि मानवता हमेशा शरमायेगी उनकी याद में| जिस बात से डर रहे थे वह तो होकर रहा फिर बंटवारे को स्वीकारने का औचित्य क्या था?

पाकिस्तान का शैशवकाल ही खून, सामूहिक हत्याकांडों और अमानवीय हरकतों से भरा हुआ था और तब से कुछ भी तो बदला नहीं दिखाई देता वहाँ|

पाकिस्तान के जन्म ने भारतीय समाज को भी हमेशा के लिए बाँट दिया है और इसके मनोविज्ञान को हमेशा के लिए प्रभावित कर दिया है| भारतीय समाज इस अजीब प्रयोग से घायल है और हालत यह है कि यह न उगलते बनता है न निगलते| क्रोध में बहुत से लोगों दवारा ऐसा कहा जाना कभी कभी अस्वाभाविक भी नहीं लगता कि अगर धर्म/सम्प्रदाय के आधार पर ही बंटवारा हुआ था तो सारे के सारे मुस्लिम पाकिस्तान क्यों न चले गये? लेकिन तथ्य यह भी है कि जिन्होने बंटवारे के वक्त भारत को अपना मुल्क चुना उनसे यह सवाल करना या उन पर यह सवाल उठाना गैर-वाजिब है और सरासर गलत है|

ऐसा नहीं कि पाकिस्तान बनने के बाद भारत ने साम्प्रादायिक दंगे नहीं देखे या झेले परन्तु यह तथ्य बंटवारे के विरोध में ही बैठता है| जब दंगे नियमित रूप से होते रहे हैं तब पाकिस्तान बनाने की जिद के सामने झुकने का क्या अर्थ था?

एकीकृत भारत ज्यादा मजबूत, ज्यादा समर्थ, ज्यादा धनी और विकसित होता और सम्प्रदायिक दंगों के अस्तित्व के बावजूद अब से ज्यादा तरक्की कर चुका होता|

बंटवारा एक बहुत बड़ी गलती थी| यह न हुआ होता तो भारत की बहुत सारी ऊर्जा, बहुत से संसाधन और ढेर सारे निवासी देश के विकास के काम में इस्तेमाल किये जा सकते था|

यह अच्छा निर्णय हो सकता था यदि पाकिस्तान एक स्वस्थ और कुंठा मुक्त देश बन सकता पर यह नहीं हो पाया और पाकिस्तान में कट्टरपंथी आम जनता और उदार प्रवृत्ति के लोगों की एक नहीं चलने देते और भारत से से एक स्वस्थ रिश्ता कायम नहीं करने देते|

बंटवारे के वक्त अगर पाकिस्तान की आबादी में लगभग 15% हिंदू बचे थे तो अब वे 2% से भी कम प्रतिशत में बचे हैं| बंगलादेश में भी, जिसके निर्माण में भारत की महती भूमिका रही, वहाँ की कुल आबादी का 10% से भी कम हिंदुओं का प्रतिशत है| और 1992 के बाद तो हिंदुओं को वहाँ बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ा है|

लेकिन ‘मम्मो’ ऐसी तथ्यात्मक और कानूनी जिरह्बाजी से ऊपर उठकर बंटवारे की व्यर्थता को दर्शाती है और बंटवारे के कारण दिलों के बिछड़ने की पीड़ा को भी और इस कारण खाद बने जीवनों को भी|

मम्मो’ अतिवादी सोच की परतें उघाड़ कर मानवीय सरोकारों को परदे पर उकेरती है| क़ानून की परिभाषा में मम्मो एक पाकिस्तानी है लेकिन हिन्दुस्तानी, चाहे उसे पाकिस्तान के प्रति कितनी ही नापसंदगी क्यों न हो, मम्मो के भारत में ही ठहरने की इच्छा अपने अंदर पाता है| दिलों के बीच क़ानून नहीं आता| ऐसी फिल्म हिन्दुस्तान (चाहे इसे बंटवारे से पहले, बल्कि उससे भी पहले अंग्रेजों के समय का वृहद भारत कह लें) की धरती पर ही बन सकती है| यूरोप, अमेरिका में नहीं, क्योंकि वहाँ बातें कानूनी पहलुओं से तय होती हैं और नागरिक भी उसी परिधि में सोचते विचारते हैं|

करोड़ों लोग भारत में जन्में और वे पाकिस्तान चले गये| भारत और पाकिस्तान अच्छे पड़ोसी देश बन कर रह सकते थे यदि पाकिस्तान अपने अस्तित्व के साथ संतुष्ट और प्रसन्न रहता| लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और पाकिस्तान ने हमेशा ही भारत के साथ दुश्मनी का बर्ताव किया और इसी अदावत का नतीजा हैं मम्मो जैसे लोगों के प्रताड़ित जीवन|

भारत और पाक के मध्य शत्रुता के कारण वे लोग कष्ट भोगते हैं जो भारत और पाक के बीच बिना किसी समस्या के आना जाना चाहते हैं| दोनों देशों के संसाधन और लोगों के जीवन इसी शत्रुता के कारण बलि चढ़ रहे हैं| और व्यर्थ की यह शत्रुता बरसों बरस बढ़ ही रही है| ढेर सारे ऐसे परिवार हैं जिनके आधे सदस्य भारत में रह गये और आधे पाकिस्तान चले गये| ऐसी तकसीम से दिल तो बंट नहीं जाते| अपने नजदीकी लोगों की स्मृतियाँ तो कभी भी भुलाई नहीं जाती| और रिश्तेदार ही क्यों ऐसे भी लोग थे जिनके जिगरी दोस्त इस बंटवारे में दूसरे देश के हो गये और दोस्तों के मध्य दो देशों की सीमा रेखाएं आ खड़ी हो गयीं| भौतिक दूरियां उत्पन्न हो गयीं| भारत पाकिस्तान के बहुत से लोग बंटवारे के बाद से ही पीड़ा में जीते रहे हैं|

भारत का बंटवारा न हुआ होता तो ‘मम्मो’ और हाल ही में प्रदर्शित ‘बजरंगी भाईजान’ जैसी फ़िल्में वजूद में ही न आने पातीं| इनका मूल आधार देश के बंटवारे से बने दो मुल्कों के बीच की शत्रुता ही है|

मम्मो’ लोगों के बीच का खोया हुआ संबंध है| वह धन और शक्ति के भूखे तंत्र और लोगों की प्रताडना की शिकार है|

पाकिस्तान में पति के मरने के बाद मम्मो (फरीदा जलाल) को उसके ससुराल वाले घर से बेदखल कर देते हैं| वह भारत आ जाती है और अपनी बहन फय्याजी (सुरेखा सीकरी), जो अपने पोते रियाज के संग रहती है, के घर शरण लेती है| यहाँ से भी उसे फय्याजी निकाल देती है| भारत से उसे पुलिस भगा देती है और पाकिस्तान भेज देती है| कुछ सालों तक उसका कोई पता नहीं कि वह कहाँ है| बहुत सालों बाद वह पुनः भारत आती है, इस बार क़ानून तोड़कर क्योंकि उसे कुदरती मौत आने तक जीवन बसर करना है|

पक्षी आकाश का बंटवारा नहीं करते| वे धरती पर मानव दवारा खिंची सीमाएं लांघते हैं जब मौसम की दशा उनके जीने के विपरीत हो जाती हैं|

मम्मो क़ानून तोड़ने के लिए विवश है| उसे समझ नहीं आता कि वह उस देश में क्यों नहीं रह सकती जहां उसका जन्म हुआ था? सिर्फ इसलिए वह भारत में नहीं रह सकती क्योंकि वह पाकिस्तान चली गई जो अब एक अलग मुल्क है!

कागजों पर भारत और पाकिस्तान के अधिकारियों के लिए वह मृत है| वह रियाज और फय्याजी संग रहने लगती है|

लेकिन कब तक ऐसा चल सकता है? शायद तब तक जब तक कि कोई उसके बारे में शिकायत न करे| फिल्म तो एक खुशनुमा अंत के साथ समाप्त हो जाती है जहां वह वापिस आ गई है बहन और उसके पोते के साथ रहने| पर असल जिंदगी में तो ऐसा होता नहीं है|

नवमान मालिक ने दूरदर्शन के लिए विलायत जाफरी की कहानी पर राही मासूम रज़ा दवारा विकसित धारावाहिक निर्मित किया था – नीम का पेड़, जिसमें पंकज कपूर ने नायक, जो कि एक बंधुआ मजदूर है, बुधई राम, का किरदार बेहद शिद्दत से निभाया था| इस धारावाहिक में बुधई का दोस्त पाकिस्तान से वापिस आ जाता है अपने पुराने गाँव में रहने| बुधई का विधायक ही अवसर को अपने पक्ष में भुनाने के लिए अपने पिता के पाकिस्तानी दोस्त की शिकायत कर देता है और पुलिस उसे गिरफ्तार करके पाकिस्तान वापिस भेज देती है|

मम्मो उस पीढ़ी के लोगों का प्रतिनिधित्व करती है जो अपने संपर्क में आने वाले व्यक्तियों से संबंध साधने में रूचि रखती है| मम्मो के व्यक्तिगत दुख उसे हमेशा के लिए दुखी बना कर नहीं छोड़ पाते और वह कड़वाहट और कुंठा को अपने चरित्र और स्वभाव को बिगाड़ने नहीं देती| उसके पति की स्मृतियाँ उसके साथ रहती हैं पर वह अपने जीवन में घटे दुख का बोझा लेकर नहीं घूमती और उनके बावजूद खुश होना और रहना जानती है|

उसे वर्तमान में जीने की कला आती है| पर उसके संपर्क में आने वाले अन्य लोग तो उस जैसे नहीं हैं वे उसे नहीं समझते और उसे अपने जैसे निचले स्तर पर खींच लाने का प्रयास करते रहते हैं, उसका अपमान करते रहते हैं| पर वह नीचे गिरने का प्रतिरोध अपनी शक्ति भर करती है|

केवल कानूनी पहलुओं की ही बात नहीं बल्कि सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में भी लोगों का बहुमत अपने बीच खुशनुमा व्यक्ति को बर्दाशत नहीं कर पाते क्योंकि ऐसा निश्छल व्यक्ति उन्हें कुंठित करता है, उनकी कमजोरियों को सिर्फ अपने प्राकृतिक रूप से होने से ही उजागर कर देता है| वह अन्य लोगों जैसी क्यों नहीं है, एक बड़ा प्रश्न बन जाता है|

चाहे उसकी बहन हो या बहन का पोता या उसकी ससुराल वाले, मम्मो सभी के हाथों अपमानित की जाती है और बार बार की जाती है क्योंकि वह उन लोगों की तरह सिर्फ स्वहित की परिधि में घिरी शख्सियत नहीं है|

प्रेम और इस नाते जकड़कर रखने और व्यक्ति पर हक जमाने की भावनाएं अक्सर साथ-साथ चलती हैं और हक की बीमारी ईर्ष्या और अन्य कमजोरियों की आमद बुलाती ही बुलाती है|

फय्याजी को भय है कि कहीं मम्मो अपने खुशनुमा स्वभाव से रियाज को उससे न छीन ले| और जब उसे लगता है कि रियाज मम्मो को पसंद करने लगा है वह मम्मो के प्रति हिंसक हो जाती है|

जब रियाज गुस्से में मम्मो का अपमान करता है तो फय्याजी को अंदर से प्रसन्नता होती है और वह भी बहती गंगा में हाथ ढोते हुए अपनी कुंठा के कारण मम्मो पर आक्रमण करती है और उससे जलील करती है|

फय्याजी और मम्मो सगी बहने हैं लेकिन वक्त उस मोड़ पर उन्हें ले आता है जहां फय्याजी मम्मो से कहती है,” इन छोटे फ्लैटों में इतनी जगह कहाँ होती है?”|और बाद में मम्मो का अपमान करते हुए कहती है,” ये तुम्हारी शुरू से कमी रही है कि तुम जहां जाती हो वहाँ अपना हक जताने लगती हो| तुम यहाँ मेहमान हो|”

मम्मो बड़े दिल वाली महिला है और वह फय्याजी के कहने का बुरा न मानते हुए उसे शांत करने का प्रयास करती है यह कहते हुए कि गुस्से से उसकी तबियत नासाज हो जायेगी|

सगी बहन होने के नाते फय्याजी मम्मो की सहायता तो करना चाहती है पर यह उसे पसंद नहीं कि रियाज मम्मो से भी उतना जी प्रेम करे जैसा वह उससे करता है| यही भय उसके अंदर द्वंद को जन्म देता है और उसकी भावनाओं का बंटवारा कर देता है|

बड़े दिल वाली प्रसन्नचित्त ‘मम्मो’ के केन्द्रीय किरदार में फरीदा जलाल लाजवाब हैं| फ़िल्मी जीवन की उनकी पहली पारी में उन्हें हमेशा ही नायक या नायिका की चुलबुली बहन की भूमिकाएं मिलती थीं| बाद में अभिनय जीवन की दूसरी पारी में वे नायक या नायिका की माँ की भूमिका में फिल्मों में नज़र आने लगीं| टीवी धारावाहिक ‘देख भाई देख’ ने उनके हास्य अभिनय करने की क्षमता का भरपूर दोहन और प्रदर्शन किया|

मम्मो’ में फरीदा जलाल को उनके अभिनय जीवन का प्रतिनिधि किरदार मिला और उन्होंने सुनहरे अवसर का भरपूर उपयोग किया| यह कहा जा सकता है कि उनकी पहले की सभी फ़िल्में एक तरह से अभिनय के क्षेत्र में उनके लिए अभ्यास मात्र थीं, इस भूमिका में महान प्रदर्शन करने के लिए| नियति उन्हें इस भूमिका के लिए तैयार कर रही थी|

मम्मो’ और ‘फरीदा जलाल’ का वही संबंध आपस में है जो ‘बलराज साहनी’ और ‘गर्म हवा’ का आपस में रहा है| दोनों ही अभिनेता अपनी अपनी फिल्म के साथ इस तरह जुड़ गये हैं कि फिल्म उनके अभिनय जीवन का प्रतिनिधित्व करती है और वे इन फिल्मों का|

फरीदा जलाल’ के अभिनय जीवन की गुणवत्ता पर रत्ती भर भी फर्क नहीं पडता अगर वे ‘मम्मो’ के बाद अभिनय जीवन को तिलांजलि दे देतीं क्योंकि वे अपना सर्वश्रेष्ठ अभिनय प्रदर्शन इस फिल्म में दिखा चुकी हैं| पूर्णकालिक अभिनेता को जीविकोपार्जन के लिए भी फ़िल्में करनी पड़ती हैं पर यह बेहद मुश्किल है कि फरीदा जलाल को फिर ऐसी क्षमता वाली केन्द्रीय भूमिका वाली फिल्म मिल जाए|

श्याम बेनेगल का दक्ष निर्देशन एक साधारण प्रतीत होने वाली कहानी को एक प्रभावशाली फिल्म में परिवर्तित कर देता है| अपनी अन्य फिल्मों की भांति ‘मम्मो’ में भी श्याम बाबू विभिन्न परिस्थितियों में मानव के व्यवहार का असरदार फिल्मांकन करते हैं|

एक दृश्य है जो मम्मो के चरित्र पर और मानवीय स्वभाव पर रोशनी डालने के लिए उपयुक्त है| मीठी बातों और अच्छे व्यवहार के बूते मम्मो पुलिस अधिकारी के मन में अपने प्रति सहानुभूति उत्पन्न करना चाहती है| पुलिस अधिकारी मम्मो के पार्टी नरम नहीं होना चाहता क्योंकि वह पाकिस्तान से आई है, लेकिन मम्मो के अनवरत प्रयास उसे अंत में मुस्कराने पर विवश कर ही देते हैं|

…[राकेश]

 

Advertisements