…[राकेश]
तुम जहाँ हो वहाँ क्या ये मौसम नहींक्या नज़ारे वहाँ मुस्कुराते नहींक्या वहाँ ये घटायें बरसती नहींक्या हम तुम्हे कभी याद आते नहींतुम जहाँ हो वहाँ क्या ये मौसम नहीं ये जमाना हमेशा बेदर्द हैदर्दे दिल पे हाथ रखता नहींदिल... Continue Reading →
तुम महकती जवां चांदनी होचलती फिरती कोई रोशनी होरंग भी, रुप भी, रागिनी भीजो भी सोचूँ तुम्हे तुम वही होतुम महकती जवां चांदनी हो जब कभी तुमने नजरें उठायीं आंख तारों की झुकने लगी हैं मुस्कारायीं जो आँखें झुका के... Continue Reading →
ऐसी उलझी नज़र उनसे हटती नहीं दाँत से रेशमी डोर कटती नहीं उम्र कब की बरस कर सफ़ेद हो गयी कारी बदरी जवानी की छँटती नहीं वल्लाह ये धड़कन बढ़ने लगी है चेहरे की रंगत उड़ने लगी... Continue Reading →
जरा थम जा तू ए सावनमेरे साजन को आने दे आने देमेरे रुठे पिया को फिरमेरी बिगड़ी बनाने दे ओढ़नी पे बिजलियों की गोट मैं लगाऊंगीपीस के काली घटायें काजल बनाऊँगी गरज बादल की अपने दिल की धड़कन में बसाऊँगी... Continue Reading →
स्त्री स्वरों में गाये गये गीत पुरुष स्वरों में गाये गीतों से ज्यादा अच्छे हैं। सुनो नंद रानी, ओ री सौतनियाँ, न जाने कहाँ बंसी बजाये घनश्याम, कहाँ छोड़ी मुरली कहाँ छोड़ी राधा, बन नौ रसमय, और मुरली तुम्हारी अजब... Continue Reading →
ज़िन्दगी रोज नये रंग में ढ़ल जाती है कभी दुश्मन तो कभी दोस्त नज़र आती है। कभी छा जाये बरस जाये घटा बेमौसम कभी एक बूँद को रुह तरस जाती है ज़िन्दगी रोज नये रंग में ढ़ल... Continue Reading →
विवश श्वेत वस्त्रधारी अशरीरी अंतर्मन वापिस नरगिस के शरीर में प्रवेश कर जाता है। लता मंगेशकर ने अपनी गायिकी से इस गीत में उपस्थित दुख भरे भावों को गहरायी प्रदान की है। चाहे वह आवारा का ड्रीम सीक्वेंस हो या... Continue Reading →
यह गीत हृषिकेष मुखर्जी की फिल्म फिर कब मिलोगी (1974) का है। इसे लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी ने और संगीतबद्ध किया था आर.डी.बर्मन/पंचम ने। फिल्म में यह यह गीत दो बार आता है। पहली बार यह एकल गीत के रुप... Continue Reading →
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