https://www.youtube.com/watch?v=TMg5khs0UnI https://www.youtube.com/watch?v=CpYuH4Cc8Mk ...[राकेश] https://cinemanthan.com/2013/11/01/namkeen1982
दुनिया की निगाह में एक युवा स्त्री तभी माँ के रूप में दिखाई देती है जब वह एक नवजात शिशु के साथ एक फ्रेम में साथ दिखाई दे| मानसिक तौर पर जब स्त्री तैयार हो जाती है मातृत्व की ओर... Continue Reading →
कोविड संक्रमण के काल में जब लोग अपने प्रियजनों को खोते या बेहद कष्ट झेलते देखते जा रहे हैं तब इस गीत के दुःख के भाव का मुकाबला कम ही गीत कर सकते हैं| https://www.youtube.com/watch?v=GCIfOieDiHU https://youtu.be/-aLz0LWE-Jg?si=qO3JIdKnxhKaRLyR https://youtu.be/VQyheTapPkE?si=r0YQdFw2-iDKF1kc (Text) © CineManthan & Rakesh
क्या दिलीप कुमार और भारत रत्न के बीच कुछ फासले हैं? यह तो सर्वत्र स्वीकृत बात है कि हिन्दी सिनेमा में नायक की भूमिकाएं निभाने वाले अभिनेताओं में वे चुनींदा सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में से एक रहे हैं बल्कि हिन्दी सिने... Continue Reading →
...[राकेश] ©
पिछली सदी के सत्तर के दशक में बी आर चोपड़ा ने एक बेहतरीन मर्डर मिस्ट्री बनाई थी – धुंध, जिसमें अपने पति के खून का आरोप है रानी (जीनत अमान) पर| २०१३ में फ़िल्म आई क्वीन, जिसकी दिल्ली वासी... Continue Reading →
किताब पर बनी फ़िल्म में यह अक्सर ही होता है कि किताब भारी पड़ जाती है और उसमें उपस्थित बातें परदे पर रूपांतरित नहीं हो पातीं| लेकिन ग्रहण कई बार किताब से ऊपर चली जाती है और किताब में संक्षिप्त... Continue Reading →
तकरीबन तीन दशकों से “शेरनी” शब्द का सम्बन्ध श्रीदेवी और शत्रुध्न सिन्हा अभिनीत एक बेहद सामान्य और फ़ॉर्मूला छाप हिन्दी फ़िल्म से जुड़ा रहा है| अब जाकर विद्या बालन अभिनीत शेरनी फ़िल्म ने इस शब्द को सही मायने दिए हैं,... Continue Reading →
दक्षता, किसी भी क्षेत्र में हासिल की जाये, मुक्ति प्रदान करती ही करती है, नयी संभावनाओं के द्वार खोलती है, उड़ान भरने के लिए प्रेरित करती है| परिवर्तन लाने के लिए अवसर का होना भी आवश्यक है| अगर जेसिका (Amy... Continue Reading →
विनोद चोपड़ा ने जब 1942 A Love Story बनाई थी और अखबारों में उनका एक बयान छपा था जिसके अनुसार उन्होंने दावा किया था,"I am the best filmmaker in India" तब किसी पत्रकार द्वारा फ़िल्म के बारे में पूछने... Continue Reading →
इंसान सिर्फ आनंद दायक वस्तुओं या घटनाओं में ही अटक कर नहीं रह जाता, बहुत बार तो जीवन में घटित ऋणात्मक भी जीवन को ऐसे घेरे में बाँध लेता है कि पीड़ित व्यक्ति बाकी सारी उम्र सिर्फ उस ऋणात्मक घटना... Continue Reading →
सीमा भार्गव (अब पाहवा) ने “बड़की” के चरित्र में जिस क्रांतिकारी धारावाहिक “हम लोग” में काम किया, उसके पीछे भारत के हिन्दी के एक बहुत बड़े लेखक मनोहर श्याम जोशी की विद्वता, समाज शास्त्र और विशेषकर भारतीय समाज की विशद... Continue Reading →
लघु फ़िल्म Juice (2017) के बाद निर्देशक - लेखक नीरज घायवान दर्शकों को सोचने विचारने के लिए प्रेरित करती हुई एक और स्त्री केन्द्रित फ़िल्म – गीली पुच्ची, लेकर आये हैं| ...[राकेश] ©
अमीर घराने की लड़की का घरेलू सहायक, ड्राइवर, चौकीदार आदि लड़के के साथ प्रेम दर्शाती फ़िल्में दिखाई दे जाएंगी| राजे रजवाड़ों के काल में राजा या राजकुमार का दासी संग प्रेम भी किस्से कहानियों का हिस्सा रहा है| राजा द्वारा... Continue Reading →
शहतूत की शाख़ पे बैठी मीनाबुनती है रेशम के धागेलमहा-लमहा खोल रही हैपत्ता-पत्ता बीन रही हैएक-एक साँस बजाकर सुनती है सौदायनएक-एक साँस को खोल के, अपने तनपर लिपटाती जाती हैअपने ही तागों की क़ैदीरेशम की यह शायर इक दिनअपने ही... Continue Reading →
ग़ालिब पारंपरिक रूप से धार्मिक नहीं हैं और न ही जड़ता ने उनके दिलो दिमाग पर कोई असर ही डाला है| अपने एक हिन्दू मित्र के घर अन्य हिन्दू साथियों के संग वे दीवाली के अवसर पर चौसर खेल रहे... Continue Reading →
अँग्रेज़ भारत के विभिन्न हिस्सों पर अपना कब्जा बढ़ाते जा रहे थे और दिल्ली, लखनऊ जैसी महत्वपूर्ण जगह लोग मोहल्लों में, घरों में, बाज़ारों में मुर्गे लड़ाने में व्यस्त थे| इसका जिक्र ग़ालिब ने एक व्यक्ति पर कटाक्ष करते हुये... Continue Reading →
ग़ालिब के किशोरवय के काल में उनके ससुर द्वारा उनसे किए जाना वाले दोस्ताना और उनके प्रति सम्मान और प्रशंसा रखने वाले रुख ने ग़ालिब को एक शायर के विकसित होने वाले शुरुआती दौर में बेहद प्रोत्साहन दिया होगा| पिछले... Continue Reading →
‘हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और’ जब यही बात विनोद सहगल की आकर्षक गायिकी बताती है तो असर कुछ ज्यादा ही पड़ता है और ग़ालिब का सिक्का जम जाता है... Continue Reading →
सम्पूर्ण परिवार के संग देखी जाने वाली चंद आधुनिक स्वस्थ हास्य फिल्मों में चिंटू जी को रखा जा सकता है| फिल्म की टैग लाइन - This film is part reality, part illusion and part fact, part fiction फ़िल्म को बेहतर... Continue Reading →
फ़िल्म – दिल बेचारा, की विशेषता है मौत के निराशा भरे माहौल में प्रेम के आशामयी अंकुर उगाना| मौत का छाता तना होने के बावजूद प्रेम की कोंपले फूट पड़ती हैं और इस तरह यह एक सफल प्रेम की... Continue Reading →
‘सूरज की पहली किरण से आशा का सवेरा जागे’ जीनियस किशोर कुमार द्वारा रचित पंक्ति गागर में सागर भरने की उक्ति को चिरतार्थ कर देती है| धरा पर मानव जीवन पर छाए “कोविड-19” के गहरे धुंध भरे साये तले सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक... Continue Reading →
कम अक्ल, रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऐसी छोटी मोटी साजिश भरी हरकतें, जिन्हे सब जानते हों, करने वाले बुजुर्ग के चरित्र से दर्शक कैसे जान-पहचान कर पाएंगे? अगर वह अपना मुंह ढके रहे और आँखें भी बेहद मोटे चश्मे के... Continue Reading →
हिन्दी सिनेमा के अब तक के इतिहास में राजनीतिक थ्रिलर वर्ग में श्रेष्ठ फ़िल्मों में गुलज़ार लिखित और रमेश शर्मा निर्देशित “न्यू दिल्ली टाइम्स (1987)” के बाद हाल में अमेज़न प्राइम वीडियो पर प्रदर्शित क्राइम और राजनीतिक थ्रिलर वैब सीरीज़... Continue Reading →
श्रंखला के दूसरे सीज़न में उपस्थित कमजोरियों में सबसे बड़ी कमजोरी हर षड्यंत्र का सूत्रधार गुरुजी को दिखाना ही है| कथा का सारा वज़न इस कोण पर गिर जाता है| दुनिया में बहुत से षड्यंत्रकारी सिद्धान्त चलते रहते हैं| इनमें... Continue Reading →
सिख धर्म का अपमान करना तो श्रंखला के लेखकों, निर्देशकों और प्रस्तोता का आशय बिलकुल भी नहीं रहा होगा पर उन्होने अतार्किक गलती अवश्य की या उनसे ऐसी अतार्किक गलती अवश्य ही हुयी या हो गई| इस पर आने से... Continue Reading →
किसी भी फ़िल्म में बड़े और महत्वपूर्ण चरित्रों को पा जाने वाले अभिनेताओं में अपने आप एक ऊर्जा भर जाती है और हर काबिल अभिनेता उसका लाभ उठाता है| पर अकसर ही कम महत्व वाले या छोटे काल के लिए... Continue Reading →
बड़े बाँध बनने से, माइनिंग के कारण, बहुत बड़े उद्योग लगने के कारण हुये स्थानीय लोगों के विस्थापन को नेहरू युग में देश में अन्यत्र रह रहे लोग महसूस भी न कर पाते होंगे| तब देश के नेता ने एक... Continue Reading →
थप्पड़ : (बस इतनी सी बात), निर्देशक अनुभव सिन्हा की सामाजिक मुद्दों पर टीका टिप्पणी वाली श्रंखला की अगली कड़ी है जिसमें व्यावसायिक करियर के अपने स्वप्न पर अपने ऑफिस द्वारा नियंत्रण करने से बेहद नाराज़ युवक अपने ही घर... Continue Reading →
रमैय्या वस्तावैया, रमैय्या वस्तावैया मैंने दिल तुझको दिया, मैंने दिल तुझको दिया ओ रमैय्या वस्तावैया, रमैय्या वस्तावैया नैनों में थी प्यार की रौशनी तेरी आँखों में ये दुनियादारी न थी तू और था, तेरा दिल और था तेरे मन में... Continue Reading →
अगर कभी गुलज़ार के किसी पुराने गीत को उन्हे अपने स्वर देने पड़ें तो यह गीत सर्वश्रेष्ठ अवसर उत्पन्न करता है उनके लिए| ...[राकेश] https://youtu.be/BfeJ-tuUoIc?si=GAonq-Xo3g4RN6PO ©
जीवन का खेल बड़ी तेजी से चलता है, जीवन के खिलौने एक के बाद एक पीछे गिरते जाते हैं, और भुला दिए जाते हैं| जीवन को जीने या जीवन को सुख सुविधा से भरपूर तरीके से जीने के साधन जुटाने... Continue Reading →
फ़िल्म के अंतिम दृश्य में कैमरे की ओर पीठ करे सड़क पर जा रहे रूहानी सुकून देने वाले इत्र और सुरमा प्रदानकर्ता छन्नू खान (ओम पुरी) अचानक पलटते हैं और कैमरे की मार्फ़त अभिनेता ओम पुरी दर्शकों से मुखातिब होते... Continue Reading →
दो स्त्रियों एवं एक पुरुष चरित्र के माध्यम से एक स्त्री की कहानी दिखाने वाली तकरीबन बीस मिनट की अवधि की यह लघु फिल्म, लघु फिल्मों को बनाए जाने की महत्ता को स्थापित करती है और यह भी स्थापित करती... Continue Reading →
बचपन, बचपन से मोहब्बत और बचपन की मोहब्बतें तीनों का इंसान के जीवन में बहुत बड़ा शायद सबसे बड़ा स्थान है| बचपन की मोहब्बतों में आवश्यक नहीं कि यह किसी इंसान से ही मोहब्बत का मामला हो, यह किसी विधा... Continue Reading →
...[राकेश]
कुछ साल पहले खोजी पत्रिका ‘तहलका’ की पत्रकार शोमा चौधरी ने आरुषि हत्याकांड में अदालत का निर्णय आने पर अपनी तरफ से खोज की थी और अपने लेख (विस्तृत लेख यहाँ पढ़ा जा सकता है और शोमा दवारा खुलासा किये... Continue Reading →
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